Dr.Brieshkumar Chandrarav

Wednesday, February 25, 2026

Supernatural spirits..!
February 25, 20260 Comments

The mystery of some supernatural spirits.

कुछ अलौकिक आत्माओं का रहस्य..!

एक तरफ़ समष्टि हैं, एक तरफ़ हमारा जीवन हैं। वैसे तो हम भी समष्टि का ही एक भाग हैं। लेकिन दो पहलूओं का अस्तित्व भी अलग हैं, इसलिए दो शब्दों में विभाजित करता हूँ। एक तरफ़ पर्यावरण है, आसमान की शून्यता हैं, एक ओर अदृश्य आत्मा हैं। इन सबके बीच संसार की गतिविधियां हैं। जन्म-जीवन और मृत्यु का फ़ासला हैं। छोटी-सी चींटी से लेकर कद्दावर हाथी तक के जीव की कहानियाँ हैं।

आज हम बात करेंगे कुछ अलौकिक आत्मा को लेकर पैदा हुए इन्सानों की। इस अंतरंगी विशाल सृष्टि में कितने लोग हैं..!? सबका अपना अस्तित्व हैं। सबके अलग चेहरे और सबकी अलग सोच हैं। सबकी पसंद नापसंद भी विभिन्नता से भरी हैं। खान-पान, रहन-सहन और भाषाभूषा भी अलग हैं। इनमें किसी को हम महान आत्मा के तौर पर स्वीकार करते हैं। उनका स्वीकार करते हैं साथ में उनका अनुसरण भी करते हैं। सबके लिए ऐसा होना संभव नहीं हैं। ऐसा थोड़े बहुत लोगों के लिए ही संभव हैं। एक श्लोक के जरिए हम इसे समझने का प्रयास करें..!
केचन आत्मान: स्थायिन: न भवन्ति
बोधनाय प्रविश्य उत्क्रांतये निर्गच्छन्ति।
Some souls are not meant to stay. They enter to awaken you and leave to evolve you. कुछ आत्माओं का यहाँ रहना तय नहीं होता। वे हमें जागृत करने के लिए आती हैं और आपको विकसित करने के लिए चली जाती हैं।


Friedrich Nietzsche फ्रेडरिक नीत्शे  जो जर्मनी के दार्शनिक और मनोविश्लेषणवादी थे। इस संसार में उनका जीवनकाल 15 अक्टूबर 1844 से 25 अगस्त 1900 तक का रहा था। अस्तित्ववाद एवं परिघटना मूलक चिंतन Phenomenalism के विकास में नीत्शे की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। युरोय के व्यक्तिवादी तथा राज्यवादी दोनों प्रकार के विचारकों ने नीत्शे से प्रेरणा ली थी। जर्मन कला-साहित्य पर नीत्शे का गहरा प्रभाव भी रहा है। उसे 'नीत्शेवाद' से जाना जाता है।

फ्रेडरिक नीत्शे 24 वर्ष की ही आयु में 'बेस्ल विश्वविद्यालय' में भाषा-विज्ञान के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हो गए थे। एकबार वो विद्यालय के दरवाज़े पर खड़े हो गए। उनके हाथ में एक बाॅर्ड था। इनमें लिखा था: "ईश्वर की मृत्यु हो गई..!" सारे छात्रों को अचरज हुआ। पूरे विद्यालय में यह बात फैल गई। इकट्ठे हुए सब लोग अपने विद्वान प्रोफ़ेसर के कारनामे से अचंभित थे। फिर नीत्शे ने उसपर प्रकाश डालते हुए कहा: " जब तक ईश्वर जिंदा है तबतक हम कुछ करने के प्रयास में आलस्य करेंगे। हम बिना प्रयत्न से सिर्फ़ ईश्वर पर भरोसा करके बैठे रहेंगे। लेकिन कोई ईश्वर हमें बिना लगन बिना प्रयास से कुछ भी देनेवाला नहीं हैं। ऐसा प्रतित होगा तब इस पुरुषार्थ के महत्व को समझ सकते हैं। इतना सुनते ही सब शांत हो गए और नीत्शे का कहना समझ भी गए..!"

