Dr.Brieshkumar Chandrarav

Sunday, April 19, 2026

The real friendship..!
April 19, 20260 Comments

Aristotle taught that there are three kinds of FRIENDSHIP.

अरस्तू ने सिखाया कि मित्रता तीन प्रकार की होती है।

दोस्त, मित्र, सखा, साथी, यार, संगी और सहचर शब्द के अर्थ एक ही हैं। ये शब्द स्नेह, विश्वास और साथ रहने का अदम्य भाव प्रकट करनेवाले हैं। दोस्त और दोस्ती के बारे में काफ़ी कुछ कहा गया हैं, लिखा गया हैं। साहित्य में भी कईं काव्य-कथावार्ताएं मिलती हैं। फिल्म जगत में भी कईं फिल्मों के सब्जेक्ट्स 'दोस्त और दोस्ती' आधारित होते हैं। मनुष्य जीवन के ईस सुंदर संबंध के बारे में कुछ लिखने का प्रयास करता हूं। यह ब्लॉग मेरे जीवन के सभी दोस्तो के नाम करते हुए आनंदित भी हूं। अरस्तू की तीन प्रकार की मित्रता की बात को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं। उनके तीन प्रकार में,


1.
friendship of utility based on benefit.
● लाभ पर आधारित उपयोगितावादी मित्रता।
संबंध की सबसे बूरी बात हैं उसमें बेनिफिट देखना हैं। मनुष्य के रुप में कईं संबंध 'बायोलोजीकल' रुप से होते हैं। जैसे कि माता-पिता-भाई-बहन वगैरह...लेकिन मित्रता के संबंध में अपनी खुद की पसंद नहीं होती हैं। दो व्यक्ति जब अनायास मिलते हैं और उनके बीच गहराई वाला रिश्ता निर्माण हो जाता हे, तब 'दोस्ती' जन्म लेती हैं।  इस प्रकार के पवित्र बंधन में लाभ या बेनिफिट का विचार करना कैसे ठीक होगा ? फिर भी संसार में ये संभव हो रहा हैं। इससे लाभ किसको मिलता हैं ये भी हम भलीभांति जानते हैं। लेकिन जो रिश्ता हमारी मर्ज़ी से हुआ हैं उसके बारे में पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए।

2.friendship of pleasure based on enjoyment.
● आनंद पर आधारित आनंदवादी मित्रता।
कोई ऐसा साथ जो हमें आनंद देता हैं। उसके साथ समय बिताना हमें अच्छा लगता हैं। उसके आने से मानो हमारी परेशानियाँ खत्म सी हो जाती हैं। हम किसी भी स्थिति में उसे याद करते हैं। वो हाजिर होता हैं। वो हमारा विश्वास बन जाता हैं ऐसी मित्रता आनंद पर आधारित हैं। पहेले प्रकार से ये अच्छी मित्रता कहलायेगी। जीवन के अच्छे मुकाम के लिए ऐसा कोई संबंध बेशक जरुरी हैं। स्वार्थ से परे केवल आनंद के लिए बनाया गया रिश्ता नुकशानकारक कभी नहीं रहेगा। भले उससे लाभ हो या न हो। इसलिए आनंद सबसे बड़ी बात हैं।

3.True friendship based on virtue.
● सद्गुण पर आधारित सच्ची मित्रता।
कईं रिश्ते समझ से बाहर होते हैं। कभी हमें भी समझ में नहीं आता। दूसरों को समझने की तो बात ही नहीं हैं।
वो रिश्ता क्यों है ?
इससे क्या लाभ हैं ?
मैं क्यो उसके करीब रहना पसंद करता हूँ ?
उसके बगैर जीवन में कुछ कमी महसूस क्यो होती है ?

इन सवालो का खडा होना जहाँ मुमकिन ही नहीं वो रिश्ता, वो मित्रता सबसे सुंदर हैं। जिसमें केवल हृदय का बंधन हैं। मिलने की उम्मीदें कायम रहती हैं। बस बातें करते रहेना..! उसके साथ समय बिताना..! इसका का कोई अंत नहीं होता। मन में ऐसा क्यो हो रहा है ऐसा संदेह भी नहीं उठता। उसके साथ केवल जीने का मन करे ऐसा रिश्ता ईश्वर की कृपा से ही संभव होता हैं। 'बेस्ड ओन वर्च्यु' इसे कहते हैं।

इन तीन प्रकार के मैत्री संबंध को मैं कोई 'जेन्डर बायस' या किसी दूसरे पूर्वग्रह से परे देख रहा हूं। यहां केवल व्यक्ति की मनुष्य की बात हैं। कोई फिलसूफी नहीं हैं, किसी धर्म-संप्रदाय के बंधन नहीं हैं। ये बात इक्वालिटी से परे जाकर समझ में आएगी। जहाँ केवल अपनापन पनपता हैं। जहाँ केवल प्रेम जी रहा होता हैं। जहाँ केवल ईश्वर की ही मर्जी कायम रहती हैं।

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Wednesday, April 1, 2026

I will want to change myself..!
April 01, 20260 Comments

Change yourself the world will change.

