Dr.Brieshkumar Chandrarav

Wednesday, February 4, 2026

Spring sings within me..!
February 04, 20260 Comments

 मम अन्तः वसन्तः गायति...!

आज वसंत के साज छेडने का मन हैं। सहज ही वसंत मुझे छेड़ रही हैं। वैसे तो सबका यहीं अनुभव होगा। चलो, आज वसंत के साथ आनंदभरी मस्ती करते हैं। पहले दो सुंदर कृति का आस्वादन करें..! फिर आगे बढ़ते हैं। अच्छे शब्द विचार से झुडते हैं।

मैं देख रहा हूँ..!
झरी फूल से पँखुरी,
मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।
मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
स्रोत : पुस्तक : सन्नाटे का छंद (पृष्ठ 87) संपादक : अशोक वाजपेयी रचनाकार : अज्ञेय प्रकाशन वाग्देवी प्रकाशन संस्करण :1997

वसंत
जब तक तुम हो डर नहीं हमें।
पेड़ ने कहा:
और अपनी एक-एक पत्ती झरा दी।
स्रोत : पुस्तक : पेड़ अकेला नहीं कटता (पृष्ठ 20) रचनाकार : दफ़ैरून प्रकाशन : रामकृष्ण प्रकाशन संस्करण : 2001

वसंत को हम प्रकृति की श्रद्धा कहते हैं। प्रकृति का एक स्वभाव खिलना और सँवरना भी है। ईश्वर की यह अद्भुत करामात हैं। अदृश्य होकर भी वो एक ऐसा मंजर खडा करते हैं जिसमें सबका कल्याण ही कल्याण बसा हैं। सृष्टि के सभी चेतन-अचेतन पहलूओं को स्पर्श करनेवाली वसंत इसका जबरदस्त प्रमाण हैं। एक और बात पतझड़ की बेला शीत ऋतु में आती हैं। उस वक्त पत्तों का गिरना प्राकृतिक रुप से संभव नहीं लगता। और ग्रिष्म की शुरुआत में यानि की वसंत में नए पत्तों का उग आना भी अचंभे से कम नहीं हैं। शायद बारिश की मौसम में यह संभव लगता हैं। लेकिन ईश्वर को कुछ ओर ही मंज़ूर हैं। वो धूप में भी झरनों का बहाव कर सकता हैं। और रात के अंधेरे में भी फूल खिला सकता हैं। उसकी मर्ज़ी के अनुसार ही प्रकृति में बदलाव आते रहते हैं।


इससे यह पता चलता हैं की ईश्वर चाहे वो कर सकते हैं। किसीको अभाव या संघर्ष में से भी निकाल सकते हैं। केवल निकालना नहीं उसको उच्चतम शिखर पर स्थापित भी कर सकते हैं। उसके लिए यह सहज हैं, हम इसे चमत्कार भी कह सकते हैं। वसंत इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार हैं। ईश्वर की दुनिया चमत्कारों से भरी हैं। वो कुछ भी कर सकते हैं। वसंत को शायद ईश्वर भी चाहते हैं। उसका भी एक प्रमाण देखे...श्रीमद्भगवद्गीता के दसवे अध्याय के पैंतीसवे श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं,
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०•३५॥

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है ,जो ऋतुओ में कुसुमाकर अर्थात वसंत है, वह मैं ही तो हूँ। इसलिए कुसुमाकर की 'कृष्णप्रियता' में जीवसृष्टि का सृजन हैं। कुसुमाकर वो मौसम है जो कुसुम के एक-एक दल को पल्लवित करता हैं। इसे हम 'पुष्पऋतु' भी कहे तो भी एकदम ठीक हैं। अमराइयों में मंजरियो के रससिक्त होकर महकना और मधुमय पराग लिए उड़ाते भौरों के गुनगुनाने का अवसर है 'वसंतऋतु'..! इसे ऋतुराज या ऋतुओं की रानी भी कहा गया हैं। वसंत स्वयं ईश्वर को पसंद है इसलिए वो हमें भी पसंद पड़नेवाली हैं।

वसंत जैसे तरुवर का विश्वास है, वैसे वसंत सृष्टि की खुशबूदार मौसम भी हैं। साथ ही सौंदर्यां भी कह सकते हैं। धरती पर सुंदरता को प्रगटानेवाली ऋतु हैं। वसंत को मैं सौंदर्यां कहते हुए मन ही मन अलौकिक भाव में मस्त हो रहा हूँ। इसे मैं 'सौंदर्यांवसंत' की ही अनुभूति कहता हूं। साथ ही इसे मैं प्रकृति का 'सौंदर्यशास्त्र' कहते हुए एक हिन्दी सिनेमा 'सिंदूर' के गीत की कुछ पंक्तियाँ गा ने लगा। आप भी थोड़ा संमिलित होकर जीवन का आनंद लिजिए...! स्वर सम्राज्ञी लताजी और सुदेश वाडेकर के मधुर आवाज का मजा लीजिए..! वैसे तो यह गीत जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव जैसे पतझड़, सावन, बसंत के बीच प्यार के अनूठे मौसम बसंत में छुपे नाजुक प्रेम की भी बात करता हैं। 

पतझड़ सावन बसंत बहार,
एक बरस के मौसम चार, मौसम चार मौसम चार..!
पांचवा मौसम प्यार का इंतज़ार का,
पतझड़ सावन बसंत बहार...!

