वसंत भारत की प्रसिद्ध छह ऋतुओं में से एक हैं। भारतीय वांग्मय के मनीषियों ने वसंत को ऋतुराज कहकर सम्मान दिया है। लेकिन महाकवि कालिदास की बात ही निराली हैं। महाकवि से प्रसिद्ध कालिदास प्रकृति वर्णन के संवेदनशील कवि थे। प्रकृति की वस्तुतः प्रस्तुति को हम 'छायावाद' से जानते हैं। छाया प्रकृति की आत्मा होती हैं। कालिदासजी 'छायावाद' के महारथी थे।
महाकवि की लगभग सभी कृतिय़ों में वसंत का अद्भुत वर्णन देखने को मिलता हैं। वसंत में प्रकृति की रमणीयता खिल उठती हैं। सृष्टि के सभी जीवों को तरबतर करती वसंत अपने साम्राज्य को स्थापित करती हैं। कवि कालिदास का प्रकृति काव्य 'ऋतुसंहार' का एक सुंदर श्लोक लिखते हुए मैं भी आनंदित हूँ।
प्रफुल्लचूतांकुरतीक्ष्णसायको द्विरेफमाला विलसद्वनुर्गुण:।
मनांसिमेत्तं सुरतप्रसंगिऩां वसन्तयोद्धा समुपागत: प्रिये ।। (६.१ ऋतुसंहार)
"हे प्रिय ! आम्र की मंजरियों के तीखे बाण के साथ तथा अपने पुष्पधनुष पर भ्रमर-पंक्तियों की प्रत्यंचा चढ़ाकर सुरतप्रेमी रसिकों के हृदय बेधने के लिए वसंत योद्धा की तरह आ पहुंचा हैं।"
Picture by Wikipedia. Artwork by Raja Ravi Varma
यहां वसंत को योद्धा कहा गया हैं। लेकिन ये योद्धा कोई युद्ध के लिए नहीं हैं। हृदय को बंधक बनानेवाला युद्ध हैं। पुष्पधनुष के ऊपर हारबंध भ्रमरों की प्रत्यंचा की कल्पना कालिदास ही कर सकते हैं। 'कुमारसंभवम्' में शिव को मोहित करने के लिए स्वयं कामदेव वसंत का माहौल खड़ा करते हैं। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' तो पूरा नाटक होते हुए भी 'प्रकृतिकाव्य' बन गया हैं। कविवर कालिदासजी की ये बेहरिन कल्पनाएं हैं। प्रकृति के संमोहन को महसूस करते हुए उत्तम रुपको का प्रयोग करते हैं। संस्कृत काव्यशास्त्र में उपमा प्रयोजना तो कालिदास की ही, इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। इसी कारण 'उपमा कालिदास्य' का बहुमान कालिदास को मिला था। कालिदास हमारी देवभाषा संस्कृत का गौरव हैं।
वसंत सृष्टि में नवसंचार- नवसंचरण- नवोत्साह के लिए प्रगट होती हैं। प्रकृति के रंगो की बौछार हमारी नज़र में भी छा जाती हैं। वातावरण में अनोखी खुश्बू और तरुवर का नवपल्लवन, फूलों की तो बात ही क्या करें ? धरती में रंगो का उत्सव छाने लगता हैं। यह परिवर्तन सब देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। कोई पागलपन से इस नूतन बदलाव में नाचते हुए अपने जीवन को आनंद से भर देता हैं। कोई इसके स्पर्श से काफ़ी दूर रहता हैं। अपने जीवन को अपने ही घोंसले में बंद करते हुए..! अपने प्रगटन को दबाकर या फिर अपने जीवन की संकुचित गोलाकार दुनिया सजाता हुआ..! उस में वो कायम अकेला ही रहता हैं।
बसंत तो मिलन हैं, बसंत एकाकार होने का अवसर हैं। बसंत की सदाबहार संवृत्ति में जीना होगा। नये पन्नों को प्यार से सहलाना होगा। पुष्पो की रंगभरी दुनिया में कूद पड़ना होगा। वसंत को दिलों-जान से अंगीकृत करना होगा। बसंत ही कुदरत के दृश्यरुप आशिर्वाद हैं। जो कोई इन्सान वसंत की मदहोशी को महसूस कर सकता है, वो ईश्वर की अपार शक्ति का स्वीकार करते हुए मस्त रहेगा। जो कुछ हो रहा हैं, उसका सहज स्वीकार करता रहेगा। अपनी खुशियाँ का आनंद ले पाएगा और पीड़ाओं का समाधान ढूँढ पाएगा।
वसंत के आक्रमण जैसा माहौल खड़ा हो जाता हैं। कालिदास ने इसी कारण वसंत को योद्धा कहा हैं। लेकिन इस आक्रमण में परास्त होना ही आनंद हैं। यहाँ 'प्रकृतिजय' हैं, 'वसंतविजय' हैं। इनमें हारने की हरक़त हमें काफ़ी कुछ दे सकती हैं। हैं ना कालिदासजी !?
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar chandrarav
Aravalli, Gujarat
India.
drbrijeshkumar.org
Dr.brij59@gmail.com
91 9428312234.
Good
ReplyDeleteNice article
ReplyDeleteGood thoughts with Good picture
ReplyDeleteवसंत का अद्भुत वर्णन और विचार का स्पष्टीकरण अच्छा हैं
ReplyDelete