हमारी श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के सिद्धांत के बारे में ही कहा हैं। अकर्मण्य तो विष समान हैं। श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय के इस श्लोक से हम सब भलीभांति परिचित हैं। भगवान कहते हैं :
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
"तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करना ही है| कर्मों के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है| अतः तुम निरन्तर कर्म के फल पर मनन मत करो और अकर्मण्य भी मत बनो।"

'ज्ञान-कर्म' की गहराई को स्थापित करने हेतु महान आत्माएं इस धरती पर अवतरित होती रहती हैं। समष्टि का उचित मार्गदर्शन करती हैं। और एक सिमास्तंभ रुप कार्य करती हैं। जीवन का बहतरीन उद्देश्य सिखाकर चली जाती हैं। सारे संसार में ऐसी बहुत कम आत्माएँ जन्म धारण करती हैं। ये ईश्वर की ही अदृश्य करामात हैं। कईं लोग उनके व्यक्तित्व को कलुषित करने का प्रयास करते हैं लेकिन कुछ नहीं कर पाते। वो अपना निमित कर्म दमदार तरीके से पूरा करते हैं। वे महान आत्माएं संसार को जागृत करके विकसित होने का पाठ सिखाकर दुनिया छोड़कर चली जाती हैं। हमारे भारतवर्ष की ऐसी कईं आत्माओं को नमन करता हूँ। स्वामी विवेकानंद का एक नामस्मरण काफ़ी लगता हैं। बाकी आप सब जिस चरित्र से प्रभावित है उनके बारें में अपना अहोभाव प्रकट कर सकते हैं।

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Sunday, February 15, 2026

Enduring of love..!
February 15, 20260 Comments

Love needs breathing Natural, graceful, enduring.

प्रेम को स्वाभाविक, सुंदर और स्थायी रूप से सांस लेने की आवश्यकता होती है।

बेहतरीन शब्द और विचारों का मैं दिवाना हूँ। एकबार कोई विचार मुझे पसंद आ जाए फिर उस पर चिंतन शुरु हो ही जाता हैं। शायद ये मेरी बेहतरीन कमज़ोरी भी हैं। मुझे इस कमजोरी से प्यार हैं। इन्ही स्वभाव के कारण शायद अच्छे शब्द-विचार के संपर्क में आना सहज हो जाता हैं। healing hearts page पर से एक विचार मिला। चलों, इसे हम प्यार से समझे और अपना अच्छावाला मूड़ बनाए।

सांस लेने की जरुरत हरेक जीव को होती है। साथ में हरेक शरीर को भी होती हैं। लेकिन यहाँ तो प्रेम को स्वाभाविक सुंदर और स्थायी रुप से सांस लेने की आवश्यकता है, ऐसा कहा गया हैं। प्रेम खुद स्वाभाविक हैं, प्रेम को शरीर नहीं हैं, आकार नहीं हैं। प्रेम सचेतन भी नहीं हैं। प्रेम की कोई आवाज भी नहीं हैं। प्रेम रंग और सुगंध से भी परे हैं। प्रेम को प्रकृति की किसी भी वस्तु के साथ तुलना कर सकते हैं। जहाँ ख़ुशनुमा वातावरण दिख़े वहाँ प्रेम प्रकट होगा ही होगा। लेकिन दिखाई नहीं पड़ेगा, तो प्रेम सांस कैसे ले सकता हैं !? जरा, सोचने में जोर लगना पड़े ऐसी बात हुई हैं। चलों, आज कुछ हवा जैसा बनकर अदृश्य प्रेम को पकड़ने का थोड़ा प्रयास करते हैं। जहाँ प्रेम दिखे वहाँ एकदम से रुक जाएंगे...!


प्रेम तो अक्सर सांस लेता हैं। प्रेम सृष्टि का अनमोल 'स्थायीभाव' हैं। वो सृष्टि के कण-कण में समाहित हैं। सृष्टि की हरेक सुंदरता में प्रेम हैं। हवा के हरेक झोंके में, हरेक लहर में प्रेम बसा हैं। प्रेम के साथ स्वाभाविकता खड़ी हो तो ही वो प्रकट होगा। मनुष्य जीवन के दूसरे भावो की तुलना में प्रेम की कीमत भारी हैं। जब प्रकृति में दो वस्तु या व्यक्ति के बीच एकत्व का संचार होता हैं। तब अद्वैत का पुष्प आकारित होता हैं। उसे हम प्रेम कहते हैं। जब एक दूसरे का सानिध्य बनता है, तब प्रेम सांस लेता हैं।

प्रकृति में से एक घटना लेते हैं। जब धरती की तृषा बढ़ जाती हैं, गर्मी सीमा तोड़ रही होती हैं, व्याकुलता की पराकाष्ठा के बाद बादल का बरसाना एक अदृश्य होकर भी जीवंत घटना हैं। तब धरती के सांस की महसूसी शानदार होती हैं। हमें भी वो पहेली बारिश की खुशबु याद रहती हैं। हमारी सांसो को भी ये महसूस होती हैं। ये हैं, सांसो का कमाल, ये प्यार की खुशबु हैं। मनुष्य के रुप में हमारी सांसे भी ईश्वर के दिये हुए 'प्रेमपुष्प' से कम नहीं हैं। उस पर हमारा अधिकार भी नहीं हैं। "जितनी चाबी भरी रामने उतना चले खिलौना..!" गीत की तरह शरीर को जितनी सांसे मिली हैं इतना चलेगा। हरेक जीवन को मिली सांस और धड़कन निराकार ईश्वर की देन हैं। इस सत्य का स्वीकार करना न करना वैयक्तिक स्तर की बात हैं। संसार प्रेम के लिए ही आकारित हुआ हैं, ऐसी मेरी दृढ़ मान्यता हैं।