कोयल कूके बुलबुल गाए,
हर एक मौसम आये जाये,
लेकिन प्यार का मौसम आये,
सारे जीवन में एक बार, एक बार एक बार..!
पतझड़ सावन बसंत बहार..!

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Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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Tuesday, January 20, 2026

Respond Consciously to the Universe..!
January 20, 20260 Comments

If your response is limitless. you find new life in every passing moment. This is the nature of life..!

SADGURU.

जीवन की प्रकृति को समझना मतलब प्रकृति के वैविध्य को समझना। प्रकृति के सानिध्य का आह्लाद अनुभूत करना। जीवन के कईं बहतरीन पहलूओं पर 'जग्गी वासुदेव' यानी 'सद्गुरु' का मत बहुत ही सटीक लगता हैं। वैयक्तिक रुप से मुझे भी जीवन के बारें में लिखना, पढ़ना और सोचना अच्छा लगता हैं। मुझे समझ में आ रहा हैं, जीवन कोई सामान्य घटना नहीं हैं। जीवन कोई समय का फासला भी नहीं हैं। जीवन कोई अकस्मात नहीं हैं। जीवन ऊर्जा से भरा और असीमित शक्तिओं से भरी समयावधि हैं।

आइए, सद्गुरु के बहतरीन शब्द पढ़े और जीवन की जागरुकता भरी सोच को महसूस करें।


"जिस भी चीज को आप पूरी तरह रिस्पॉन्स देते हैं वो आपकी हो जाती हैं। अगर आप पूरे ब्रह्मांड को सचेतन रिस्पॉन्स दें तो पूरा ब्रह्मांड आपका हो जाता हैं। पतझड़ के समय में जैसा कि आप देख सकते हैं। जो पत्ता पेड़ का था, या शायद पेड़ को ऐसा लगता था। वो नीचे गिर जाता हैं। धरती माँ सबको अपना लेती हैं, पूरी तरह से अपना लेती हैं। इसी वजह से वो इन मरे हुए पत्तों से भी नया जीवन पैदा कर देती हैं। जीवन की प्रकृति ऐसी ही है की अगर आपका रिस्पॉन्स असीम हैं तो हर चीज से आप एक नया जीवन बन जाते हैं। उम्र समय आप पर राज नहीं करते हैं। आप 'समयाधिपते' बन जाते हैं। आप समय से ऊपर होते हैं। या आप समय के चक्र पर सवार होना सीख जाते हैं क्योंकि आपका रिस्पॉन्स असीम हैं। सिर्फ अपने शरीर तक सीमित रहने से आप समय के गुलाम बन जाते हैं। समय आपको कुचल देगा। लेकिन अगर आपका रिस्पॉन्स असीम हैं तो बीतने वाले हर पल से आप नया जीवन पाते हैं। यही जीवन की प्रकृति हैं।"

रिस्पॉन्स देना यानी प्रतिक्रिया देना। हमारे बाहरी वातावरण में जो कुछ हो रहा है, उसके प्रति जागरुकता से बर्ताव करना हैं। उससे हमारी भीतरी संवेदनाओं को जाग्रत करना हैं। उसके तालमेल में रहना मतलब जीवन को करिब से समजने का प्रयास करना..! मनुष्य के रुप में मन-बुद्धि के उपयोग से कैसे जीना है ? उसका जवाब हमें खुद ही खुद से लेना होगा। जवाब मिल जाय, तब सारे संसार को देखने का हमारा नज़रिया ही बदल जाएगा। 'प्रकृति और ब्रह्मांड' को सचेतन रुप से महसूस करना संभव हो जाएगा। जीवन की शानदार पहचान होती चली जाएगी। हमारी 'उम्र और समय' का संबंध समझ में आता जाएगा।


फिर शुरु होगी एक यात्रा..! आनंद से भरी जीवन यात्रा..! पंछीओं के गीत से भरी और हवाओं की सुगंधित सरसराहट से भरी...! नदियों के कलकल करते संगीत से भरी, पर्वतों और मैदानों की हरियाली से भरी जीवनयात्रा..!

