Dr.Brieshkumar Chandrarav

Friday, June 5, 2026

We really need a sense of oneness of humanity.
June 05, 20260 Comments

14'th Dalai Lama says that...!

we all have right to achieve happy life.
हम सभी को सुखी जीवन प्राप्त करने का अधिकार है।


"So dear brothers and sisters. I always start mention brothers, sisters everywhere. That I deliberately using that word. because much troubl, We are facing is on the basis of much division. Religiously. Nationality and like that and the political economy system. so therefore we really need a sense of oneness of humanity. seven billion human beings, actually same human being. and mentally, emotionally, physically we are same. and then most important we all have right to achieve happy life."


इन शब्दो का हिन्दी अनुवाद करके रख रहा हूं। इसे भी पढ़ें और अपने भीतर के मनुष्य को शाता पहुंचाए। दरअसल यह केवल शब्द नहीं हैं मगर आदरणीय दलाई लामा के हृदय के भाव हैं। भाव की शुद्धता कैसी होनी चाहिए ? इसकी पराकाष्ठा बयां कर रहे है ये शब्द..! साथ ही उच्चतम व्यक्तित्व की पहचान कैसे होती हैं उसका भी उचित उदाहरण हैं, १४ वे दलाई लामा।

"तो प्यारे भाइयों और बहनों। मैं हमेशा हर जगह भाइयों और बहनों का जिक्र करके शुरुआत करता हूँ। मैं जानबूझकर इस शब्द का प्रयोग करता हूँ। क्योंकि हम जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश विभाजन पर आधारित हैं। धार्मिक, राष्ट्रीयता और इसी तरह के विभाजन और राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के कारण। इसलिए हमें वास्तव में मानवता की एकता की भावना की आवश्यकता है। सात अरब मनुष्य, वास्तव में एक ही मनुष्य हैं। मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से हम सब एक हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम सभी को सुखी जीवन जीने का अधिकार है।"

१४ वें दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध है। 'दलाई लामा' कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक उपाधि है, जिसका अर्थ है 'ज्ञान का सागर' तिब्बती मान्यताओं के अनुसार वे 'अवलोकितेश्वर' जिसका मतलब करुणा के 'बोधिसत्व' हैं। वे बोधिसत्व के अवतार भी माने जाते हैं। वर्तमान में जो चौदह वें दलाई लामा हैं, उनका मूल नाम लामा 'तेनज़िन ग्यात्सो' है। उनके बारे में कुछ प्रमुख और आवश्यक जानकारी इस प्रकार हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को पूर्वोत्तर तिब्बत के एक छोटे से गाँव, ताकत्सेर में हुआ था। बचपन में उन्हें ल्हामो थोंडुप नाम दिया गया था। दो वर्ष की आयु में ही उन्हें 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दे दी गई थी। दलाई लामा पुनर्जन्म से मिलते हैं, ऐसी उनकी धर्म मान्यता हैं। पडोसी देश चीन द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा करने और 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद उन्हें अपनी जान बचाने के लिए तिब्बत छोड़ना पड़ा था। विश्व की ये भयंकर करुणांतिका कही जायेगी। बाद में उन्होने भारत में शरण लिया। वर्ष 1959 में वे पैदल ही हिमालय पार करके भारत पहुंचे थे। तब से वे भारत के हिमाचल प्रदेश में स्थित 'धर्मशाला' में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। और यहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन निर्वासित तिब्बती सरकार का संचालन कर रहे हैं।

दलाई लामा के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी देने का प्रयास हैं। लेकिन मूलरुप से मैं उनकी कही हुई मानव सभ्यता की बात को इस ब्लोग के जरिए पहुँचाने का छोटा-सा प्रयास कर रहा हूं। आज विश्व में जो कुछ सत्वशीलता हैं, उसका जीवंत दस्तावेज वर्तमान दलाई लामा हैं। उनकी सादगी और मनुष्य मात्र के लिए समानता- बंधुत्व के भाव अद्भुत हैं। 'विश्वशांति' जिनकी सोच में तरबतर दिखाई पड़ती हैं। ऐसे महान पुरुष की बात करते हुए मैं धन्यता का अनुभव कर रहा हूं। आप एक अनमोल चरित्र को पढ़कर आनंद लिजिए। दलाई लामा के वैश्विक योगदान यानी की दुनिया भर में शांति, अहिंसा और करुणा का संदेश फैलाने के लिए उन्हें वर्ष 1989 में प्रतिष्ठित 'नोबेल शांति पुरस्कार' से सम्मानित भी किया गया हैं। एक प्रकार से सम्मान जरूरी हैं मगर उससे भी जरूरी हैं उनके विचारों को अपनाया जाए। महान ईश्वर की दुनिया को बेहतर रहने दिया जाए।

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Sunday, May 17, 2026

Practice Critical thinking..!
May 17, 20261 Comments

 

Analyze every situations, problems and informations from different angles. you will always get a different perspective.