प्रेम जहाँ पलता है वहाँ सांस एक संगीत की तरह बजने लगता हैं। जहाँ जीवंतता है वहां अक्सर प्रेम पनपता ही जाता हैं। वहाँ अदृश्य़ सांसे चलती ही रहती हैं। इसे अद्भुत अनुभूति समझकर चलेंगे तो जीवन आनंद से हराभरा रहेगा। सृष्टि के झड-चेतन सभी पहलूओं में सांस है तब-तक उनका अस्तित्व रहता हैं। शायद इसे 'प्रेमबंधन' कहो, इसके कारण कोई स्थिति कायम रहती हैं। बाकी सनातन बने रहना कठिन हैं। हां, प्रकृति और सनातन जहां विद्यमान हैं, वहाँ हमेशा प्रेम सांस लेता ही रहता हैं। सांस की सुंदरता और स्वाभाविकता कायम रहती है। चलो, प्रेमभरी सांसो को महसूस करे..!

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Wednesday, February 4, 2026

Spring sings within me..!
February 04, 20260 Comments

 मम अन्तः वसन्तः गायति...!

आज वसंत के साज छेडने का मन हैं। सहज ही वसंत मुझे छेड़ रही हैं। वैसे तो सबका यहीं अनुभव होगा। चलो, आज वसंत के साथ आनंदभरी मस्ती करते हैं। पहले दो सुंदर कृति का आस्वादन करें..! फिर आगे बढ़ते हैं। अच्छे शब्द विचार से झुडते हैं।

मैं देख रहा हूँ..!
झरी फूल से पँखुरी,
मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।
मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
स्रोत : पुस्तक : सन्नाटे का छंद (पृष्ठ 87) संपादक : अशोक वाजपेयी रचनाकार : अज्ञेय प्रकाशन वाग्देवी प्रकाशन संस्करण :1997

वसंत
जब तक तुम हो डर नहीं हमें।
पेड़ ने कहा:
और अपनी एक-एक पत्ती झरा दी।
स्रोत : पुस्तक : पेड़ अकेला नहीं कटता (पृष्ठ 20) रचनाकार : दफ़ैरून प्रकाशन : रामकृष्ण प्रकाशन संस्करण : 2001

वसंत को हम प्रकृति की श्रद्धा कहते हैं। प्रकृति का एक स्वभाव खिलना और सँवरना भी है। ईश्वर की यह अद्भुत करामात हैं। अदृश्य होकर भी वो एक ऐसा मंजर खडा करते हैं जिसमें सबका कल्याण ही कल्याण बसा हैं। सृष्टि के सभी चेतन-अचेतन पहलूओं को स्पर्श करनेवाली वसंत इसका जबरदस्त प्रमाण हैं। एक और बात पतझड़ की बेला शीत ऋतु में आती हैं। उस वक्त पत्तों का गिरना प्राकृतिक रुप से संभव नहीं लगता। और ग्रिष्म की शुरुआत में यानि की वसंत में नए पत्तों का उग आना भी अचंभे से कम नहीं हैं। शायद बारिश की मौसम में यह संभव लगता हैं। लेकिन ईश्वर को कुछ ओर ही मंज़ूर हैं। वो धूप में भी झरनों का बहाव कर सकता हैं। और रात के अंधेरे में भी फूल खिला सकता हैं। उसकी मर्ज़ी के अनुसार ही प्रकृति में बदलाव आते रहते हैं।


इससे यह पता चलता हैं की ईश्वर चाहे वो कर सकते हैं। किसीको अभाव या संघर्ष में से भी निकाल सकते हैं। केवल निकालना नहीं उसको उच्चतम शिखर पर स्थापित भी कर सकते हैं। उसके लिए यह सहज हैं, हम इसे चमत्कार भी कह सकते हैं। वसंत इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार हैं। ईश्वर की दुनिया चमत्कारों से भरी हैं। वो कुछ भी कर सकते हैं। वसंत को शायद ईश्वर भी चाहते हैं। उसका भी एक प्रमाण देखे...श्रीमद्भगवद्गीता के दसवे अध्याय के पैंतीसवे श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं,
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०•३५॥