कईं लोगों के बीच जाना होता है, तब सबको पसंद पड़नेवाली जीवनयात्रा। सुंदर काम के लिए हरदम निमित्त बनती हुईं यात्रा..! ये ब्रह्मांड की ही असीम कृपादृष्टि कहलाएगी। ब्रह्मांड को धारण किए हुए आसमान से बातें करने का मन हो तो समझ लेना मेरे जीवन में कुछ चमत्कार घटेंगे, कोई सुनहरे काम के लिए या संसार में घट रही अच्छी घटनाओं के निर्माण के लिए मेरा प्रयोग होगा। मैं जीवन को एक वस्तुत: समझता जा रहा हूं। मैं इस ब्रह्मांड का एक छोटा-सा उपकरण हूँ। मुझे बस बहते जाना हैं। मुझे अदृश्य शक्तिओं की मर्ज़ी के अनुसार एक पत्ते की तरह गिरने का आनंद भी लेना हैं। एक छोटे-से बीज की तरह टूटकर अंकुरित होने के आनंद में जीना हैं। एक परिन्दे सी मुस्कान लेते हुए गाते ही रहना हैं। कोई मुझे क्या परेशान करेगा !? मैं इस ब्रह्मांड का अभिन्न अंग हूं..! वृक्ष की हरियाली को चूमता हुआ और हवा की ठंडी लहरों के साथ गीत गाता हुआ..! एक छोटा-सा जीव हूँ...मुझे बस बहना हैं..!

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Tuesday, January 13, 2026

YOU vs YOU...!?
January 13, 2026 4 Comments

"Ascension means it's You vs You.

And one of you has to die"
A keredoldscuid.

"आरोहण का अर्थ है तुम बनाम तुम। और तुममें से एक को मरना होगा।" ए. केरेडोल्डस्कुइड

'Ascension' means the action of rising to an important position or a higher level.
'आरोहण' का अर्थ है किसी महत्वपूर्ण पद या उच्च स्तर पर पहुंचना।
उठना चाहते हो !?
कुछ करना चाहते हो !?
या फिर उड़ना चाहते हो..!? जीवन में बेहतरीन एक्शन चाहते हो तो ये ब्लोग आपके लिए ही हैं। सृष्टि के सब मनुष्य को जन्म से जीवन मिलता है। रात-दिन के घटनाक्रम में जीवन बहता चला जाएगा- बढ़ता ही रहेगा। इसमें कुछ अलग करना हैं, ये जीवन के लिए चैलेंज हैं। इसके लिए ईश्वर की कुछ अदृश्य अपेक्षाओं को समझकर आगे बढ़ना एक अच्छा स्टेप-कदम माना जाएगा। हरेक व्यक्ति की स्थिति-परिस्थिति या फिर योग- संयोग अलग हो सकते हैं। फिर भी कुछ नये मार्ग को चयनित करके अपना मुकाम तय करना हैं। इस मार्ग पर चलने की कोशिश जीवन की सबसे सुंदर क्रिया होगी ऐसा मुझे प्रतित हो रहा हैं।


'एसेंशियल' एक मानक अंग्रेजी शब्द नहीं है, लेकिन यह संभवतः 'एसेंट' शब्द जिसका मतलब ऊपर की ओर बढ़ना ऐसा होता हैं। एक ओर अर्थ में 'एसेंशियल' 'आवश्यकता या जरूरत' को दर्शाता है। अब मैं बात करता हूँ आवश्यकता की, जरुरत की और उपर उठने के साथ किसी उच्चतम अवस्था तक पहुंचने की..! शरीर रूप साधन के उपयोग से हमें जीवन को गति देनी हैं। शारीरिक अवस्था प्रकृति के आधिन हैं मगर हमारी मानसिक-सांवेगिक़ और आध्यात्मिक ति; जिसके कारण हम हमारी पहचान बना सकते हैं। दूसरों से अलग करके संसार में नये मुकाम स्थापित कर सकते हैं। उसके लिए जितना हो सके इतना अच्छा समझ लेना होगा। हमारी मानवीय गति को बढ़ानेवाली संभावनाओं से ब्रह्मांड भरा हुआ हैं। फिर भी समस्याएं आती हैं। क्यों ऐसा विपरीत मंजर खड़ा होता हैं ? इस चर्चा में स्वाभाविक रुप से कुछ प्रश्न जरुर खडे होंगे।
संभावनाओं के बीच विकलता क्यों आती है ?
कौन हमें रोक रहा है ?
हमें किसका सामना करना होगा ?