आलोचनात्मक सोच का अभ्यास करने से हर परिस्थिति, समस्या और जानकारी का अलग-अलग दृष्टिकोण से विश्लेषण करें। इससे आपको हमेशा एक अलग नजरिया मिलेगा।

इस संसार में हमे जन्म से लेकर मृत्यु तक का जो जीवन मिला है यह सबसे बड़ा चमत्कार हैं। हमारी इस कहानी में काफ़ी कुछ होता रहता हैं। उसे मैं 'उथल-पुथल' शब्द कहूं तो चलेगा। हर स्थिति से हम अज्ञात हैं, हर समस्या से बेध्यान हैं और खुशीओं की बौछार से भी अनजान हैं। हाँ, पता है तो आजके लम्हें, अभी जो समय हमारे हाथ में है वो...! माफ करना, समय हमारे हाथ में नहीं, हम समय के हाथ में हैं। समय हमारे साथ चलता हैं या हम समय के साथ चलते हैं।


कुछ भी हाथ में नहीं है फिर भी चलना हैं। आशा और उम्मीद के आशियाने सजाकर हमें समय के साथ चलना हैं। जीवन की भागदौड़ से सीखते हुए और अपने सपने सजाते हुए। विचार और व्यवहार के साथ अपने जीवन की पहचान बनाने के लिए चलना हैं। इस अनजान पथ पर विचार का बड़ा महत्व हैं। 'जो सोचते है' वो हम बनते जाते हैं। विचार प्रक्रिया के साथ...! कुछ अलग करने का मन होता हैं तो आगे जरुर पढ़े, ये मेरी छोटी-सी गुजारिश हैं। Critical thinking..! 'आलोचनात्मक सोच' का अभ्यास करे। क्या हैं ये आलोचनात्मक सोच ?

"किसी भी जानकारी विचार या परिस्थिति का निष्पक्ष और तर्कसंगत विश्लेषण करने की क्षमता को हम आलोचनात्मक सोच कहते है।" बिना सोचे-समझे या मानने के बजाय ठोस साक्ष्य का स्वीकार करना या विश्लेषण और तार्किक मूल्यांकन के आधार पर सही और गलत का निर्णय लेना हैं। इससे लाभ होगा या नुकसान इसमें पड़ने की कोई वजह नहीं हैं। इसलिए सत्वशील विचार विमर्श के साथ जायेंगे तो ठीक रहेगा।

For steps of critical thinking.
Analysis.
विश्लेषण : विचार और तथ्यों को गहराई से समझना हैं।
Evaluation
मूल्यांकन : विचार के स्रोत की विश्वसनीयता की जाँच- पड़ताल करना हैं।
Inference
निष्कर्ष या अनुमान : उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सही तार्किक परिणाम तक पहुँचना हैं।
Self-Regulation
स्वयं अवलोकन : अपने स्वयं के पूर्वग्रह और भावनाओं को अलग रखकर सोचना हैं।

जिंदगीभर हमें विचार के साथ चलना है और उसके मुताबिक हमारे जीवन को व्यतीत करना हैं। ठीक ढंग से या दमदार तरीके से जीना है इसलिए विश्लेषण करना हैं, मूल्यांकन करना हैं, अनुमान करना हैं; या फिर स्वयं का अवलोकन करना हैं। विचार एक जबरदस्त प्रवाह हैं। इस प्रवाह में हमें तैरना हैं। ज़िंदगी की खुशहाली को ढूंढना होगा।

¤ जीवन केसे व्यतीत होग़ा ?
¤ क्या क्या मुसीबतें झेलनी पड़ेगी ?
¤ अच्छा होगा या बुरा ?
¤ मेरे सपने सच हो पाएंगे या नहीं ?

ऐसे सवालों के उत्तर खोजने में जिंदगी गंवाए बिना, नीचे दिए गये सवालों पर गौर करना होगा। मैं समझता हूं यही Critical thinking..! या फिर 'आलोचनात्मक सोच' हैं। हमें अपने जीवन का एक अलग ही नज़रिया चाहिए। इसके लिए हम तैयार हैं क्या !?