हमारे महात्मा गांधी की "खुद को बदलो, दुनिया बदलेगी" यह सैद्धांतिक रूप की मान्यता है।

Your own resonance can alter the world around you.
आपकी स्वयं की प्रतिध्वनि आपके आस-पास की दुनिया को बदल सकती है।

इसे पढ़कर मस्तिष्क में झनझनाहट पैदा होती है तो आगे पढ़ना जरुरी हैं। बात शुरु करने से पहले मैं कुछ ऐसा कहता हूँ। क्योंकी ये बात आगे पढने से समझ में आ जाएगी।

उल्लू बनो...!
अरे भाई क्यो बनना हैं उल्लू ?

संसार में उल्लू एक ऐसा पक्षी है जिसे दिन कि अपेक्षा रात में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ता है। उन्हें रात का पक्षी (Nocturnal Birds) कहा जाता हैं। अपनी बड़ी आंखे उसकी पहचान हैं। जैसे बड़ी आंखें बुद्धिमान व्यक्ति की निशानी होती है। वैसे उल्लू को भी बुद्धिमान माना जाता है। हालांकि ऐसा जरूरी नहीं है पर कुछ प्रचलित पौराणिक मान्यतावाली कहानियों में उल्लू को बुद्धिमान माना गया है। एक ओर विशेषत में उल्लू अपनी गर्दन पूरी तरह से घुमा सकता है। इसके कान बेहद ही संवेदनशील होते हैं। रात में जब कोई शिकारी जानवर थोड़ी-सी भी हरक़त करता है, तो इसे तुरंत पता चल जाता है। और उसे वो दबोच लेता है। इसके पैरों में नाखूनों-वाली चार अंगुलियां होती हैं। इसके कारण शिकार को दबोचने में उसे विशेष सुविधा मिलती है। चूहे इसके विशेष शिकार होते हैं।


प्राचीन यूनानियों में बुद्धि की देवी, एथेन के बारे में कहा जाता है कि वह उल्लू का रूप धारण करके पृथ्वी पर आई हैं। भारतीय पौराणिक कहानियों में भी यह उल्लेख मिलता है कि उल्लू धन की देवी 'लक्ष्मीमाता' का वाहन है।  हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है। एक ओर भी मान्यता चल रही है कि इन्सान की मृत्यु का समय उल्लू को पहले से पता चल जाता है। और तब वो आसपास के पेड़ो पर अक्सर आवाज़ लगाने लग जाते हैं।

एक तो उल्लू निशाचर पंछी है, जो अपनी बड़ी आँखे और गोल चेहरे के कारण बहुत प्रसिद्ध है। साथ में उल्लू के पंख बहुत ही मुलायम होते हैं, इसके कारण रात के सन्नाटे में उड़ते समय आवाज़ नहीं होती। ये बहुत ही कम रोशनी में भी देख लेते हैं। रात में उड़ान और शिकार में उसे कोई परेशानी नहीं होती। धरती पर जैविक संतुलन बनाने में उल्लू की अहम भूमिका है। चूहे-छछूंदर और हानिकारक कीड़े मकोड़ों का शिकार करने के कारण इन्हें प्रकृति के 'सफाईकर्मी भी कहेते हैं। शायद इसी कारण हमारे पड़ोसी देश मलेशिया में किसान फसल बचाने के लिए उल्लू पालते हैं।

उल्लू अन्धकार में स्पष्ट देख सकता हैं और अपनी दिशा तय कर सकता है। वह संसार के शोर से दूर रहकर अपने भीतर के अंधकार को देखता है। यह बताता है कि वास्तविक बुद्धिमत्ता जो अंधकार यानि अज्ञानता में से प्रकट होती हैं। संकट में से सही निर्णय लेने को बुद्धिमत्ता कहते हैं। साथ ही उल्लू शांत, धैर्यवान और एकाग्रचित होता है। इस बात के साथ हम थोड़ी सहमति जताए तो...धन प्राप्ति के लिए विवेक-धैर्य और मौन का बड़ा महत्व हैं। चुपचाप कर्म करो और अंधकार में से प्रकाश खोजने की मनसा रखो। इस तरह उल्लू तो शक्ति और दूरंदेशी का प्रतीक हैं, ऐसा समज में आता है। माता लक्ष्मीजी ने उल्लू को अपना वाहन क्यों बनाया हैं ? अब ये सहज ही समझ में आ जाएगा।