उत्तर ब्लोग के टाईटल में ही हैं। हम खुद अपने सामने हैं। 'मैं के विरुद्ध मैं..!' की प्रतिस्पर्धा हैं..! you vs you..! जीवन का ये महत्वपूर्ण पहलू हैं। हमें इसे समझना होगा। मैं खुद अपने को रोक रहा हूँ। इसलिए संभावनाएं मुझे दिखाई नहीं पड़ती। इसी कारण मदद करने वाली शक्तियां विमुख हो जाती हैं। और हम धीरे धीरे ठहराव के पाश में बंधने लगते हैं। 'एक्शन ऑफ राइजिंग' नहीं हो पाता..! 'जीवन ऐसे ही बहता है, मन में प्राप्ति की ओर खुद बढ़ना होगा..!' ऐसी भावनाएं जरुर कारगर साबित हो सकती हैं। ठहराव से भरा एवं भटकाव से भरा जीवन उम्र की ओर बढ़ता हैं, वैसे ही संवेदनात्मक बनता जाता हैं, मन सहज ही मजबूत बनता जाता हैं। एक सुंदर पथ हमारे सामने दृश्यमान होता हैं।

हम गिर जाएं या गिरा दिए जाएं
खुद से हमें ही उठना है..!
धूल झाड़ कर हिम्मत से फिर,
आगे और सिर्फ आगे ही बढ़ना है...! (श्रेयांसी सतीश)

एक विचार को अनुमोदन मिले तो वो विचार थोड़ा दमदार बन जाता हैं। देखिए, ए. केरेडोल्डस्कुइड ने मुझे एक विचार दिया। उस पर मैं ब्लोग कर रहा था। श्रेयांसी सतीश जैसी कवियित्रीने उसको अनुमोदन दे दिया। तेरे किरदार को सुवासित करना तेरे ही हाथ में हैं। एक को मरना होगा मतलब अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं को छोडना होगा। कुछ पाने के लिए अपनी पसंद को छोडकर एक का स्वीकार करना होगा। बहुत ही सुंदर विचार पर चिंतन करते हुए मैं भी खुश हो गय़ा। जीवन को एक 'विचारतजुर्बा' मिला हैं। अब अपने काम में लगना हैं। बेहतरीन रास्ते पर अकेले ही चल पड़ना हैं। आरजू की परवाह किए बिना, बस हमें चलते जाना हैं। इसे हम 'एक्शन ऑफ राइजिंग' कहेंगे। संसार में खुद पर विजय पाकर ही दमदार किरदार खड़े हुए हैं। आरोहण के मार्ग पर थमना मना हैं, क्योंकि निर्धारण में बाधा आ सकती हैं !? और आरोहण कठिनाईओं के सामने किए गए मजबूत इरादों की कोशिश हैं..!?

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Tuesday, January 6, 2026

Come on, let's talk to our sky..!
January 06, 2026 3 Comments

नभ ने धरा से कुछ नहीं कहा,

और न ही धरा ने नभ से कुछ कहा !

फिर भी न जाने,
कितने अरब प्रकाश-वर्ष से चल रहा है
यह अद्भुत प्रेम..!
स्रोत: पुस्तक, 'राबिया का ख़त' पृष्ठ १८४ रचनाकार, मेधा। प्रकाशन: राधाकृष्ण पेपरबैक्स।

आज कुछ नया करने का मन हैं। 'आनंदविश्व सहेलगाह' में आसमान की सैर करने का मन हुआ। विशालता विराटता के बीच हम सब तिनके से भी छोटे हैं। लेकिन हमारा वास्तविक अस्तित्व यहां विद्यमान हैं। इस आकाश के नीचे 'नीले गगन के तले' हमारा जीवंत बसेरा हैं। इस नीले आसमान के नीचे हम श्वास ले रहे हैं, हमारे हृदय की धड़कने धबक रही हैं। हम जिंदा है, मस्ती में हैं, आनंद में हैं।


Come on, let's talk to our sky..! आज आसमान से बाते करते हैं। है विराट आकाश ! तुम सारी धरती की परछाई धरे, सारे रंगो को धारण करके युगों से अस्तित्व को धारण किए हो। धरती का सारा इतिहास तेरी आंखों में बसा हैं। मैं तुझे वंदन करता हूँ। मेरे इस जन्म के अस्तित्व को और नजाने कितने जन्मो को तुमने देखा होगा। तुम मेरी हर हरक़त के साक्षी के कितने अरब प्रकाश-वर्ष से चल रहा है तेरा और धरती का अद्भुत प्रेम..! मैं तो तेरी इस दीवानगी का छोटा-सा आनंद स्वरुप हूँ। धरती पर पैदा हुआ एक छोटा-सा पौधा हूँ ! तेरे रंगो की परछाई हूं ! बचपन से मैंने सुना है, तुम अदृश्य ईश्वर का ठिकाना हो। इस ईश्वर को याद करते हुए तेरे सामने ही देखते रहे हैं। ये सत्य है या असत्य हम नहीं जानते फिर भी आस बनाए हुए हैं। सच कहुं, तेरी विशालता पर एक नजर करता हूं तो खुश हो जाता हूं। थोड़ी देर के लिए भी मैं शांत हो जाता हूँ ! बड़ा सुकुन मिलता हैं !