¤ मैं क्या कर सकता हूं ?
¤ समस्या से कैसे निपटा हैं ?
¤ मेरे दृष्टिकोण को कैसे ठीक किया जा सकता हैं ?
¤ मेरी सोचने की गति को किस दिशा में ढ़ालना हैं ?

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Wednesday, May 6, 2026

The decision is in your hands.
May 06, 20261 Comments

If you want to do something big in your life then run like a DEER.


"जिंदगी में कुछ बडा करना है तो 'हिरणवाली' दौड लगाए..!"


हिरण को अक्सर हम नाज़ुक कोमल और भयभीत पशु के रुप में देखते आए हैं। अपनी सुंदरता के कारण एवं अपनी मनोहर चाल के कारण उसको थोड़ा-बहुत भाव मिला हैं। किसी स्त्री की अच्छी चाल को 'हिरनी जैसी चाल' कहते सुना होगा। हिरण को हम सुंदरता और कोमलता के प्रतीक के रूप में मानते हैं। अपना सोने जैसा रंग और मासूम चेहरा हिरण को जंगल की खुबसूरती का एक मुकाम बनाती हैं। इस सुंदरता के पीछे एक ओर कहानी भी हैं, 'चपलता और प्रयास की कहानी...!' खुद को बचाने की एक बेहतरीन दौड़ की कहानी..! अपने प्रयास में जी-जान लगा देने की कहानी...! और सफलता की सांसो के बीच आनंद की कहानी..!


एक जंगल की कहानी सुनाता हूं। शेर अक्सर हिरण का शिकार करता हैं। जब शेर हिरण के पीछे पडता हैं तब हिरण खूब भागता हैं। इस दौड में शेर को अपनी भूख मिटानी हैं और हिरण को अपनी जान बचानी हैं। जंगल में यह घटना बार-बार होती रहती हैं। इस दौड़ में शेर को हरबार सफलता नहीं मिलती। जब शेर किसी हिरण का शिकार करता है तब सो में से दस-पंद्रह बार ही सफल हो पाता है। लगभग पचासी बार उसे हार का सामना करना पड़ता है। मतलब हिरण शेर के हमले से बार-बार बचता हैं, कहो ना कि जीतता है।

यह सुनकर हैरत होती हैं ना !?
हिरण जैसा मासूम और डरपोक जानवर शेर जैसे खूंखार और जंगल के राजा से कैसे जीत पाता हैं ?

इन दो सवाल के उत्तर में हमारा भी 'जीवविज्ञान' छीपा हैं। हिरण इसलिए जीत जाता है कि वह जान बचाने के लिए दौड़ लगाता है। अपने वजूद को बचाने के लिए दौड रहा होता है। जबकि शेर अपनी भूख मिटाने के लिए भाग रहा होता हैं। ये दो घटनाएं हमे काफी-कुछ सिखाती हैं। ध्यान को भंग किए बिना इन दो सवाल और दो जवाब के बारे में विचार करें। इनमें हमारे जीवन की काफी-कुछ घटनाओं का तालमेल दिखाई पड़ेगा। मनुष्य के रूप में हमारे आसपास भी यही हो रहा हैं, ऐसा जरुर प्रतित होगा। मनुष्य के रूप में हमारी भी एक दौड हैं। हम सब भी भाग रहे है, सुबह से लेकर शाम तक..! अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए हम भाग रहे हैं। धन-दौलत, शानो-शौकत के पीछे भाग रहे हैं। ये शेर की दौड जैसा ही हैं, अपनी भूख को पूरा करने की दौड जैसा ही है।

एक तरफ किसीको अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए भागना पड़ता हैं। डर के माहौल में अपने भीतर के कोमल भावों को बचाए रखना हैं। अपनी सुंदरता को बचाए रखना हैं। अपने सपने को पूरा करना हैं, अपने छोटे वजूद को बड़ा करना हैं। जंगल के सौंदर्य की तरह जिंदगी के मानवीय पहलू को स्थापित करने के लिए हमेंशा दौडते रहना है। वैसे लोग इस धरती की सुंदरता हैं। हिरण की तरह उन्होंने अपनी दौड में सबकुछ लगा दिया है। अपनी मेहनत, जिद्द और जीने का वजूद और अस्तित्व..! यह सबकुछ लगाते लोग विश्व की सबसे बड़ी सुन्दरता हैं। जिसके पास हारना मतलब मौत ही हैं, उसको तो 'हिरणवाली' दौड लगानी ही होगी।