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है ,जो ऋतुओ में कुसुमाकर अर्थात वसंत है, वह मैं ही तो हूँ। इसलिए कुसुमाकर की 'कृष्णप्रियता' में जीवसृष्टि का सृजन हैं। कुसुमाकर वो मौसम है जो कुसुम के एक-एक दल को पल्लवित करता हैं। इसे हम 'पुष्पऋतु' भी कहे तो भी एकदम ठीक हैं। अमराइयों में मंजरियो के रससिक्त होकर महकना और मधुमय पराग लिए उड़ाते भौरों के गुनगुनाने का अवसर है 'वसंतऋतु'..! इसे ऋतुराज या ऋतुओं की रानी भी कहा गया हैं। वसंत स्वयं ईश्वर को पसंद है इसलिए वो हमें भी पसंद पड़नेवाली हैं।

वसंत जैसे तरुवर का विश्वास है, वैसे वसंत सृष्टि की खुशबूदार मौसम भी हैं। साथ ही सौंदर्यां भी कह सकते हैं। धरती पर सुंदरता को प्रगटानेवाली ऋतु हैं। वसंत को मैं सौंदर्यां कहते हुए मन ही मन अलौकिक भाव में मस्त हो रहा हूँ। इसे मैं 'सौंदर्यांवसंत' की ही अनुभूति कहता हूं। साथ ही इसे मैं प्रकृति का 'सौंदर्यशास्त्र' कहते हुए एक हिन्दी सिनेमा 'सिंदूर' के गीत की कुछ पंक्तियाँ गा ने लगा। आप भी थोड़ा संमिलित होकर जीवन का आनंद लिजिए...! स्वर सम्राज्ञी लताजी और सुदेश वाडेकर के मधुर आवाज का मजा लीजिए..! वैसे तो यह गीत जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव जैसे पतझड़, सावन, बसंत के बीच प्यार के अनूठे मौसम बसंत में छुपे नाजुक प्रेम की भी बात करता हैं। 

पतझड़ सावन बसंत बहार,
एक बरस के मौसम चार, मौसम चार मौसम चार..!
पांचवा मौसम प्यार का इंतज़ार का,
पतझड़ सावन बसंत बहार...!

कोयल कूके बुलबुल गाए,
हर एक मौसम आये जाये,
लेकिन प्यार का मौसम आये,
सारे जीवन में एक बार, एक बार एक बार..!
पतझड़ सावन बसंत बहार..!

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Tuesday, January 20, 2026

Respond Consciously to the Universe..!
January 20, 20260 Comments

If your response is limitless. you find new life in every passing moment. This is the nature of life..!

SADGURU.

जीवन की प्रकृति को समझना मतलब प्रकृति के वैविध्य को समझना। प्रकृति के सानिध्य का आह्लाद अनुभूत करना। जीवन के कईं बहतरीन पहलूओं पर 'जग्गी वासुदेव' यानी 'सद्गुरु' का मत बहुत ही सटीक लगता हैं। वैयक्तिक रुप से मुझे भी जीवन के बारें में लिखना, पढ़ना और सोचना अच्छा लगता हैं। मुझे समझ में आ रहा हैं, जीवन कोई सामान्य घटना नहीं हैं। जीवन कोई समय का फासला भी नहीं हैं। जीवन कोई अकस्मात नहीं हैं। जीवन ऊर्जा से भरा और असीमित शक्तिओं से भरी समयावधि हैं।

आइए, सद्गुरु के बहतरीन शब्द पढ़े और जीवन की जागरुकता भरी सोच को महसूस करें।


"जिस भी चीज को आप पूरी तरह रिस्पॉन्स देते हैं वो आपकी हो जाती हैं। अगर आप पूरे ब्रह्मांड को सचेतन रिस्पॉन्स दें तो पूरा ब्रह्मांड आपका हो जाता हैं। पतझड़ के समय में जैसा कि आप देख सकते हैं। जो पत्ता पेड़ का था, या शायद पेड़ को ऐसा लगता था। वो नीचे गिर जाता हैं। धरती माँ सबको अपना लेती हैं, पूरी तरह से अपना लेती हैं। इसी वजह से वो इन मरे हुए पत्तों से भी नया जीवन पैदा कर देती हैं। जीवन की प्रकृति ऐसी ही है की अगर आपका रिस्पॉन्स असीम हैं तो हर चीज से आप एक नया जीवन बन जाते हैं। उम्र समय आप पर राज नहीं करते हैं। आप 'समयाधिपते' बन जाते हैं। आप समय से ऊपर होते हैं। या आप समय के चक्र पर सवार होना सीख जाते हैं क्योंकि आपका रिस्पॉन्स असीम हैं। सिर्फ अपने शरीर तक सीमित रहने से आप समय के गुलाम बन जाते हैं। समय आपको कुचल देगा। लेकिन अगर आपका रिस्पॉन्स असीम हैं तो बीतने वाले हर पल से आप नया जीवन पाते हैं। यही जीवन की प्रकृति हैं।"

