Dr.Brieshkumar Chandrarav

Sunday, September 27, 2026

રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવારની વર્ષગાંઠનો અવસર...!
September 27, 20260 Comments

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...!

'રજતમિલન'

એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં, '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' નગર નિવાસ આદરે છે. મને નગર જીવને ઉચ્ચ અભ્યાસની ગતિ આપી. સજ્જન શક્તિ સાથેનો પ્રેમાનુબંધ આપ્યો. સંઘ RSS જેવા રાષ્ટ્રકાર્યની સંગત આપી. અનેક સહૃદયી વડીલો અને મિત્રો આપ્યા. કેટલું બધું આપ્યું છે, આ મોડાસા નગરે...! એ ઉત્કૃષ્ટ નિમિત્તને આપના સાંનિધ્યમાં ઉજવવું છે. સાથે વાતો કરીશું અને ભોજન લઈશું.

દિનાંક : ૨૧ મે ૨૦૨૬, ગુરૂવાર સાંજે ૭: ૦૦ કલાકે.
સ્થાન : આનંદા અતુલ્યમ, નીરવા ક્લબ એન્ડ રિસોર્ટ, ડુઘરવાડા, મોડાસા.
સૂરસંગત : શ્રી.પ્રવિણભાઈ બારોટ (કે.એન.શાહ)

All sweet memories link.

https://drive.google.com/drive/folders/1bzKa_durp5dtXJsDFoZjhtyIbLptdtk0


















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કૃતજ્ઞતાભાવપુષ્પ....મારા પુસ્તકનો વિમોચન પ્રસંગ.
September 27, 20260 Comments

 કૃતજ્ઞતામિલન...!

મારા સૌ નિમિત્તોને વંદન...!
જન્મના નિમિત્તરૂપ માતા-પિતા પછી મારા જીવનમાં જે કંઈ ઘટિત થતું ગયું એમાં કારણભૂત કેટલાક ચરિત્રોનો ઋણસ્વીકાર કરવો છે..!
અરવલ્લી અને મોડાસાએ મને સતત દ્વિગુણિત કર્યો છે. મારી શિક્ષણ-સેવા અને રાષ્ટ્ર પ્રત્યેની દૃષ્ટિ અહીં ઘડતર પામી છે. અનેક સહૃદયી વડીલો અને મિત્રોનો 'પ્રેમાનુબંધ' મારા જીવનની અમૂલખ મૂડી સમાન બની ગયો છે.
મારા જીવનમાં બ્રહ્મસમાજના સહવાસને શબ્દબદ્ધ કરતું એક 'કૃતજ્ઞતાભાવપુષ્પ'
નામનું પુસ્તક આપની નિશ્રામાં પ્રકાશિત કરવું છે. એ ઉત્કૃષ્ટ નિમિત્તને આપના સાંનિધ્યમાં ઉજવવાનો ઉમળકો છે. આવો, સાથે થોડી વાતો કરીશું અને ભોજન લઈશું.


All sweet memories of my Program.

https://drive.google.com/drive/folders/1g00jC8Y4hbgk6JekoDrusHBLJT7g4Be1?usp=sharing
































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Gretitude is life..!
September 27, 20260 Comments

A thankul heart becomes a magnet for miracles....The secret.