विशाल दुनिया में मानवीय वर्तन-व्यवहार की विशिष्टताओं के बीच ये सब दिख रहा हैं। जो वैयक्तिक रुप से धनसंपदा या अपनी कुलीनता से बेहतर हैं, उसे किसीके सपनो को रोंदना नहीं हैं। उनके अस्तित्व को संकट में डालना कितने प्रतिशत ठीक होगा..!? विचार करने योग्य बात लगती हैं।

हम इन दो स्थितिओं में कहां पर खड़े हैं ?
हमें किसीको भगाना हैं कि खुद भागना हैं ?
यह सोचना होगा, याद रखें अपनी सफलता और अपने निर्णय अपने ही हाथो में हैं। डायनासोर की प्रताड़ित वृत्ति और हस्ती आज गायब हैं। एक प्रजाति लुप्त हो गई हैं। छोटे-से कईं सजीव आज भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं..!!

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Sunday, April 26, 2026

'तुम तो हर गीत में शामिल थे तरन्नुम बनके..!!'
April 26, 20260 Comments

It is a melodious and pleasant sounding word.

'तरन्नुम' एक मधुर और सुरीला शब्द है।

पूरा ब्रह्मांड ध्वनि से भरा हैं। ध्वनि से कईं जीवन आकारित हुए हैं। समग्र जीवसृष्टि को अपने-अपने ध्वनि हैं। सजीव नहीं है, उनके भी ध्वनि हैं। प्रकृति का अपना ध्वनि हैं। नदी और झरने भी अपने ध्वनि से संभृत हैं। हरेक वृक्ष को भी अपना ध्वनि हैं। पंछीओं की दुनिया तो ध्वनि का सागर हैं। आसमान की शून्यता में भी ध्वनित छाया हैं। हम उसे शांति से भरा कहते हैं लेकिन वो शांति भी एक ध्वनि हैं।



अभी एक गीत सुनने में आया। 'स्विकार किया मैंने' (१९८३) हिन्दी फिल्म का वो गीत था। उस गीत के गीतकार निदा फाज़ली और गायक स्वर सम्राज्ञी कुमारी लता मंगेशकर हैं, संगीतकार हैं उषा खन्ना। पहले इस गीत को पढ़े..!

अजनबी कौन हो तुम ! जबसे तुम्हे देखा है..!
सारी दुनिया मेरी आँखों में सिमट आयी है।
तुम तो हर गीत में शामिल थे तरन्नुम बनके,
तुम मिले हो मुझे फूलों का तबस्सुम बनके,
ऐसा लगता है के बरसों से शनासाई है।
ख्वाब का रंग हकीकत में नजर आया है,
दिल में धड़कन की तरह कोई उतर आया है..!
आज हर सांस में शहनाई सी लहराई है।
कोई आहट सी अंधेरो में चमक जाती है,
रात आती है तो तनहाई महक जाती है
तुम मिले हो या मुहब्बत ने गज़ल गाई है..!

इस गीत से मुझे 'तरन्नुम' शब्द बहुत ही पसंद आया। बस में पड़ गया उसके पीछे। 'तरन्नुम' Tarannum का हिंदी अर्थ धुन, लय, स्वर, माधुर्य, गीत या 'संगीतमयता' ऐसा होता है। यह उर्दू और फारसी मूल का शब्द है, जो अक्सर शायरी या गानों को लयबद्ध तरीके से गाने या पढ़ने (तराना) के संदर्भ में प्रयोग में लिया जाता है। यह एक 'सुरमई और सुखद' ध्वनि को दर्शाता है। तरन्नुम एक 'क्लासिक वर्ड' हैं। गीत का मुख्य भाव 'प्रेम की बेशुमार अनुभूति' को महसूस करवाता हैं। शब्द की कमनीयता 'तरन्नुम' हैं, माधुर्य से भरी अनुभूति हैं। जैसे एक गीत में 'मधुरता और सुरीलापन' व्याप्त हो तो वो शब्द कालजयी बन जाते हैं। हिन्दी सिनेमा जगत में कईं गीत आज भी बेशुमार ख़ुशीओ की फुहार लेकर आते हैं। जैसे सावन की हर बूँद हरबार नईं लगती हैं, उसकी खूशबू कायम दिल को छू लेनेवाली होती हैं। वैसे ही उन सदाबहार गीतो के बारे में कहा जायेगा।