हे आकाश ! तुम मुझे हरदम देख पा रहे हो और मैं भी..! मैं नहीं देख पा रहा उन्हें भी तुम देख पा रहे हो। शायद मेरी याद बनकर उन्हें अचंभित कर सकते हो। क्योंकि तेरा अधिकार सर्वत्र हैं। तेरे विशाल क्षेत्र में हम सब बसे हैं। तेरी असीमित शक्तियों के सामने मैं आनंद पूर्वक नत मस्तक हूं। एक बात बताऊं, बचपन में तेरे 'क्षितिज मिलाप' को देखने का बहुत मन करता था। फिर समज में आया कि ये मेरे मन की कल्पना हैं, संभावना के प्रति केवल एक विचार हैं, हक़ीकत नहीं..! ये जानते हुए भी मुझे क्षितिज से लगाव हैं। धरती और तेरे मिलन की ये कल्पना मुझे आनंदित करती हैं। सचमुच, मुझ में प्यार की तरंगे उठती हैं। हृदय में मिलन का विचार स्पष्ट रुप से आकारित होता हैं।

हे शून्यता के सागर ! तुम मुझे एकांत सिखाते हो। अपनी विशाल आगोश में मुझे सूकुन की गहराई का अनुभव होता रहा हैं। जब भी परेशान हूँ तो तुम्हें देखता हूँ और आनंद से भर जाता हूं। तेरे 'अखंड मंडलाकारं' स्वरुप से मैं शांति का अनुभव करता हूं। हे आकाश ! तेरी शून्यता ही शांति की मुख्य धारा हैं। तेरी विशालता ही प्रेम प्रगटन का आधार हैं। धारण करते हुए भी स्थिर रहना ये तेरी असिमित कृपा हैं..! तेरी आगोश में मैं हरदम प्रेम और शांति का मंजर अनुभूत करता रहा हूं।

मेरी कल्पना के साथ 'धरती और आसमान' कविता जो अंजना भट्ट ने लिखी है, चलो, कविता का आस्वादन करते हैं।

मैं ? मैं हूँ एक प्यारी सी धरती!
कभी परिपूर्णता से तृप्त और कभी प्यासी आकाँक्षाओं में तपती,
और तुम ? तुम हो एक अंतहीन आसमान !
संभावनों से भरपूर और ऊंची तुम्हारी उड़ान।
कभी बरसाते हो अंतहीन स्नेह और कभी
सिर्फ धूप.! ना छांह और ना मेंह...!
मैं रहूँगी तुम्हारी प्रिया धरती !
और रहोगे तुम मेरे प्रिय आसमान..!
मैं ? मैं हूँ आसमान की धरती और तुम ?
तुम हो धरती के आसमान..!

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Tuesday, December 30, 2025

I feel I'm alive..!
December 30, 20251 Comments

When you call on me,

when i hear you breathe,

I get wings to fly.

I feel I'm alive.
lofilulla.

जब तुम मुझे पुकारते हो, जब मैं तुम्हारी साँसें सुनता हूँ, मुझे उड़ने के पंख मिल जाते हैं..! मुझे लगता है कि मैं जीवित हूँ..! ● लोफिलुल्ला

कुछ शब्द नहीं होते, धडकन का साज होते हैं। ये शब्द जीवन की यात्रा को बेहतरीन बनाते हैं। ये शब्द भी तो वर्णो का मिलन हैं। और जहां मिलन होता है वहाँ लाजवाब ही घटित होगा। सारे ब्रह्मांड में प्रकृति के सभी पहलूओं में मिलाव ही तो भरा हैं। एक चीज दूसरी चीज से मिलकर एक ओर चीज निर्माण करती हैं। ब्रह्मांड में एकत्व का भाव ही मुख्य हैं, यहाँ समता हैं, संयोजन है और समाहित होना सहज भाव हैं। इसलिए प्रकृति वैविध्य से भरी होने के बावजूद एक ही हैं। उसके सामने 'मनुष्य' शब्द बोले तो कितना कुछ वैविध्य सामने आता हैं। फिर भी मनुष्यों में भी मिलन और प्यार की बात ही भरी है। मनुष्य में भी प्रकृति का एकत्व सहज उठ खडा होता हैं। इसलिए कहे, ईश्वरीय परिकल्पना में 'मिलन' ही केंद्र में हैं।


Thanks andres..for beautiful pic. 