अपने जीवन के ध्वनि को सुनना हैं तो शांत बनना पड़ेगा। मैं संसार को बदलने के लिए नहीं निकला हूँ। मैं खुद को बदलने निकला हूँ। इस प्रक्रिया के दौरान जो कुछ परिवर्तन आते हैं उसे शांत होकर आनंद पूर्वक स्वीकार करना हैं। इससे बाहरी दुनिया में क्या परिवर्तन आते हैं उससे मुझे अधिक निस्बत नहीं हैं। मुझे Change ourselves खुद को बदलें में आनंद मिलता हैं। मैं इसे जीवन का मूलभूत आनंद कहते हुए मन से भर रहा हूं।

उल्लू की अपनी निजी दुनिया हैं, अंधकार से भरी तो अंधकार से...! लेकिन अपनी दृष्टि को स्थिर रखना-स्पष्ट रखना ये बहुत जरुरी हैं। शांत होकर स्वयं अपने भीतरी ध्वनि को पकड़ना हैं। ईश्वर ने मुझे जो कुछ क्षमताएँ दी हैं, वही मेरी मूलभूत शक्ति हैं। खूद को महसूस करना हैं। अँधेरे से डरना नहीं है, अँधेरे में छुपे उजियारे को महसूस करना हैं। प्रकृति के शांत स्वर में अपनी उड़ान को खोजना हैं। ये सब करनेवाला एक छोटा-सा पंछी उल्लू हैं...! इसीलिए मुझे उल्लू बनना हैं। हां, मैं उल्लू हूं उल्लू बनना चाहता हूं !!

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Thursday, March 12, 2026

Our thought process..!!
March 12, 2026 2 Comments

This is the nature of your Mind. if you try to avoid certain thoughts, only those will occur.

SADGURU.

आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप कुछ विचारों से बचने की कोशिश करेंगे, तो केवल वही विचार उत्पन्न होंगे।


मन के स्वभाव को समझना मुश्किल हैं। मन को चंचल कहा गया हैं। मन की दौड को पकड़ना कठिन हैं। मन की गति को आज तक नापना संभव नहीं हुआ हैं। मन अदृश्य होकर भी हमें बांधकर रखता हैं। मन की तरंगे उठती हैं, शांत होती हैं। इन तरंगो के ईशारे हम नचाते हैं। हम चाहकर भी कोई विचार को बंद नहीं कर सकते, मतलब हमारे दिमाग को हम ऐसा कोई आर्डर भी नहीं दे सकते। विचार की मूल ही अवधारणा बहना हैं। इसी लिए सद्गुरु के उन वचन को एकबार ओर पढ़िए। "आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप कुछ विचारों से बचने की कोशिश करेंगे, तो केवल वही विचार उत्पन्न होंगे।" मतलब विचारों से बचना नामुमकिन हैं। उसे बहने देना ही ठीक हैं।

अब एक दो प्रश्न उठते हैं।
विचारों की इस अस्खलित धाराओं में केवल बहना हैं ?
या फिर,
विचारों को रोकने का प्रयास करना हैं ?

चलों कुछ ऐसा सोचते हैं जिसे कुछ हल मिले ऐसा फिटिंग्स आए। विचारों को रोकने का प्रयास करना व्यर्थ हैं, उसे रोकना नहीं है केवल दिशा बदलनी हैं। जो विचार मन में उद्घटित होते हैं, उसमें से जीवन खोजना हैं। अपने लिए जरुरी है, हमारे जीवन में आनंद भरने वाले, हमारे आनेवाले समय को बेहतर बनाने वाले विचारों को छूटे दौर से प्रगट होने देना हैं। कोई हरक़त के बिना उसका स्वागत करते रहना हैं। एक बात समझ लेनी चाहिए। कि विचार हमारे अनुभवो की पड़छाई हैं। जीवन में जो कुछ घटित होता है, वो बार बार विचार का रुप धरकर हमारे सामने आते हैं। कल्पना के जरिए वो हमारे वर्तमान को प्रभावित करते हैं। कभी-कभार हम इस विचार की आँधी में फंस भी जाते हैं। इसने कईं प्रकार के रोगो का स्थान भी ले लिया हैं।