ईस गीत का और एक शब्द भी सुहाना हैं..'तबस्सुम' उसका अर्थ मुस्कान, मृदुहास या मंद-हँसी होता है। यह भी अरबी मूल का एक सुंदर शब्द है। प्रसन्नता और बिना आवाज़ की होठों की मंद-मंद मुस्कराहट को दर्शाता है। इस शब्द का उपयोग साहित्य में अक्सर प्रेम के भाव चेहरे से खुशी ज़ाहिर करते हैं, उसे दर्शाने के लिए किया जाता है। गीत की खुबसूरती कभी खत्म नहीं हो सकती। इन दो शब्दो की बात गहराई से समझ ते हैं तो शब्द से प्यार हो जाता हैं। मानो 'एस्ट्रिम लेवल' के भाव को भीतर में सहलाने वाले ये शब्द बन गए हैं। कोई बेहतरीन समय पर की गई 'निदा फाज़ली' की ये शब्द साधना की पड़छाई कभी धुंधली नहीं पड़ती। प्रेम 'पूजा के फूल' की तरह यहां एक अद्भुत अलौकिक रुप को धारण किए हम अनुभूत करते हैं।

एक ओर शब्द देखे 'शनासाई'..! उसका अर्थ है जान-पहचान, परिचय, वाक़फ़ियत, या किसी को जानने की अवस्था। यह भी एक फ़ारसी मूल का स्त्रीलिंग शब्द है। एक ओर अर्थ में देखे तो 'घनिष्ठता' या किसी व्यक्ति के साथ संबंध दर्शाने के लिए भी इसकी प्रयोजना की जाती है। शब्द और ध्वनि का मेल ध्यान बन गया हैं, जैसे मुहब्बत ने गज़ल गाई हैं..!

इस गीत के जरिए मुझे कुछ शब्द की मधुरता को आप तक पहुंचाने के मन था। वैसे तो इसे समझने में मुझे बहुत ही आनन्द मिला हैं। उसे कुछ शब्दों के जरिए बांटता हूं। पसंद आए तो आप भी इसे बाँटना..! 'तरन्नुम'-'तबस्सुम' और 'शनासाई' शब्द के गरिमामय वैभव को महसूस करते रहना हैं। इसे कौन पढ़ रहा हैं ये मुझे मालूम नहीं हैं।
बस इतना कहता हूं...अजनबी कौन हो तुम..!

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Sunday, April 19, 2026

The real friendship..!
April 19, 20260 Comments

Aristotle taught that there are three kinds of FRIENDSHIP.

अरस्तू ने सिखाया कि मित्रता तीन प्रकार की होती है।

दोस्त, मित्र, सखा, साथी, यार, संगी और सहचर शब्द के अर्थ एक ही हैं। ये शब्द स्नेह, विश्वास और साथ रहने का अदम्य भाव प्रकट करनेवाले हैं। दोस्त और दोस्ती के बारे में काफ़ी कुछ कहा गया हैं, लिखा गया हैं। साहित्य में भी कईं काव्य-कथावार्ताएं मिलती हैं। फिल्म जगत में भी कईं फिल्मों के सब्जेक्ट्स 'दोस्त और दोस्ती' आधारित होते हैं। मनुष्य जीवन के ईस सुंदर संबंध के बारे में कुछ लिखने का प्रयास करता हूं। यह ब्लॉग मेरे जीवन के सभी दोस्तो के नाम करते हुए आनंदित भी हूं। अरस्तू की तीन प्रकार की मित्रता की बात को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं। उनके तीन प्रकार में,


1.
friendship of utility based on benefit.
● लाभ पर आधारित उपयोगितावादी मित्रता।
संबंध की सबसे बूरी बात हैं उसमें बेनिफिट देखना हैं। मनुष्य के रुप में कईं संबंध 'बायोलोजीकल' रुप से होते हैं। जैसे कि माता-पिता-भाई-बहन वगैरह...लेकिन मित्रता के संबंध में अपनी खुद की पसंद नहीं होती हैं। दो व्यक्ति जब अनायास मिलते हैं और उनके बीच गहराई वाला रिश्ता निर्माण हो जाता हे, तब 'दोस्ती' जन्म लेती हैं।  इस प्रकार के पवित्र बंधन में लाभ या बेनिफिट का विचार करना कैसे ठीक होगा ? फिर भी संसार में ये संभव हो रहा हैं। इससे लाभ किसको मिलता हैं ये भी हम भलीभांति जानते हैं। लेकिन जो रिश्ता हमारी मर्ज़ी से हुआ हैं उसके बारे में पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए।