रिस्पॉन्स देना यानी प्रतिक्रिया देना। हमारे बाहरी वातावरण में जो कुछ हो रहा है, उसके प्रति जागरुकता से बर्ताव करना हैं। उससे हमारी भीतरी संवेदनाओं को जाग्रत करना हैं। उसके तालमेल में रहना मतलब जीवन को करिब से समजने का प्रयास करना..! मनुष्य के रुप में मन-बुद्धि के उपयोग से कैसे जीना है ? उसका जवाब हमें खुद ही खुद से लेना होगा। जवाब मिल जाय, तब सारे संसार को देखने का हमारा नज़रिया ही बदल जाएगा। 'प्रकृति और ब्रह्मांड' को सचेतन रुप से महसूस करना संभव हो जाएगा। जीवन की शानदार पहचान होती चली जाएगी। हमारी 'उम्र और समय' का संबंध समझ में आता जाएगा।


फिर शुरु होगी एक यात्रा..! आनंद से भरी जीवन यात्रा..! पंछीओं के गीत से भरी और हवाओं की सुगंधित सरसराहट से भरी...! नदियों के कलकल करते संगीत से भरी, पर्वतों और मैदानों की हरियाली से भरी जीवनयात्रा..!

कईं लोगों के बीच जाना होता है, तब सबको पसंद पड़नेवाली जीवनयात्रा। सुंदर काम के लिए हरदम निमित्त बनती हुईं यात्रा..! ये ब्रह्मांड की ही असीम कृपादृष्टि कहलाएगी। ब्रह्मांड को धारण किए हुए आसमान से बातें करने का मन हो तो समझ लेना मेरे जीवन में कुछ चमत्कार घटेंगे, कोई सुनहरे काम के लिए या संसार में घट रही अच्छी घटनाओं के निर्माण के लिए मेरा प्रयोग होगा। मैं जीवन को एक वस्तुत: समझता जा रहा हूं। मैं इस ब्रह्मांड का एक छोटा-सा उपकरण हूँ। मुझे बस बहते जाना हैं। मुझे अदृश्य शक्तिओं की मर्ज़ी के अनुसार एक पत्ते की तरह गिरने का आनंद भी लेना हैं। एक छोटे-से बीज की तरह टूटकर अंकुरित होने के आनंद में जीना हैं। एक परिन्दे सी मुस्कान लेते हुए गाते ही रहना हैं। कोई मुझे क्या परेशान करेगा !? मैं इस ब्रह्मांड का अभिन्न अंग हूं..! वृक्ष की हरियाली को चूमता हुआ और हवा की ठंडी लहरों के साथ गीत गाता हुआ..! एक छोटा-सा जीव हूँ...मुझे बस बहना हैं..!

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Tuesday, January 13, 2026

YOU vs YOU...!?
January 13, 2026 4 Comments

"Ascension means it's You vs You.

And one of you has to die"
A keredoldscuid.

"आरोहण का अर्थ है तुम बनाम तुम। और तुममें से एक को मरना होगा।" ए. केरेडोल्डस्कुइड

'Ascension' means the action of rising to an important position or a higher level.
'आरोहण' का अर्थ है किसी महत्वपूर्ण पद या उच्च स्तर पर पहुंचना।
उठना चाहते हो !?
कुछ करना चाहते हो !?
या फिर उड़ना चाहते हो..!? जीवन में बेहतरीन एक्शन चाहते हो तो ये ब्लोग आपके लिए ही हैं। सृष्टि के सब मनुष्य को जन्म से जीवन मिलता है। रात-दिन के घटनाक्रम में जीवन बहता चला जाएगा- बढ़ता ही रहेगा। इसमें कुछ अलग करना हैं, ये जीवन के लिए चैलेंज हैं। इसके लिए ईश्वर की कुछ अदृश्य अपेक्षाओं को समझकर आगे बढ़ना एक अच्छा स्टेप-कदम माना जाएगा। हरेक व्यक्ति की स्थिति-परिस्थिति या फिर योग- संयोग अलग हो सकते हैं। फिर भी कुछ नये मार्ग को चयनित करके अपना मुकाम तय करना हैं। इस मार्ग पर चलने की कोशिश जीवन की सबसे सुंदर क्रिया होगी ऐसा मुझे प्रतित हो रहा हैं।