विचार एक प्रवाह हैं, हमें इस प्रवाह का आनंद लेना हैं। विचार तो जीवन का आधार हैं। हम इस आधार से डरे या दूरी बनाएं ये कैसे संभव होगा। सुंदर विचार के लिए मन की शुद्धि आवश्यक हैं। मन में किसी के लिए भी कटुता पैदा हुई तो समझो जीवन बेकार हो जाएगा। मन में इस कटुता के कारण वैमनस्य या असूया बढ़ेगी। और इसको झेलना तो खुद ही पड़ेगा, कोई बचानेवाला नहीं हैं। 'विचारआनंद' के लिए हमारे पास ध्यान विधि है, धर्माचार हैं साथ ही आध्यात्मिक गति हैं। ये तीन हमारी मूलभूत सम्पदाएं हैं। इससे ही मनुष्य जीवन में वैचारिक आनंद की प्राप्ति हो सकती हैं। विचार प्रवाह को 'आनंदगति' एवं 'योग्यदिशा' मिल सकती हैं।

सांप्रत समय में सब समस्याओ का समाधान मिल सकता हैं। आज मनुष्य भौतिक वआर्थिक रूप से संपन्न होता जा रहा हैं। फिर भी मनुष्य वैचारिक दुर्बलता में फंसे जा रहे हैं। इसका कारण धर्म अस्पष्ट होता जा रहा हैं। ध्यान की क्रियाएं मनोरंजन से भरी होती जा रही हैं। आध्यात्म केवल दिखावे का साधन बनता जा रहा हैं। आज ज्ञान-विज्ञान के युग में, स्पष्टता के युग में भी मनुष्य बेबस होता जा रहा हैं।

इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं ?
सत्य क्यों प्रताडित हो रहा हैं ?
भारत वर्ष की वैचारिक धरोहर क्यो डगमगा रही हैं ?

वैयक्तिक स्वार्थ, ज्ञाति-जाति-धर्म-संप्रदाय आधारित संगठनात्मक स्वार्थ वैचारिक दूषण फैलाता हैं। इससे किसीको फ़ायदा होनेवाला नहीं हैं फिर भी चल रहा है। आज समृद्ध विश्व में समस्याएँ बढ़ रही हैं इसका कारण वैचारिक दुर्बलता हैं। खैर, मनुष्य के रूप में अच्छे बुरे वर्ताव का फर्क समझमें आना, अच्छाई को सीखना खुद के लिए जरुरी हैं।

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Tuesday, March 3, 2026

NO OUTER Defeat you..!
March 03, 20260 Comments

If you refuse to lose your inner Happiness no outer loss can truly Defeat you..!

Brahma kumaris.

"यदि आप अपनी आंतरिक खुशी को खोने से इनकार करते हैं, तो कोई भी बाहरी नुकसान आपको हरा नहीं सकता।"


भारत एक आध्यात्मिक राष्ट्र हैं। आत्मचेतना संबंधित कईं पहलूओ पर यहां काम होता हैं। काम शब्द ठीक नहीं लगता हैं। इसलिए सत्वशील शब्द से बात रखता हूं। योग-तप-ध्यान-साधना-समाधि जैसे कईं जीवन को बेहतर मार्ग पर ले जानेवाली गतिविधियों पर कार्य होता रहा हैं।

ब्रह्माकुमारीज़ Brahma Kumaris एक अंतरराष्ट्रीय महिला-नेतृत्व वाला आध्यात्मिक संगठन है। जो 'राजयोग ध्यान' के माध्यम से आत्मचेतना, आंतरिक शांति और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने का उत्कृष्ट कार्य करती है। १९३० के दशक में स्थापित हुई यह संस्था सभी मनुष्यों को एक समान मानती है। और स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन का महान लक्ष्य रखती है। इसका मुख्यालय माउण्ट आबू राजस्थान में है।


ब्रह्माकुमारीज विचार वैयक्तिक जीवन को शांति प्रदान करने का कार्य करती हैं। उनकी सादगी-मौन मुझे बहुत ही पसंद हैं। उनके आध्यात्मिक विचारों में से आंतरिक खुशी शब्द मिला हैं। खुशी हमारे भीतर हैं, उसे बरकरार रखना हमारे ही हाथ में हैं। उसे हमें खोना नहीं हैं; हम खुद उससे झुडे रहेंगे तो दुनिया की कोई ताक़त उसे मिटा नहीं पाएगी। भीतर की खुशी, हमारी शांति पर बाहरी स्थिति कोई नुकशान नहीं कर सकता ऐसा दृढ़-विश्वास रखना चाहिए।  इससे हमारे जीवन को फायदा होगा। आज के समय में मनुष्य जीवन में आनंद Happiness को महसूस करना सबसे बड़ी चुनौती जैसा हैं।