2.friendship of pleasure based on enjoyment.
● आनंद पर आधारित आनंदवादी मित्रता।
कोई ऐसा साथ जो हमें आनंद देता हैं। उसके साथ समय बिताना हमें अच्छा लगता हैं। उसके आने से मानो हमारी परेशानियाँ खत्म सी हो जाती हैं। हम किसी भी स्थिति में उसे याद करते हैं। वो हाजिर होता हैं। वो हमारा विश्वास बन जाता हैं ऐसी मित्रता आनंद पर आधारित हैं। पहेले प्रकार से ये अच्छी मित्रता कहलायेगी। जीवन के अच्छे मुकाम के लिए ऐसा कोई संबंध बेशक जरुरी हैं। स्वार्थ से परे केवल आनंद के लिए बनाया गया रिश्ता नुकशानकारक कभी नहीं रहेगा। भले उससे लाभ हो या न हो। इसलिए आनंद सबसे बड़ी बात हैं।

3.True friendship based on virtue.
● सद्गुण पर आधारित सच्ची मित्रता।
कईं रिश्ते समझ से बाहर होते हैं। कभी हमें भी समझ में नहीं आता। दूसरों को समझने की तो बात ही नहीं हैं।
वो रिश्ता क्यों है ?
इससे क्या लाभ हैं ?
मैं क्यो उसके करीब रहना पसंद करता हूँ ?
उसके बगैर जीवन में कुछ कमी महसूस क्यो होती है ?

इन सवालो का खडा होना जहाँ मुमकिन ही नहीं वो रिश्ता, वो मित्रता सबसे सुंदर हैं। जिसमें केवल हृदय का बंधन हैं। मिलने की उम्मीदें कायम रहती हैं। बस बातें करते रहेना..! उसके साथ समय बिताना..! इसका का कोई अंत नहीं होता। मन में ऐसा क्यो हो रहा है ऐसा संदेह भी नहीं उठता। उसके साथ केवल जीने का मन करे ऐसा रिश्ता ईश्वर की कृपा से ही संभव होता हैं। 'बेस्ड ओन वर्च्यु' इसे कहते हैं।

इन तीन प्रकार के मैत्री संबंध को मैं कोई 'जेन्डर बायस' या किसी दूसरे पूर्वग्रह से परे देख रहा हूं। यहां केवल व्यक्ति की मनुष्य की बात हैं। कोई फिलसूफी नहीं हैं, किसी धर्म-संप्रदाय के बंधन नहीं हैं। ये बात इक्वालिटी से परे जाकर समझ में आएगी। जहाँ केवल अपनापन पनपता हैं। जहाँ केवल प्रेम जी रहा होता हैं। जहाँ केवल ईश्वर की ही मर्जी कायम रहती हैं।

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Wednesday, April 1, 2026

I will want to change myself..!
April 01, 20260 Comments

Change yourself the world will change.

हमारे महात्मा गांधी की "खुद को बदलो, दुनिया बदलेगी" यह सैद्धांतिक रूप की मान्यता है।

Your own resonance can alter the world around you.
आपकी स्वयं की प्रतिध्वनि आपके आस-पास की दुनिया को बदल सकती है।

इसे पढ़कर मस्तिष्क में झनझनाहट पैदा होती है तो आगे पढ़ना जरुरी हैं। बात शुरु करने से पहले मैं कुछ ऐसा कहता हूँ। क्योंकी ये बात आगे पढने से समझ में आ जाएगी।

उल्लू बनो...!
अरे भाई क्यो बनना हैं उल्लू ?

संसार में उल्लू एक ऐसा पक्षी है जिसे दिन कि अपेक्षा रात में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ता है। उन्हें रात का पक्षी (Nocturnal Birds) कहा जाता हैं। अपनी बड़ी आंखे उसकी पहचान हैं। जैसे बड़ी आंखें बुद्धिमान व्यक्ति की निशानी होती है। वैसे उल्लू को भी बुद्धिमान माना जाता है। हालांकि ऐसा जरूरी नहीं है पर कुछ प्रचलित पौराणिक मान्यतावाली कहानियों में उल्लू को बुद्धिमान माना गया है। एक ओर विशेषत में उल्लू अपनी गर्दन पूरी तरह से घुमा सकता है। इसके कान बेहद ही संवेदनशील होते हैं। रात में जब कोई शिकारी जानवर थोड़ी-सी भी हरक़त करता है, तो इसे तुरंत पता चल जाता है। और उसे वो दबोच लेता है। इसके पैरों में नाखूनों-वाली चार अंगुलियां होती हैं। इसके कारण शिकार को दबोचने में उसे विशेष सुविधा मिलती है। चूहे इसके विशेष शिकार होते हैं।