हमारी ही बात करते हैं, यानि की मनुष्य की बात करते हैं। मनुष्य का एक मूलभूत स्वभाव हैं उसे अकेला रहना पसंद नहीं हैं। आदिकाल को देख़ें टोली और समूह सहज ही बन गए थे। मनुष्य का समाज और अपनो में रहने का स्वभाव मूलरूप दर्शाता हैं। शायद ये ईश्वर की अनजान करामात भी हो सकती हैं। अपनो में जीना है, तो प्रेम चाहिए। इसलिए प्रेम सबसे जरुरी हैं, ऐसा निश्चित हैं। ईश्वर ही प्रेम है, ऐसा सुनकर हमसब बड़े हुए हैं। मनुष्य को प्रेम में जीना पसंद हैं। अक्सर ये स्वभाव बदलता क्यों है ये मैं नहीं जानता। लेकिन एक बात तो तय है, हमारे मन में कुछ भी पाने की लालसा भले ही ज़्यादा हो। लेकिन प्यार सबको चाहिए..! ये सत्य किसीसे छिपा नहीं हैं।

किसी आवाज से मन भर जाय, किसी आवाज को बारबार सुनने का मन करे या उस आवाज को सुनकर उड़ने का मन हो जाए..! ये बड़ी ही नाजुक हरकतें सभी के नसीब में कतई नहीं होती। इसके लिए शायद मनुष्य के रुप में "जैसा हैं वैसा" या फिर "जैसे ईश्वर के साथ आनंद आता है वैसा" जीना होगा। ऐसी अंतरंगी हरकतें किसी ओर को आपकी ओर खींच लेती हैं..! प्रेम के लिए शायद कोई चाहिए ये भी सच हैं। प्रेम भीतर की धडकन हैं, इसे व्यक्तिगत रुप से सुनना भी फ़ायदेमंद और कोई ओर सुन ले उसके लिए भी लाभप्रद हैं। प्रेम जब पारस्परिक संबंध में झुडता है तो बडा सुंदर लगता हैं। शायद ये लोगो की जुबान बन जाए या एक खुबसूरत लम्हा..! जीने के लिए ये प्यार बड़ी जरुरी चीज हैं। प्यार स्वरुप के बिना, न दिखे फिर भी और चीज न होने के बावज़ूद भी बहुत ही जरुरी हैं।

I feel I'm alive...मैं जीवित हूँ..! ऐसे अहेसास की किमत कोई चुका नहीं सकता। ये अनमोल रिश्ता, ये प्यारा संबंध कैसे बंध जाता है, इसके कारण कितना भी ढूंढो मिल नहीं सकेंगे !! प्यार के साथ जीना जीवन की सबसे बड़ी सफलता हैं। और मनुष्य के रुप में संबंध को समझना सबसे बड़ा व्यवहार हैं। ऐेसे जीव चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, बड़े ही भाग्यवान होते हैं या कहलाते हैं..! शायद उनका जीना ईश्वर को भी पसंद आता होगा..! शायद नहीं निश्चित ही पसंद होगा..! एक हिन्दी फिल्म 'किनारा' का ये गीत जो गुलजार ने लिखा हैं, और राहुलदेव बर्मनने संगीत से सजाया हैं..! सुने और आनंद की प्यारी लहर का अनुभव करें..!

'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा,
मेरी आवाज़ ही, पहचान है गर याद रहे..!
वक़्त के सितम, कम हसीं नहीं,
आज हैं यहाँ, कल कहीं नहीं,
वक़्त से परे अगर, मिल गये कहीं...!
मेरी आवाज़ ही पहचान हैं गर याद रहे...!

आज के लिए शायद इतना काफी हैं...! Thanks lofilulla.

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Monday, December 29, 2025

Dr. jagdish trivedi, legendary personality
December 29, 20251 Comments

એક અદ્ભુત વ્યક્તિત્વ...!

ફોટોગ્રાફ્સમાં દેખાતા સહજ સરલ ઇન્સાનનો પરિચય આપવાની બિલકુલ જરૂર નથી. પ્રામાણિકતાથી કહું છું એમની સાથેની કેટલીક પળોના ફોટાથી મારી કિંમત વધે. બીજાની કિંમત પણ વધારનારા મુઠ્ઠી ઊંચેરા ઇન્સાન એટલે પદ્મશ્રી ડૉ.જગદીશભાઈ  ત્રિવેદી..!