'एसेंशियल' एक मानक अंग्रेजी शब्द नहीं है, लेकिन यह संभवतः 'एसेंट' शब्द जिसका मतलब ऊपर की ओर बढ़ना ऐसा होता हैं। एक ओर अर्थ में 'एसेंशियल' 'आवश्यकता या जरूरत' को दर्शाता है। अब मैं बात करता हूँ आवश्यकता की, जरुरत की और उपर उठने के साथ किसी उच्चतम अवस्था तक पहुंचने की..! शरीर रूप साधन के उपयोग से हमें जीवन को गति देनी हैं। शारीरिक अवस्था प्रकृति के आधिन हैं मगर हमारी मानसिक-सांवेगिक़ और आध्यात्मिक ति; जिसके कारण हम हमारी पहचान बना सकते हैं। दूसरों से अलग करके संसार में नये मुकाम स्थापित कर सकते हैं। उसके लिए जितना हो सके इतना अच्छा समझ लेना होगा। हमारी मानवीय गति को बढ़ानेवाली संभावनाओं से ब्रह्मांड भरा हुआ हैं। फिर भी समस्याएं आती हैं। क्यों ऐसा विपरीत मंजर खड़ा होता हैं ? इस चर्चा में स्वाभाविक रुप से कुछ प्रश्न जरुर खडे होंगे।
संभावनाओं के बीच विकलता क्यों आती है ?
कौन हमें रोक रहा है ?
हमें किसका सामना करना होगा ?

उत्तर ब्लोग के टाईटल में ही हैं। हम खुद अपने सामने हैं। 'मैं के विरुद्ध मैं..!' की प्रतिस्पर्धा हैं..! you vs you..! जीवन का ये महत्वपूर्ण पहलू हैं। हमें इसे समझना होगा। मैं खुद अपने को रोक रहा हूँ। इसलिए संभावनाएं मुझे दिखाई नहीं पड़ती। इसी कारण मदद करने वाली शक्तियां विमुख हो जाती हैं। और हम धीरे धीरे ठहराव के पाश में बंधने लगते हैं। 'एक्शन ऑफ राइजिंग' नहीं हो पाता..! 'जीवन ऐसे ही बहता है, मन में प्राप्ति की ओर खुद बढ़ना होगा..!' ऐसी भावनाएं जरुर कारगर साबित हो सकती हैं। ठहराव से भरा एवं भटकाव से भरा जीवन उम्र की ओर बढ़ता हैं, वैसे ही संवेदनात्मक बनता जाता हैं, मन सहज ही मजबूत बनता जाता हैं। एक सुंदर पथ हमारे सामने दृश्यमान होता हैं।

हम गिर जाएं या गिरा दिए जाएं
खुद से हमें ही उठना है..!
धूल झाड़ कर हिम्मत से फिर,
आगे और सिर्फ आगे ही बढ़ना है...! (श्रेयांसी सतीश)

एक विचार को अनुमोदन मिले तो वो विचार थोड़ा दमदार बन जाता हैं। देखिए, ए. केरेडोल्डस्कुइड ने मुझे एक विचार दिया। उस पर मैं ब्लोग कर रहा था। श्रेयांसी सतीश जैसी कवियित्रीने उसको अनुमोदन दे दिया। तेरे किरदार को सुवासित करना तेरे ही हाथ में हैं। एक को मरना होगा मतलब अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं को छोडना होगा। कुछ पाने के लिए अपनी पसंद को छोडकर एक का स्वीकार करना होगा। बहुत ही सुंदर विचार पर चिंतन करते हुए मैं भी खुश हो गय़ा। जीवन को एक 'विचारतजुर्बा' मिला हैं। अब अपने काम में लगना हैं। बेहतरीन रास्ते पर अकेले ही चल पड़ना हैं। आरजू की परवाह किए बिना, बस हमें चलते जाना हैं। इसे हम 'एक्शन ऑफ राइजिंग' कहेंगे। संसार में खुद पर विजय पाकर ही दमदार किरदार खड़े हुए हैं। आरोहण के मार्ग पर थमना मना हैं, क्योंकि निर्धारण में बाधा आ सकती हैं !? और आरोहण कठिनाईओं के सामने किए गए मजबूत इरादों की कोशिश हैं..!?

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Tuesday, January 6, 2026

Come on, let's talk to our sky..!
January 06, 2026 3 Comments

नभ ने धरा से कुछ नहीं कहा,

और न ही धरा ने नभ से कुछ कहा !

फिर भी न जाने,
कितने अरब प्रकाश-वर्ष से चल रहा है
यह अद्भुत प्रेम..!
स्रोत: पुस्तक, 'राबिया का ख़त' पृष्ठ १८४ रचनाकार, मेधा। प्रकाशन: राधाकृष्ण पेपरबैक्स।

आज कुछ नया करने का मन हैं। 'आनंदविश्व सहेलगाह' में आसमान की सैर करने का मन हुआ। विशालता विराटता के बीच हम सब तिनके से भी छोटे हैं। लेकिन हमारा वास्तविक अस्तित्व यहां विद्यमान हैं। इस आकाश के नीचे 'नीले गगन के तले' हमारा जीवंत बसेरा हैं। इस नीले आसमान के नीचे हम श्वास ले रहे हैं, हमारे हृदय की धड़कने धबक रही हैं। हम जिंदा है, मस्ती में हैं, आनंद में हैं।