प्राचीन यूनानियों में बुद्धि की देवी, एथेन के बारे में कहा जाता है कि वह उल्लू का रूप धारण करके पृथ्वी पर आई हैं। भारतीय पौराणिक कहानियों में भी यह उल्लेख मिलता है कि उल्लू धन की देवी 'लक्ष्मीमाता' का वाहन है।  हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है। एक ओर भी मान्यता चल रही है कि इन्सान की मृत्यु का समय उल्लू को पहले से पता चल जाता है। और तब वो आसपास के पेड़ो पर अक्सर आवाज़ लगाने लग जाते हैं।

एक तो उल्लू निशाचर पंछी है, जो अपनी बड़ी आँखे और गोल चेहरे के कारण बहुत प्रसिद्ध है। साथ में उल्लू के पंख बहुत ही मुलायम होते हैं, इसके कारण रात के सन्नाटे में उड़ते समय आवाज़ नहीं होती। ये बहुत ही कम रोशनी में भी देख लेते हैं। रात में उड़ान और शिकार में उसे कोई परेशानी नहीं होती। धरती पर जैविक संतुलन बनाने में उल्लू की अहम भूमिका है। चूहे-छछूंदर और हानिकारक कीड़े मकोड़ों का शिकार करने के कारण इन्हें प्रकृति के 'सफाईकर्मी भी कहेते हैं। शायद इसी कारण हमारे पड़ोसी देश मलेशिया में किसान फसल बचाने के लिए उल्लू पालते हैं।

उल्लू अन्धकार में स्पष्ट देख सकता हैं और अपनी दिशा तय कर सकता है। वह संसार के शोर से दूर रहकर अपने भीतर के अंधकार को देखता है। यह बताता है कि वास्तविक बुद्धिमत्ता जो अंधकार यानि अज्ञानता में से प्रकट होती हैं। संकट में से सही निर्णय लेने को बुद्धिमत्ता कहते हैं। साथ ही उल्लू शांत, धैर्यवान और एकाग्रचित होता है। इस बात के साथ हम थोड़ी सहमति जताए तो...धन प्राप्ति के लिए विवेक-धैर्य और मौन का बड़ा महत्व हैं। चुपचाप कर्म करो और अंधकार में से प्रकाश खोजने की मनसा रखो। इस तरह उल्लू तो शक्ति और दूरंदेशी का प्रतीक हैं, ऐसा समज में आता है। माता लक्ष्मीजी ने उल्लू को अपना वाहन क्यों बनाया हैं ? अब ये सहज ही समझ में आ जाएगा।

अपने जीवन के ध्वनि को सुनना हैं तो शांत बनना पड़ेगा। मैं संसार को बदलने के लिए नहीं निकला हूँ। मैं खुद को बदलने निकला हूँ। इस प्रक्रिया के दौरान जो कुछ परिवर्तन आते हैं उसे शांत होकर आनंद पूर्वक स्वीकार करना हैं। इससे बाहरी दुनिया में क्या परिवर्तन आते हैं उससे मुझे अधिक निस्बत नहीं हैं। मुझे Change ourselves खुद को बदलें में आनंद मिलता हैं। मैं इसे जीवन का मूलभूत आनंद कहते हुए मन से भर रहा हूं।

उल्लू की अपनी निजी दुनिया हैं, अंधकार से भरी तो अंधकार से...! लेकिन अपनी दृष्टि को स्थिर रखना-स्पष्ट रखना ये बहुत जरुरी हैं। शांत होकर स्वयं अपने भीतरी ध्वनि को पकड़ना हैं। ईश्वर ने मुझे जो कुछ क्षमताएँ दी हैं, वही मेरी मूलभूत शक्ति हैं। खूद को महसूस करना हैं। अँधेरे से डरना नहीं है, अँधेरे में छुपे उजियारे को महसूस करना हैं। प्रकृति के शांत स्वर में अपनी उड़ान को खोजना हैं। ये सब करनेवाला एक छोटा-सा पंछी उल्लू हैं...! इसीलिए मुझे उल्लू बनना हैं। हां, मैं उल्लू हूं उल्लू बनना चाहता हूं !!

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Thursday, March 12, 2026

Our thought process..!!
March 12, 2026 2 Comments

This is the nature of your Mind. if you try to avoid certain thoughts, only those will occur.

SADGURU.

आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप कुछ विचारों से बचने की कोशिश करेंगे, तो केवल वही विचार उत्पन्न होंगे।


मन के स्वभाव को समझना मुश्किल हैं। मन को चंचल कहा गया हैं। मन की दौड को पकड़ना कठिन हैं। मन की गति को आज तक नापना संभव नहीं हुआ हैं। मन अदृश्य होकर भी हमें बांधकर रखता हैं। मन की तरंगे उठती हैं, शांत होती हैं। इन तरंगो के ईशारे हम नचाते हैं। हम चाहकर भी कोई विचार को बंद नहीं कर सकते, मतलब हमारे दिमाग को हम ऐसा कोई आर्डर भी नहीं दे सकते। विचार की मूल ही अवधारणा बहना हैं। इसी लिए सद्गुरु के उन वचन को एकबार ओर पढ़िए। "आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप कुछ विचारों से बचने की कोशिश करेंगे, तो केवल वही विचार उत्पन्न होंगे।" मतलब विचारों से बचना नामुमकिन हैं। उसे बहने देना ही ठीक हैं।

अब एक दो प्रश्न उठते हैं।
विचारों की इस अस्खलित धाराओं में केवल बहना हैं ?
या फिर,
विचारों को रोकने का प्रयास करना हैं ?

चलों कुछ ऐसा सोचते हैं जिसे कुछ हल मिले ऐसा फिटिंग्स आए। विचारों को रोकने का प्रयास करना व्यर्थ हैं, उसे रोकना नहीं है केवल दिशा बदलनी हैं। जो विचार मन में उद्घटित होते हैं, उसमें से जीवन खोजना हैं। अपने लिए जरुरी है, हमारे जीवन में आनंद भरने वाले, हमारे आनेवाले समय को बेहतर बनाने वाले विचारों को छूटे दौर से प्रगट होने देना हैं। कोई हरक़त के बिना उसका स्वागत करते रहना हैं। एक बात समझ लेनी चाहिए। कि विचार हमारे अनुभवो की पड़छाई हैं। जीवन में जो कुछ घटित होता है, वो बार बार विचार का रुप धरकर हमारे सामने आते हैं। कल्पना के जरिए वो हमारे वर्तमान को प्रभावित करते हैं। कभी-कभार हम इस विचार की आँधी में फंस भी जाते हैं। इसने कईं प्रकार के रोगो का स्थान भी ले लिया हैं।


विचार एक प्रवाह हैं, हमें इस प्रवाह का आनंद लेना हैं। विचार तो जीवन का आधार हैं। हम इस आधार से डरे या दूरी बनाएं ये कैसे संभव होगा। सुंदर विचार के लिए मन की शुद्धि आवश्यक हैं। मन में किसी के लिए भी कटुता पैदा हुई तो समझो जीवन बेकार हो जाएगा। मन में इस कटुता के कारण वैमनस्य या असूया बढ़ेगी। और इसको झेलना तो खुद ही पड़ेगा, कोई बचानेवाला नहीं हैं। 'विचारआनंद' के लिए हमारे पास ध्यान विधि है, धर्माचार हैं साथ ही आध्यात्मिक गति हैं। ये तीन हमारी मूलभूत सम्पदाएं हैं। इससे ही मनुष्य जीवन में वैचारिक आनंद की प्राप्ति हो सकती हैं। विचार प्रवाह को 'आनंदगति' एवं 'योग्यदिशा' मिल सकती हैं।

सांप्रत समय में सब समस्याओ का समाधान मिल सकता हैं। आज मनुष्य भौतिक वआर्थिक रूप से संपन्न होता जा रहा हैं। फिर भी मनुष्य वैचारिक दुर्बलता में फंसे जा रहे हैं। इसका कारण धर्म अस्पष्ट होता जा रहा हैं। ध्यान की क्रियाएं मनोरंजन से भरी होती जा रही हैं। आध्यात्म केवल दिखावे का साधन बनता जा रहा हैं। आज ज्ञान-विज्ञान के युग में, स्पष्टता के युग में भी मनुष्य बेबस होता जा रहा हैं।

इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं ?
सत्य क्यों प्रताडित हो रहा हैं ?
भारत वर्ष की वैचारिक धरोहर क्यो डगमगा रही हैं ?

वैयक्तिक स्वार्थ, ज्ञाति-जाति-धर्म-संप्रदाय आधारित संगठनात्मक स्वार्थ वैचारिक दूषण फैलाता हैं। इससे किसीको फ़ायदा होनेवाला नहीं हैं फिर भी चल रहा है। आज समृद्ध विश्व में समस्याएँ बढ़ रही हैं इसका कारण वैचारिक दुर्बलता हैं। खैर, मनुष्य के रूप में अच्छे बुरे वर्ताव का फर्क समझमें आना, अच्छाई को सीखना खुद के लिए जरुरी हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
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We really need a sense of oneness of humanity.

14'th Dalai Lama says that...! we all have right to achieve happy life. हम सभी को सुखी जीवन प्राप्त करने का अधिकार है। " So dear...

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