शुक्रगुज़ार दिल चमत्कारों के लिए एक चुंबक बन जाता है।


जीवन चमत्कारों से भरा हैं। लेकिन उसे हम आकर्षित नहीं कर पाते। कुछ ऐेसे शब्द हैं, कुछ ऐेसे वर्तन हैं, कुछ मन की अवस्थाएं हैं जो मूलभूत रुप से जीवन में चमत्कार घटित कर सकते हैं। "शुक्रगुज़ार दिल चमत्कारों के लिए एक चुंबक बन जाता है।" 'द सिक्रेट' बुक का यह प्रसिद्ध वाक्य हैं। उसे शांत मन से पढ़े। फिर शुक्रगुज़ार दिल बनाने का प्रयास करे। चलो, मैं आज इस ब्लॉग के जरिए मेरी कृतज्ञताए व्यक्त करता हूं। पहले तो आप मुझे पढ़ रहे हैं, उसके लिए आप सबका शुक्रिया अदा करता हूं। मैं जैसा भी लिख रहा हूँ आपकी एक नज़र यहाँ पड़ती हैं। उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। दूसरी बात यह भी मुझे बखूबी याद आती हैं। कईं लोग मुझे जानते होंगे लेकिन कईं अनजान दोस्त मुझे पहचानते भी नहीं होंगे। फिर भी मेरा लिखा हुआ पढ़ लेते होंगे। वो अदृश्य संबंध बनाने वाले लोगों का भी तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।


सुबह होती हैं, कोई न कोई पहली आवाज हमारे कानों में पडती हैं। हम जाग जाते हैं। कोई विचार भी हमें निंद से जगा देते हैं। और हमारी आँखें खुलती हैं। उस आवाज और विचार का शुक्रिया..! फिर सूरज की किरणों का स्पर्श होता हैं। ठंडी हवाएं हमें स्पर्श करती हैं साथ ही रंगबिरंगी पंछीओं की चहचहाहट...! हम रोमांचित हो उठते हैं। हर सुबह की उस हरेक पहलू का शुक्रिया हैं। फिर कईं प्रसाधन से हमारा कार्य शुरु होता हैं। धरती के अमृत समान पानी का स्पर्श और फिर खाने पीने की चीजें हमारे सामने आती हैं। कोई हमारे लिए नास्ता और चाय का कप लेकर खड़ा होता हैं। ऐसी कईं प्रवृत्तियां से हम स्वस्थता बनाए रखते हैं। ऐसे ही हम अपने दिन की खूबसूरत शुरुआत करते हैं। न्यूज पेपर के तरोताजा शब्दों के साथ थोड़ा-बहुत तालमेल करके नित्य के काम के लिए तैयार हो जाते हैं। यहाँ तक जो कुछ वस्तुएं हमारे सामाने आई है, उसको तैयार करने वाले हरकोई अनजान लोगो का शुक्रिया व्यक्त करता हूं।

अब शुरु होती है दिनभर की भागदौड़..! घर से निकलना और काम के स्थान पर पहुंचना। हमारे हिस्से का काम देखना। ईस पूरी कार्यशीलता में जाने-अनजाने कईं लोगो के साथ मिलना-मिलाव होता हैं। हमे कुछ लोग अच्छे लगते हैं, किसीसे मनमुटाव रहता हैं। लेकिन हमारा काम करनेवाले और न करनेवाले लोगो का भी स्वीकार करना हैं। पसंद न आनेवाले लोग भी कोई कारणवश हमारे जीवन में आते हैं। उन सबका दिल से शुक्रिया..! इस विषय पर लिखते लिखते मुझे जैन संप्रदाय की 'संवत्सरी' याद आ गई। 'मिच्छामि दुकडम' कहते हुए वो संवेदनशील लोग जाने-अनजाने में हुई गलतीओं के लिए माफी मांगते हैं। पूरे संसार में यह बात असामान्य हैं। साल का एक दिन हम ऐेसे मनाए तो बहुत अच्छी बात हैं। वैसे तो इस कृतज्ञता और दिलगीरी के भावो को भीतर में स्थापित करना हैं। पूरा जीवन शुक्रगुज़ार बना रहे ये भी दमदार जीवन के लिए आवश्यक हैं।