Come on, let's talk to our sky..! आज आसमान से बाते करते हैं। है विराट आकाश ! तुम सारी धरती की परछाई धरे, सारे रंगो को धारण करके युगों से अस्तित्व को धारण किए हो। धरती का सारा इतिहास तेरी आंखों में बसा हैं। मैं तुझे वंदन करता हूँ। मेरे इस जन्म के अस्तित्व को और नजाने कितने जन्मो को तुमने देखा होगा। तुम मेरी हर हरक़त के साक्षी के कितने अरब प्रकाश-वर्ष से चल रहा है तेरा और धरती का अद्भुत प्रेम..! मैं तो तेरी इस दीवानगी का छोटा-सा आनंद स्वरुप हूँ। धरती पर पैदा हुआ एक छोटा-सा पौधा हूँ ! तेरे रंगो की परछाई हूं ! बचपन से मैंने सुना है, तुम अदृश्य ईश्वर का ठिकाना हो। इस ईश्वर को याद करते हुए तेरे सामने ही देखते रहे हैं। ये सत्य है या असत्य हम नहीं जानते फिर भी आस बनाए हुए हैं। सच कहुं, तेरी विशालता पर एक नजर करता हूं तो खुश हो जाता हूं। थोड़ी देर के लिए भी मैं शांत हो जाता हूँ ! बड़ा सुकुन मिलता हैं !

हे आकाश ! तुम मुझे हरदम देख पा रहे हो और मैं भी..! मैं नहीं देख पा रहा उन्हें भी तुम देख पा रहे हो। शायद मेरी याद बनकर उन्हें अचंभित कर सकते हो। क्योंकि तेरा अधिकार सर्वत्र हैं। तेरे विशाल क्षेत्र में हम सब बसे हैं। तेरी असीमित शक्तियों के सामने मैं आनंद पूर्वक नत मस्तक हूं। एक बात बताऊं, बचपन में तेरे 'क्षितिज मिलाप' को देखने का बहुत मन करता था। फिर समज में आया कि ये मेरे मन की कल्पना हैं, संभावना के प्रति केवल एक विचार हैं, हक़ीकत नहीं..! ये जानते हुए भी मुझे क्षितिज से लगाव हैं। धरती और तेरे मिलन की ये कल्पना मुझे आनंदित करती हैं। सचमुच, मुझ में प्यार की तरंगे उठती हैं। हृदय में मिलन का विचार स्पष्ट रुप से आकारित होता हैं।

हे शून्यता के सागर ! तुम मुझे एकांत सिखाते हो। अपनी विशाल आगोश में मुझे सूकुन की गहराई का अनुभव होता रहा हैं। जब भी परेशान हूँ तो तुम्हें देखता हूँ और आनंद से भर जाता हूं। तेरे 'अखंड मंडलाकारं' स्वरुप से मैं शांति का अनुभव करता हूं। हे आकाश ! तेरी शून्यता ही शांति की मुख्य धारा हैं। तेरी विशालता ही प्रेम प्रगटन का आधार हैं। धारण करते हुए भी स्थिर रहना ये तेरी असिमित कृपा हैं..! तेरी आगोश में मैं हरदम प्रेम और शांति का मंजर अनुभूत करता रहा हूं।

मेरी कल्पना के साथ 'धरती और आसमान' कविता जो अंजना भट्ट ने लिखी है, चलो, कविता का आस्वादन करते हैं।

मैं ? मैं हूँ एक प्यारी सी धरती!
कभी परिपूर्णता से तृप्त और कभी प्यासी आकाँक्षाओं में तपती,
और तुम ? तुम हो एक अंतहीन आसमान !
संभावनों से भरपूर और ऊंची तुम्हारी उड़ान।
कभी बरसाते हो अंतहीन स्नेह और कभी
सिर्फ धूप.! ना छांह और ना मेंह...!
मैं रहूँगी तुम्हारी प्रिया धरती !
और रहोगे तुम मेरे प्रिय आसमान..!
मैं ? मैं हूँ आसमान की धरती और तुम ?
तुम हो धरती के आसमान..!

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Tuesday, December 30, 2025

I feel I'm alive..!
December 30, 20251 Comments

When you call on me,

when i hear you breathe,

I get wings to fly.

I feel I'm alive.
lofilulla.

