February 04, 2026
BY Brij Chandrarav0
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मम अन्तः वसन्तः गायति...!
आज वसंत के साज छेडने का मन हैं। सहज ही वसंत मुझे छेड़ रही हैं। वैसे तो सबका यहीं अनुभव होगा। चलो, आज वसंत के साथ आनंदभरी मस्ती करते हैं। पहले दो सुंदर कृति का आस्वादन करें..! फिर आगे बढ़ते हैं। अच्छे शब्द विचार से झुडते हैं।
मैं देख रहा हूँ..!
झरी फूल से पँखुरी,
मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।
मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
स्रोत : पुस्तक : सन्नाटे का छंद (पृष्ठ 87) संपादक : अशोक वाजपेयी रचनाकार : अज्ञेय प्रकाशन वाग्देवी प्रकाशन संस्करण :1997
वसंत
जब तक तुम हो डर नहीं हमें।
पेड़ ने कहा:
और अपनी एक-एक पत्ती झरा दी।
स्रोत : पुस्तक : पेड़ अकेला नहीं कटता (पृष्ठ 20) रचनाकार : दफ़ैरून प्रकाशन : रामकृष्ण प्रकाशन संस्करण : 2001
वसंत को हम प्रकृति की श्रद्धा कहते हैं। प्रकृति का एक स्वभाव खिलना और सँवरना भी है। ईश्वर की यह अद्भुत करामात हैं। अदृश्य होकर भी वो एक ऐसा मंजर खडा करते हैं जिसमें सबका कल्याण ही कल्याण बसा हैं। सृष्टि के सभी चेतन-अचेतन पहलूओं को स्पर्श करनेवाली वसंत इसका जबरदस्त प्रमाण हैं। एक और बात पतझड़ की बेला शीत ऋतु में आती हैं। उस वक्त पत्तों का गिरना प्राकृतिक रुप से संभव नहीं लगता। और ग्रिष्म की शुरुआत में यानि की वसंत में नए पत्तों का उग आना भी अचंभे से कम नहीं हैं। शायद बारिश की मौसम में यह संभव लगता हैं। लेकिन ईश्वर को कुछ ओर ही मंज़ूर हैं। वो धूप में भी झरनों का बहाव कर सकता हैं। और रात के अंधेरे में भी फूल खिला सकता हैं। उसकी मर्ज़ी के अनुसार ही प्रकृति में बदलाव आते रहते हैं।
इससे यह पता चलता हैं की ईश्वर चाहे वो कर सकते हैं। किसीको अभाव या संघर्ष में से भी निकाल सकते हैं। केवल निकालना नहीं उसको उच्चतम शिखर पर स्थापित भी कर सकते हैं। उसके लिए यह सहज हैं, हम इसे चमत्कार भी कह सकते हैं। वसंत इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार हैं। ईश्वर की दुनिया चमत्कारों से भरी हैं। वो कुछ भी कर सकते हैं। वसंत को शायद ईश्वर भी चाहते हैं। उसका भी एक प्रमाण देखे...श्रीमद्भगवद्गीता के दसवे अध्याय के पैंतीसवे श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं,
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०•३५॥
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है ,जो ऋतुओ में कुसुमाकर अर्थात वसंत है, वह मैं ही तो हूँ। इसलिए कुसुमाकर की 'कृष्णप्रियता' में जीवसृष्टि का सृजन हैं। कुसुमाकर वो मौसम है जो कुसुम के एक-एक दल को पल्लवित करता हैं। इसे हम 'पुष्पऋतु' भी कहे तो भी एकदम ठीक हैं। अमराइयों में मंजरियो के रससिक्त होकर महकना और मधुमय पराग लिए उड़ाते भौरों के गुनगुनाने का अवसर है 'वसंतऋतु'..! इसे ऋतुराज या ऋतुओं की रानी भी कहा गया हैं। वसंत स्वयं ईश्वर को पसंद है इसलिए वो हमें भी पसंद पड़नेवाली हैं।
वसंत जैसे तरुवर का विश्वास है, वैसे वसंत सृष्टि की खुशबूदार मौसम भी हैं। साथ ही सौंदर्यां भी कह सकते हैं। धरती पर सुंदरता को प्रगटानेवाली ऋतु हैं। वसंत को मैं सौंदर्यां कहते हुए मन ही मन अलौकिक भाव में मस्त हो रहा हूँ। इसे मैं 'सौंदर्यांवसंत' की ही अनुभूति कहता हूं। साथ ही इसे मैं प्रकृति का 'सौंदर्यशास्त्र' कहते हुए एक हिन्दी सिनेमा 'सिंदूर' के गीत की कुछ पंक्तियाँ गा ने लगा। आप भी थोड़ा संमिलित होकर जीवन का आनंद लिजिए...! स्वर सम्राज्ञी लताजी और सुदेश वाडेकर के मधुर आवाज का मजा लीजिए..! वैसे तो यह गीत जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव जैसे पतझड़, सावन, बसंत के बीच प्यार के अनूठे मौसम बसंत में छुपे नाजुक प्रेम की भी बात करता हैं।
पतझड़ सावन बसंत बहार,
एक बरस के मौसम चार, मौसम चार मौसम चार..!
पांचवा मौसम प्यार का इंतज़ार का,
पतझड़ सावन बसंत बहार...!
कोयल कूके बुलबुल गाए,
हर एक मौसम आये जाये,
लेकिन प्यार का मौसम आये,
सारे जीवन में एक बार, एक बार एक बार..!
पतझड़ सावन बसंत बहार..!
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
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