फिर शाम होती है, नितांत शांति से भरा माहोल बनता जाता हैं। पंछीओं की तरह हम सब अपने नीड की ओर चले जाते हैं। रात का खाना पूरे मन से आनंद पूर्वक होता हैं। सुबह और शाम के खाने में आई हरेक चीज को भी मैं याद करता हूं। इसे बनाने-पकानेवाले हाथो को भी वंदन करता हूं। अपनी भूख को शांत करनेवाली हर दृश्य-अदृश्य वस्तुएं हमारा जीवन हैं। वो हमारे शरीर को चलाते हैं, उससे हमें उर्जा मिलती हैं। शरीर की अद्भुत संरचना धड़कन को थामे रखती हैं। सांसो को बरकरार रखती हैं। हमारे शरीर का विकास और स्वास्थ्य बना रहता हैं। इनमें बसे हर निमित्त को प्रणाम हैं। भूलकर भी उससे असूया नहीं होनी चाहिए।

रात के अंधेरे में हम शांत होकर अगली सुबह के सपनों को सच करने का प्रयास करने के लिए सो जाते हैं। पूरे दिन की थकान गायब हो जाती हैं। सबकुछ भूलकर हम निंद्राधीन हो जाते हैं। फिर एक ओर सुबह होती हैं। ईस तरह हमारे जीवन का एक-एक दिन बढ़ता हैं। अच्छे बुरे कईं अनुभवो से गुजरना होता हैं। हम कुछ भूलते हैं कुछ याद रखते हुए बढ़ते रहते हैं। कभी-कभार सफलता एवं प्राप्ति का आनंद मिलता हैं। तो कहीं पर विफलता का सामना भी करना पड़ता हैं। मगर इन सभी घटनाओं का कुछ तो मतलब होगा। यह मान्यता हमारे मन में दृढ़ होनी चाहिए। अच्छे और बुरे सभी अनुभवों से हम शुक्रगुज़ार बने रहे..! शायद हमारे जीवन की कृतज्ञता राह को काफी-कुछ मज़बूती मिल सके !?!

अब सबसे बेहतर बात...! जन्म के साथ शुरु हुई पहेली सांस से लेकर अंतिम सांस तक हमारा जीवन एक नाम लेकर चलता हैं। कईं जीवन को सुंदर गति मिलती हैं। दुनिया उनसे प्रभावित होती हैं। ऐेसे कईं चरित्र विश्व में निर्मित होते रहते हैं। जो जीवन को बडी नाजुकता से जीने का प्रयास करते हैं। ऐसे अद्भुत मानव का जन्म और संवर्धन कोई अदृश्य कृपा के कारण होता हैं। विराट-विशाल ब्रह्मांड में सभी जीवो के जीवन का संतुलन बना रहता हैं। यह संतुलन बनाए रखने वाली शक्ति का तो निरंतर शुक्रगुज़ार बने रहना हैं। प्रकृति के हरेक पहलूओं की कृतज्ञता व्यक्त करते रहेना हैं। जीवन में कुछ अच्छी घटनाएं घटित हो जीसे 'द सिक्रेट' बुक 'चमत्कार' कहती हैं।

हमारे जीवन को संवारने वाली हरेक घटना और इनमें शामिल हरेक व्यक्ति के शुक्रगुज़ार बने रहेना हैं। परम शक्तिसंपन्न ईश्वर मनुष्य जीवन की बेहतरीन गति के लिए मदद करते हैं। प्रभु की अदृश्य भूमिका या परमेष्ठी की योजना निमित्त ढूंढ लेगी। ऐसे चमत्कार को जान लिया तो जीवन कृतज्ञता से संवृत हो जाएगा। हमारे जीवन में कृतज्ञता-ग्रेटिट्यूड को स्थापित करने का प्रयास दिल से करने हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
 Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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Wednesday, September 9, 2026

DALAI LAMA says that...!
September 09, 2026 2 Comments

The real destroyer of our inner peace is anger.

हमारी अंदर की शांति को खत्म करने वाली असली चीज़ गुस्सा है।

एकबार समारोह में एक बच्चे ने दलाई लामा से सवाल किया। बौद्ध धर्म के पवित्र पुरुष दलाई लामा ने जो उत्तर दिया वो अक्षरश: यहाँ लिख रहा हूँ। एकबार इसे पढ़ने से दिल को सूकुन मिलेगा। अपने जीवन को परिवर्तन के राह पर चलाना आसान हो जाएगा। चलो पढ़ते हैं, लाजवाब शब्द..!