क्यों सबसे बड़ी चुनौती है ?
क्योंकि हम जिस समय में रहते हैं, इस समय में प्रतिस्पर्धा बढ़ी हैं। वैसे प्रतिस्पर्धा तो ठीक है लेकिन किसी दूसरे को परेशान करके खुद आगे बढ़ने की चेष्टा ख़तरनाक हैं। अक्सर इसके परिणाम विचित्र होते हैं। दूसरों की गति को रोककर क्षणिक आनंद मिल सके ऐसा संभव हैं। उस आनंद को लोग सफलता मानते हैं, बुद्धि चातुर्य मानते हैं। अपनी जीत बताते हैं। ऐसी षड़यंत्रकारी वृत्ति से मिला लाभ कायम नहीं टिकता। इसके बारें में भी सोचना अच्छा हैं। किसीको जातिवाद, प्रांतवाद या संप्रदायवाद की संकुचितता से हल्का समझना वैयक्तिक दुर्बलता से कम नहीं हैं। एक राष्ट्र की एक धर्म की कल्पना ऐसे टूटती हैं। वैयक्तिक स्वार्थ और अपनी ही बात को स्थापित करने के मत से किसको नुकसान होगा इसके बारें में हमें ही सोचना होगा।

इन स्थितियों में एक व्यक्ति साम्यता को प्रेम-आदर की भावना को पालता हैं। उसे भयंकर विचित्रओं के सामने कैसै संभलने हैं इसका यह मंत्र हैं..."No outer loss can truly Defeat you..! कोई भी बाहरी नुकसान आपको हरा नहीं सकता।" खुद संभलने का यह अद्भुत संदेश हैं। युद्ध किये भी जाते हैं और टाले भी जाते हैं। विध्वंश के सामने संवर्धन भी हैं। हमारा वैयक्तिक और सामूहिक चयन किस मार्ग के लिए हैं !? इसके बारे में सोचना तो बनता हैं। सोच होगी तो अच्छे मार्ग का चयन भी होगा। मनुष्य जीवन को बेहतर मार्गर दिखाने वाले ब्रह्माकुमारीज जैसी विचारधारा को वंदन करता हूं।

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Wednesday, February 25, 2026

Supernatural spirits..!
February 25, 20260 Comments

The mystery of some supernatural spirits.

कुछ अलौकिक आत्माओं का रहस्य..!

एक तरफ़ समष्टि हैं, एक तरफ़ हमारा जीवन हैं। वैसे तो हम भी समष्टि का ही एक भाग हैं। लेकिन दो पहलूओं का अस्तित्व भी अलग हैं, इसलिए दो शब्दों में विभाजित करता हूँ। एक तरफ़ पर्यावरण है, आसमान की शून्यता हैं, एक ओर अदृश्य आत्मा हैं। इन सबके बीच संसार की गतिविधियां हैं। जन्म-जीवन और मृत्यु का फ़ासला हैं। छोटी-सी चींटी से लेकर कद्दावर हाथी तक के जीव की कहानियाँ हैं।

आज हम बात करेंगे कुछ अलौकिक आत्मा को लेकर पैदा हुए इन्सानों की। इस अंतरंगी विशाल सृष्टि में कितने लोग हैं..!? सबका अपना अस्तित्व हैं। सबके अलग चेहरे और सबकी अलग सोच हैं। सबकी पसंद नापसंद भी विभिन्नता से भरी हैं। खान-पान, रहन-सहन और भाषाभूषा भी अलग हैं। इनमें किसी को हम महान आत्मा के तौर पर स्वीकार करते हैं। उनका स्वीकार करते हैं साथ में उनका अनुसरण भी करते हैं। सबके लिए ऐसा होना संभव नहीं हैं। ऐसा थोड़े बहुत लोगों के लिए ही संभव हैं। एक श्लोक के जरिए हम इसे समझने का प्रयास करें..!
केचन आत्मान: स्थायिन: न भवन्ति
बोधनाय प्रविश्य उत्क्रांतये निर्गच्छन्ति।
Some souls are not meant to stay. They enter to awaken you and leave to evolve you. कुछ आत्माओं का यहाँ रहना तय नहीं होता। वे हमें जागृत करने के लिए आती हैं और आपको विकसित करने के लिए चली जाती हैं।


Friedrich Nietzsche फ्रेडरिक नीत्शे  जो जर्मनी के दार्शनिक और मनोविश्लेषणवादी थे। इस संसार में उनका जीवनकाल 15 अक्टूबर 1844 से 25 अगस्त 1900 तक का रहा था। अस्तित्ववाद एवं परिघटना मूलक चिंतन Phenomenalism के विकास में नीत्शे की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। युरोय के व्यक्तिवादी तथा राज्यवादी दोनों प्रकार के विचारकों ने नीत्शे से प्रेरणा ली थी। जर्मन कला-साहित्य पर नीत्शे का गहरा प्रभाव भी रहा है। उसे 'नीत्शेवाद' से जाना जाता है।