ત્રણવાર Ph.D એટલે અખંડ અભ્યાસુ. ગુરુશ્રી. શાહબુદ્દિન રાઠોડ પ્રત્યે અનન્ય અનુરાગી એવા જીવનધર્મી વ્યક્તિ. વિશ્વભરની ખ્યાતિ ધરાવવા છતાં ડાઉન ટુ અર્થ..! એમની સાથેનો વ્યક્તિગત અનુભવ કહું તો હું એમને મળવા ઇચ્છતો હતો. એમણે મને કહેલું :"ભાઈ ! સુરેન્દ્રનગર સુધી શું કામ લાંબા થવું છે ? સમય અને પૈસા ખર્ચાશે. એના કરતાં હું મોડાસા કે તેની આજુબાજુ આવું એટલે મળીએ...!" એ વચન પ્રમાણે ૨૮ મી ડિસેમ્બરે માઁ ઉમિયાધામ ઊંજામાં ભદ્રજન ભરતભાઈ મોદી અને કિરણબેન મોદીના 'જીવનપર્વ' માં મળવાનું થયું. પહેલાં તો આખો ચાર કલાકનો કાર્યક્રમ ભરપૂર માણ્યો. જગદીશભાઈ મન મૂકીને વરસતા રહ્યા, સૌ કોઈ તરબોળ થતાં રહ્યા. ભાષા-ભાવ અને પહાડોમાંથી ઉઠતો હોય એવો અવાજ..! વધારે પડતું લાગે તો ભલે. પણ બેધડક કહું છું, ઓછા લોકો માટે આટલો બધો પ્રેમ ઉભરાઈ આવે છે. એ પોતાના કામને ઇબાદત સમજે છે, એનું જ કદાચ આ કારણ હોવું જોઈએ. જ્યાં પ્રાર્થના જેવો માહોલ સર્જાય ત્યાં ઈશ્વર જરૂર હાજર હોય જ...! એવી અનુભૂતિ વૈયક્તિક રીતે મેં અનુભવી છે. પહેલીવારના મળવા ટાણે સંવેદનાભર્યો સ્પર્શ અને પ્રેમાળ લાગણી મેં અનુભવી. મારા વૈયક્તિક જીવનના દૃષ્ટા ગુરુવર્ય ડૉ. વિનોદભાઈ પુરાણી અને મોડાસાના સેવાધર્મી તબીબ ડૉ. દિનકરભાઈ દવેનો અનન્ય અનુરાગ યાદ આવી ગયો. આ બન્ને મહાપુરુષો સ્વધામ થયા છે. ઘણા વરસે એમનો સ્પર્શ મને જગદીશભાઈના સ્પર્શમાં અનુભવાયો. યોગાનુયોગ દવે સાહેબ પણ મૂળ લીમડી, સુરેન્દ્રનગરના વતની. બ્રહ્મદેવોના આશીર્વાદનો આનંદ..!

એમની સાથે વધારે વાતો ન થઈ શકી. પરંતુ એમ કહું જરૂર પણ ન લાગી. કારણ કે પળવારમાં એમણે ઘણું જાણી લીધું હોય એવા અહેસાસમાં હું આવી પડ્યો હતો. ફરી મળવાનો ઉમળકો મનમાં પાળ્યો છે. મા.જગદીશભાઈ કેવળ કલાકાર નથી, એ કલાધર છે. કલાને ધારણ કરનારા છે. જ્યારે એક કલાધર પોતાની કલાને સમાજકાર્યમાં ધરે છે પછી જે કંઈ સર્જાય એ અવર્ણનીય અને અદ્ભુત જ હોય..! પોતાની કલા સમાજના જરૂરિયાતમંદ માટે ખર્ચાય પછી કલા સાધનાનું સ્વરૂપ ધારણ કરી લે છે. ફ્રેન્ચ ફિલસૂફી 'જીવન ખાતર કલા' એક મૂલ્ય વિધાન છે. જે કેવળ સૌંદર્યલક્ષી સિદ્ધાંત કે સંસ્થાકીય પ્રતિષ્ઠા અથવા ઔપચારિક સ્વ-સંદર્ભ માટે બનાવેલી કલા કરતાં પણ ઉપર વાસ્તવિક માનવજીવનને સમૃદ્ધ બનાવવાની ભૂમિકાને પ્રાધાન્ય આપે છે. કલાને ફક્ત આંતરિક નિયમો દ્વારા સંચાલિત સ્વાયત્ત વસ્તુ તરીકે નહીં, પણ લોકજીવનના વિચાર અનુભવ અને અનુકંપાને ગોઠવે છે.

રીથી કહું શ્રી જગદીશભાઈનું આ નાનકડું વર્ણન મારી જ શોભા વધારનારું છે. મને લાગે છે જગદીશભાઈ માટે હવે પ્રસંશાના શબ્દો કે વર્ણનોની કોઈ જ આવશ્યકતા એમના માટે નથી..! આ ધરતી ઉપર શ્વસી રહેલા એક અદ્ભુત વ્યક્તિત્વના ધણી જગદીશભાઈને ફક્ત માણ્યા કરીએ...! બસ, એજ અભ્યર્થના..! ઈશ્વર એમને 'પ્રેરણાપુરુષ' રૂપે સુંદર સ્વાસ્થ્ય અને દિર્ઘાયુષ્ય આપે..!

આપનો Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli
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INDIA
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Monday, December 22, 2025

Our lighting life...!
December 22, 20251 Comments

कैसे हमारी प्रकाशमान ज़िंदगी बनाए रखे...!

Be a light unto yourself.

स्वयं अपने लिए प्रकाश बनो..!