जब तुम मुझे पुकारते हो, जब मैं तुम्हारी साँसें सुनता हूँ, मुझे उड़ने के पंख मिल जाते हैं..! मुझे लगता है कि मैं जीवित हूँ..! ● लोफिलुल्ला

कुछ शब्द नहीं होते, धडकन का साज होते हैं। ये शब्द जीवन की यात्रा को बेहतरीन बनाते हैं। ये शब्द भी तो वर्णो का मिलन हैं। और जहां मिलन होता है वहाँ लाजवाब ही घटित होगा। सारे ब्रह्मांड में प्रकृति के सभी पहलूओं में मिलाव ही तो भरा हैं। एक चीज दूसरी चीज से मिलकर एक ओर चीज निर्माण करती हैं। ब्रह्मांड में एकत्व का भाव ही मुख्य हैं, यहाँ समता हैं, संयोजन है और समाहित होना सहज भाव हैं। इसलिए प्रकृति वैविध्य से भरी होने के बावजूद एक ही हैं। उसके सामने 'मनुष्य' शब्द बोले तो कितना कुछ वैविध्य सामने आता हैं। फिर भी मनुष्यों में भी मिलन और प्यार की बात ही भरी है। मनुष्य में भी प्रकृति का एकत्व सहज उठ खडा होता हैं। इसलिए कहे, ईश्वरीय परिकल्पना में 'मिलन' ही केंद्र में हैं।


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हमारी ही बात करते हैं, यानि की मनुष्य की बात करते हैं। मनुष्य का एक मूलभूत स्वभाव हैं उसे अकेला रहना पसंद नहीं हैं। आदिकाल को देख़ें टोली और समूह सहज ही बन गए थे। मनुष्य का समाज और अपनो में रहने का स्वभाव मूलरूप दर्शाता हैं। शायद ये ईश्वर की अनजान करामात भी हो सकती हैं। अपनो में जीना है, तो प्रेम चाहिए। इसलिए प्रेम सबसे जरुरी हैं, ऐसा निश्चित हैं। ईश्वर ही प्रेम है, ऐसा सुनकर हमसब बड़े हुए हैं। मनुष्य को प्रेम में जीना पसंद हैं। अक्सर ये स्वभाव बदलता क्यों है ये मैं नहीं जानता। लेकिन एक बात तो तय है, हमारे मन में कुछ भी पाने की लालसा भले ही ज़्यादा हो। लेकिन प्यार सबको चाहिए..! ये सत्य किसीसे छिपा नहीं हैं।

किसी आवाज से मन भर जाय, किसी आवाज को बारबार सुनने का मन करे या उस आवाज को सुनकर उड़ने का मन हो जाए..! ये बड़ी ही नाजुक हरकतें सभी के नसीब में कतई नहीं होती। इसके लिए शायद मनुष्य के रुप में "जैसा हैं वैसा" या फिर "जैसे ईश्वर के साथ आनंद आता है वैसा" जीना होगा। ऐसी अंतरंगी हरकतें किसी ओर को आपकी ओर खींच लेती हैं..! प्रेम के लिए शायद कोई चाहिए ये भी सच हैं। प्रेम भीतर की धडकन हैं, इसे व्यक्तिगत रुप से सुनना भी फ़ायदेमंद और कोई ओर सुन ले उसके लिए भी लाभप्रद हैं। प्रेम जब पारस्परिक संबंध में झुडता है तो बडा सुंदर लगता हैं। शायद ये लोगो की जुबान बन जाए या एक खुबसूरत लम्हा..! जीने के लिए ये प्यार बड़ी जरुरी चीज हैं। प्यार स्वरुप के बिना, न दिखे फिर भी और चीज न होने के बावज़ूद भी बहुत ही जरुरी हैं।

I feel I'm alive...मैं जीवित हूँ..! ऐसे अहेसास की किमत कोई चुका नहीं सकता। ये अनमोल रिश्ता, ये प्यारा संबंध कैसे बंध जाता है, इसके कारण कितना भी ढूंढो मिल नहीं सकेंगे !! प्यार के साथ जीना जीवन की सबसे बड़ी सफलता हैं। और मनुष्य के रुप में संबंध को समझना सबसे बड़ा व्यवहार हैं। ऐेसे जीव चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, बड़े ही भाग्यवान होते हैं या कहलाते हैं..! शायद उनका जीना ईश्वर को भी पसंद आता होगा..! शायद नहीं निश्चित ही पसंद होगा..! एक हिन्दी फिल्म 'किनारा' का ये गीत जो गुलजार ने लिखा हैं, और राहुलदेव बर्मनने संगीत से सजाया हैं..! सुने और आनंद की प्यारी लहर का अनुभव करें..!

'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा,
मेरी आवाज़ ही, पहचान है गर याद रहे..!
वक़्त के सितम, कम हसीं नहीं,
आज हैं यहाँ, कल कहीं नहीं,
वक़्त से परे अगर, मिल गये कहीं...!
मेरी आवाज़ ही पहचान हैं गर याद रहे...!

आज के लिए शायद इतना काफी हैं...! Thanks lofilulla.

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat.
INDIA
drbrijeshkumar.org
dr.brij59@gmail.com
+91 9428312234 
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Supernatural spirits..!

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