फ्रेडरिक नीत्शे 24 वर्ष की ही आयु में 'बेस्ल विश्वविद्यालय' में भाषा-विज्ञान के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हो गए थे। एकबार वो विद्यालय के दरवाज़े पर खड़े हो गए। उनके हाथ में एक बाॅर्ड था। इनमें लिखा था: "ईश्वर की मृत्यु हो गई..!" सारे छात्रों को अचरज हुआ। पूरे विद्यालय में यह बात फैल गई। इकट्ठे हुए सब लोग अपने विद्वान प्रोफ़ेसर के कारनामे से अचंभित थे। फिर नीत्शे ने उसपर प्रकाश डालते हुए कहा: " जब तक ईश्वर जिंदा है तबतक हम कुछ करने के प्रयास में आलस्य करेंगे। हम बिना प्रयत्न से सिर्फ़ ईश्वर पर भरोसा करके बैठे रहेंगे। लेकिन कोई ईश्वर हमें बिना लगन बिना प्रयास से कुछ भी देनेवाला नहीं हैं। ऐसा प्रतित होगा तब इस पुरुषार्थ के महत्व को समझ सकते हैं। इतना सुनते ही सब शांत हो गए और नीत्शे का कहना समझ भी गए..!"

हमारी श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के सिद्धांत के बारे में ही कहा हैं। अकर्मण्य तो विष समान हैं। श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय के इस श्लोक से हम सब भलीभांति परिचित हैं। भगवान कहते हैं :
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
"तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करना ही है| कर्मों के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है| अतः तुम निरन्तर कर्म के फल पर मनन मत करो और अकर्मण्य भी मत बनो।"

'ज्ञान-कर्म' की गहराई को स्थापित करने हेतु महान आत्माएं इस धरती पर अवतरित होती रहती हैं। समष्टि का उचित मार्गदर्शन करती हैं। और एक सिमास्तंभ रुप कार्य करती हैं। जीवन का बहतरीन उद्देश्य सिखाकर चली जाती हैं। सारे संसार में ऐसी बहुत कम आत्माएँ जन्म धारण करती हैं। ये ईश्वर की ही अदृश्य करामात हैं। कईं लोग उनके व्यक्तित्व को कलुषित करने का प्रयास करते हैं लेकिन कुछ नहीं कर पाते। वो अपना निमित कर्म दमदार तरीके से पूरा करते हैं। वे महान आत्माएं संसार को जागृत करके विकसित होने का पाठ सिखाकर दुनिया छोड़कर चली जाती हैं। हमारे भारतवर्ष की ऐसी कईं आत्माओं को नमन करता हूँ। स्वामी विवेकानंद का एक नामस्मरण काफ़ी लगता हैं। बाकी आप सब जिस चरित्र से प्रभावित है उनके बारें में अपना अहोभाव प्रकट कर सकते हैं।

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Sunday, February 15, 2026

Enduring of love..!
February 15, 20260 Comments

Love needs breathing Natural, graceful, enduring.

प्रेम को स्वाभाविक, सुंदर और स्थायी रूप से सांस लेने की आवश्यकता होती है।

बेहतरीन शब्द और विचारों का मैं दिवाना हूँ। एकबार कोई विचार मुझे पसंद आ जाए फिर उस पर चिंतन शुरु हो ही जाता हैं। शायद ये मेरी बेहतरीन कमज़ोरी भी हैं। मुझे इस कमजोरी से प्यार हैं। इन्ही स्वभाव के कारण शायद अच्छे शब्द-विचार के संपर्क में आना सहज हो जाता हैं। healing hearts page पर से एक विचार मिला। चलों, इसे हम प्यार से समझे और अपना अच्छावाला मूड़ बनाए।

सांस लेने की जरुरत हरेक जीव को होती है। साथ में हरेक शरीर को भी होती हैं। लेकिन यहाँ तो प्रेम को स्वाभाविक सुंदर और स्थायी रुप से सांस लेने की आवश्यकता है, ऐसा कहा गया हैं। प्रेम खुद स्वाभाविक हैं, प्रेम को शरीर नहीं हैं, आकार नहीं हैं। प्रेम सचेतन भी नहीं हैं। प्रेम की कोई आवाज भी नहीं हैं। प्रेम रंग और सुगंध से भी परे हैं। प्रेम को प्रकृति की किसी भी वस्तु के साथ तुलना कर सकते हैं। जहाँ ख़ुशनुमा वातावरण दिख़े वहाँ प्रेम प्रकट होगा ही होगा। लेकिन दिखाई नहीं पड़ेगा, तो प्रेम सांस कैसे ले सकता हैं !? जरा, सोचने में जोर लगना पड़े ऐसी बात हुई हैं। चलों, आज कुछ हवा जैसा बनकर अदृश्य प्रेम को पकड़ने का थोड़ा प्रयास करते हैं। जहाँ प्रेम दिखे वहाँ एकदम से रुक जाएंगे...!