हमारी ज़िंदगी अनोखे अवसर से कम नहीं हैं। मनुष्य के रुप में हमें ये अद्भुत अवसर मिला हैं। इसे कैसे सजाया जा सकता हैं ? प्रकाशमान स्थिति को बनाए रखने के लिए कैसे प्रयास करने चाहिए ? इसके मार्ग बताऊंगा ऐसा मत समझना। क्योंकि सभी मनुष्य खुद अपने जीवन का मार्ग हैं। मनुष्य के रूप में हमें क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए उसके बारें में नित्य ही भीतरी आवाज उठती रहती हैं। लेकिन भाग दौड़ भरी जिंदगी में कुछ छूट जाता है तो उसे याद करवाने का छोटा-सा काम इस ब्लोग के जरिए करता हूं। विश्व में विपश्यना के प्रसारक सत्यनारायण गोयन्काजी के प्रवचन में मुझे ये बात सुनने में आई। बात बहुत अच्छी है, तो उसे बाँट रहा हूं।


मनुष्य की जीवन गति इन चार बातों पर निर्भर हैं। जन्म से जो स्थिति मिलती है उसे हम बदल नहीं सकते। मगर हमारी अपनी जिन्दगी की चाहत में काफी-कुछ सीख सकते हैं। अपने जीवन से प्यार होना एक बहुत ही सुंदर बात हैं। प्रयास पूर्वक कुछ विशिष्ट करना है, तो कुछ हो सकता हैं। इसके लिए हमारा मन तैयार है, बस इतना जरुरी हैं। गोयन्काजी ने कही चार बातों को आपके सामने रख रहा हूँ। इन चार स्थितियों में हम कौन-सी स्थिति में हैं ? ये हमें ही तय करना पड़ेगा। इन चार स्थितियों में से कहां जाना है ? वो भी हमें ही तय करना हैं।

From darkness to darkness.
अंधकार से अंधकार की ओर
From light to darkness.
प्रकाश से अंधकार की ओर
From light to light.
प्रकाश से प्रकाश की ओर
From darkness to light.
अंधकार से प्रकाश की ओर

गोयन्काजी के विचार की मूल विभावना हमें 'बुद्ध दर्शन' में दिखाई पडती हैं। 'अप्प दीपो भव' ये बुद्ध कालीन पाली भाषा का वाक्यांश है। जिसका अर्थ है 'अपना दीपक स्वयं बनो' या 'खुद का प्रकाश स्वयं बनो' ये बुद्ध की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण उपदेश कहा जाता हैं। जो हर मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देता हैं। अपनी आंतरिक शक्ति और ज्ञान पर निर्भर रहने को प्रेरित करता हैं। तथा सत्य और सही आचरण के मार्ग पर चलने के लिए भी प्रेरित करता है। भगवान बुद्ध अपने भीतर के प्रकाश मतलब ज्ञान, विवेक और सत्य को खोजने और उस पर विश्वास करने का अद्भुत संदेश देते है।

अब उन चार स्थितिओं को फिर एकबार पढ़ ले। सबसे अच्छी स्थिति वो मनुष्य खुद निर्माण करता है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर गति करता हैं। ये जीवन के ख़ूबसूरत क्षण कहलायेंगे। जो इन्सान जागता हुआ हैं, वो कदापि अंधकार में डूबता नहीं हैं। चाहे कुछ असुविधाओं में जीना पडता हो। अवहेलनाओं में से गुजरना पड़ता होता हो। जन्म के कुछ अमानवीय बंधनों से जूझना पड़ता हो। इसे जीवन का अंधेरा मान ले फिर भी उस इन्सान की नज़र प्रकाश की तरफ रहती हैं। वो कभी हारता नहीं, वो कभी अमानवीय स्थिति के दलदल में फंसता नहीं। ईश्वर ऐसे इन्सान को सही दिशा में पहुंचा ही देते हैं। अंधकार से प्रकाश की ओर...एक मानवीय मुकाम की ओर वो पहुंच ही जाता हैं।

हमारी आज अच्छी हैं, प्रकाशमान है। तो उसको बचाए रखने की या उस स्थिति को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी हमारी हैं। आज के उपर ही कल निर्भर हैं। हमारा जीवन अच्छा हैं तो इसे ईश्वर की कृपा समझेंगे। आज ठीक नही हैं फिर भी अच्छा करते रहना हैं। उससे आनेवाला कल बेहतरीन होगा। इन चार बातों में मनुष्य जीवन की प्रकृति बताई गई हैं। हमें हमारी प्रकृति खुद तय करने का अधिकार हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
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Spring sings within me..!

  मम अन्तः वसन्तः गायति...! आज वसंत के साज छेडने का मन हैं। सहज ही वसंत मुझे छेड़ रही हैं। वैसे तो सबका यहीं अनुभव होगा। चलो, आज वसंत के साथ...

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