प्रेम तो अक्सर सांस लेता हैं। प्रेम सृष्टि का अनमोल 'स्थायीभाव' हैं। वो सृष्टि के कण-कण में समाहित हैं। सृष्टि की हरेक सुंदरता में प्रेम हैं। हवा के हरेक झोंके में, हरेक लहर में प्रेम बसा हैं। प्रेम के साथ स्वाभाविकता खड़ी हो तो ही वो प्रकट होगा। मनुष्य जीवन के दूसरे भावो की तुलना में प्रेम की कीमत भारी हैं। जब प्रकृति में दो वस्तु या व्यक्ति के बीच एकत्व का संचार होता हैं। तब अद्वैत का पुष्प आकारित होता हैं। उसे हम प्रेम कहते हैं। जब एक दूसरे का सानिध्य बनता है, तब प्रेम सांस लेता हैं।

प्रकृति में से एक घटना लेते हैं। जब धरती की तृषा बढ़ जाती हैं, गर्मी सीमा तोड़ रही होती हैं, व्याकुलता की पराकाष्ठा के बाद बादल का बरसाना एक अदृश्य होकर भी जीवंत घटना हैं। तब धरती के सांस की महसूसी शानदार होती हैं। हमें भी वो पहेली बारिश की खुशबु याद रहती हैं। हमारी सांसो को भी ये महसूस होती हैं। ये हैं, सांसो का कमाल, ये प्यार की खुशबु हैं। मनुष्य के रुप में हमारी सांसे भी ईश्वर के दिये हुए 'प्रेमपुष्प' से कम नहीं हैं। उस पर हमारा अधिकार भी नहीं हैं। "जितनी चाबी भरी रामने उतना चले खिलौना..!" गीत की तरह शरीर को जितनी सांसे मिली हैं इतना चलेगा। हरेक जीवन को मिली सांस और धड़कन निराकार ईश्वर की देन हैं। इस सत्य का स्वीकार करना न करना वैयक्तिक स्तर की बात हैं। संसार प्रेम के लिए ही आकारित हुआ हैं, ऐसी मेरी दृढ़ मान्यता हैं।

प्रेम जहाँ पलता है वहाँ सांस एक संगीत की तरह बजने लगता हैं। जहाँ जीवंतता है वहां अक्सर प्रेम पनपता ही जाता हैं। वहाँ अदृश्य़ सांसे चलती ही रहती हैं। इसे अद्भुत अनुभूति समझकर चलेंगे तो जीवन आनंद से हराभरा रहेगा। सृष्टि के झड-चेतन सभी पहलूओं में सांस है तब-तक उनका अस्तित्व रहता हैं। शायद इसे 'प्रेमबंधन' कहो, इसके कारण कोई स्थिति कायम रहती हैं। बाकी सनातन बने रहना कठिन हैं। हां, प्रकृति और सनातन जहां विद्यमान हैं, वहाँ हमेशा प्रेम सांस लेता ही रहता हैं। सांस की सुंदरता और स्वाभाविकता कायम रहती है। चलो, प्रेमभरी सांसो को महसूस करे..!

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Wednesday, February 4, 2026

Spring sings within me..!
February 04, 20260 Comments

 मम अन्तः वसन्तः गायति...!

आज वसंत के साज छेडने का मन हैं। सहज ही वसंत मुझे छेड़ रही हैं। वैसे तो सबका यहीं अनुभव होगा। चलो, आज वसंत के साथ आनंदभरी मस्ती करते हैं। पहले दो सुंदर कृति का आस्वादन करें..! फिर आगे बढ़ते हैं। अच्छे शब्द विचार से झुडते हैं।

मैं देख रहा हूँ..!
झरी फूल से पँखुरी,
मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।
मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
स्रोत : पुस्तक : सन्नाटे का छंद (पृष्ठ 87) संपादक : अशोक वाजपेयी रचनाकार : अज्ञेय प्रकाशन वाग्देवी प्रकाशन संस्करण :1997

वसंत
जब तक तुम हो डर नहीं हमें।
पेड़ ने कहा:
और अपनी एक-एक पत्ती झरा दी।
स्रोत : पुस्तक : पेड़ अकेला नहीं कटता (पृष्ठ 20) रचनाकार : दफ़ैरून प्रकाशन : रामकृष्ण प्रकाशन संस्करण : 2001

वसंत को हम प्रकृति की श्रद्धा कहते हैं। प्रकृति का एक स्वभाव खिलना और सँवरना भी है। ईश्वर की यह अद्भुत करामात हैं। अदृश्य होकर भी वो एक ऐसा मंजर खडा करते हैं जिसमें सबका कल्याण ही कल्याण बसा हैं। सृष्टि के सभी चेतन-अचेतन पहलूओं को स्पर्श करनेवाली वसंत इसका जबरदस्त प्रमाण हैं। एक और बात पतझड़ की बेला शीत ऋतु में आती हैं। उस वक्त पत्तों का गिरना प्राकृतिक रुप से संभव नहीं लगता। और ग्रिष्म की शुरुआत में यानि की वसंत में नए पत्तों का उग आना भी अचंभे से कम नहीं हैं। शायद बारिश की मौसम में यह संभव लगता हैं। लेकिन ईश्वर को कुछ ओर ही मंज़ूर हैं। वो धूप में भी झरनों का बहाव कर सकता हैं। और रात के अंधेरे में भी फूल खिला सकता हैं। उसकी मर्ज़ी के अनुसार ही प्रकृति में बदलाव आते रहते हैं।


इससे यह पता चलता हैं की ईश्वर चाहे वो कर सकते हैं। किसीको अभाव या संघर्ष में से भी निकाल सकते हैं। केवल निकालना नहीं उसको उच्चतम शिखर पर स्थापित भी कर सकते हैं। उसके लिए यह सहज हैं, हम इसे चमत्कार भी कह सकते हैं। वसंत इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार हैं। ईश्वर की दुनिया चमत्कारों से भरी हैं। वो कुछ भी कर सकते हैं। वसंत को शायद ईश्वर भी चाहते हैं। उसका भी एक प्रमाण देखे...श्रीमद्भगवद्गीता के दसवे अध्याय के पैंतीसवे श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं,
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०•३५॥

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है ,जो ऋतुओ में कुसुमाकर अर्थात वसंत है, वह मैं ही तो हूँ। इसलिए कुसुमाकर की 'कृष्णप्रियता' में जीवसृष्टि का सृजन हैं। कुसुमाकर वो मौसम है जो कुसुम के एक-एक दल को पल्लवित करता हैं। इसे हम 'पुष्पऋतु' भी कहे तो भी एकदम ठीक हैं। अमराइयों में मंजरियो के रससिक्त होकर महकना और मधुमय पराग लिए उड़ाते भौरों के गुनगुनाने का अवसर है 'वसंतऋतु'..! इसे ऋतुराज या ऋतुओं की रानी भी कहा गया हैं। वसंत स्वयं ईश्वर को पसंद है इसलिए वो हमें भी पसंद पड़नेवाली हैं।

वसंत जैसे तरुवर का विश्वास है, वैसे वसंत सृष्टि की खुशबूदार मौसम भी हैं। साथ ही सौंदर्यां भी कह सकते हैं। धरती पर सुंदरता को प्रगटानेवाली ऋतु हैं। वसंत को मैं सौंदर्यां कहते हुए मन ही मन अलौकिक भाव में मस्त हो रहा हूँ। इसे मैं 'सौंदर्यांवसंत' की ही अनुभूति कहता हूं। साथ ही इसे मैं प्रकृति का 'सौंदर्यशास्त्र' कहते हुए एक हिन्दी सिनेमा 'सिंदूर' के गीत की कुछ पंक्तियाँ गा ने लगा। आप भी थोड़ा संमिलित होकर जीवन का आनंद लिजिए...! स्वर सम्राज्ञी लताजी और सुदेश वाडेकर के मधुर आवाज का मजा लीजिए..! वैसे तो यह गीत जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव जैसे पतझड़, सावन, बसंत के बीच प्यार के अनूठे मौसम बसंत में छुपे नाजुक प्रेम की भी बात करता हैं। 

पतझड़ सावन बसंत बहार,
एक बरस के मौसम चार, मौसम चार मौसम चार..!
पांचवा मौसम प्यार का इंतज़ार का,
पतझड़ सावन बसंत बहार...!

कोयल कूके बुलबुल गाए,
हर एक मौसम आये जाये,
लेकिन प्यार का मौसम आये,
सारे जीवन में एक बार, एक बार एक बार..!
पतझड़ सावन बसंत बहार..!

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
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The real friendship..!

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