Sir, my question is how we develop inner peace ?
I think, frankly speaking, use our intelligence.Think. The real destroyer of our inner peace is anger. Anger very much related with irritation. These very much related with extreme self- Centered attitude. me, me, me that. so the method in order to reduce self-centered attitude, think of other. self, Yourself, Your entire existence depend on the rest of Your community. so you have to develop respect, of each Community respect. That reduce self-centered attitude. that reduce fear, distrust. that reduce anger. Actually compassionate mind is realistic sort of mind. Anger is unrealistic mind. so use our intelligence, pros and cons. then you get more conviction about compassion. it's really useful, including your own health. and Your longevity.
● Dalai lama.

सच कहूँ तो, हमें अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए। सोचना चाहिए। हमारी अंदर की शांति को खत्म करने वाली असली चीज़ गुस्सा है। गुस्सा चिड़चिड़ेपन से बहुत जुड़ा होता है। और ये सब बहुत हद तक बहुत ज़्यादा खुद के बारे में सोचने वाले रवैये से जुड़े होते हैं - 'मैं, मैं, बस मैं'। इसलिए खुद के बारे में सोचने वाले रवैये को कम करने का तरीका है, दूसरों के बारे में सोचना। आपका अपना अस्तित्व आपके समुदाय के बाकी लोगों पर निर्भर करता है। इसलिए आपको हर समुदाय के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी चाहिए। इससे खुद के बारे में सोचने वाला रवैया कम होता है। इससे डर और अविश्वास कम होता है। इससे गुस्सा कम होता है। असल में, दयालु या करुणामय मन एक यथार्थवादी (हकीक़त को समझने वाला) मन होता है। गुस्सा अवास्तविक मन की उपज है। इसलिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, फायदे और नुकसान पर सोचें। तब आपको दयालुता के बारे में ओर ज़्यादा यकीन होगा। यह वाकई में फायदेमंद है, आपकी अपनी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी। ● दलाई लामा

गुस्सा-चिड़चिड़ेपन से जुड़ा हैं। हर व्यक्ति के स्वभाव में जन्म से ही अच्छे-बुरे गुण स्थापित ही होते हैं। उसमें से कौन-से गुण को बढ़ाना है ? या कौन से अवगुण को बढ़ाना है, यह अपने आप पर आधारित हैं। मन में ठान ही लिया है कि हमें ठीक ढंग से जीना ही नहीं है तो बात कुछ और हैं। तब शुरु होती है मन के भीतर एक लड़ाई, अपने आप से लड़ाई...! जब पराभूत अवस्था का सामना करना पड़ता है तब गन खिन्नता से भर जाता हैं। वास्तव से दूर सब जगह जीतने की आह मन को दूषित करती रहती हैं। फिर स्वभाव में चिड़चिड़ापन छा जाता हैं। क्रोध का जन्म इसतरह होता हैं। और वही क्रोध मनुष्य के भीतर और बाहर को तोड़कर रख देता हैं। मनुष्य की सारी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।

इससे बचने के उपाय में दलाई लामा करते हैं : "आपको हर समुदाय के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी चाहिए। इससे खुद के बारे में सोचने वाला 'स्व-केन्द्री' रवैया कम होता जाता है। इससे डर और अविश्वास कम होते है। इससे गुस्सा-क्रोध कम होता है।" सच में मनुष्य को अपने भीतर को करूणार्द्र से भरा हुआ बनाए रखना है तो अपने आप को संतुलित रखना होगा। हमारे आसपास सौहार्द को महसूस करना हैं। और सभी लोगो का स्वीकार करना होगा। जब किसी से असूया होगी तो समझो भीतर हलचल मचना तय हैं। मनुष्य के रूप में यह समझना होगा। हमें व्यक्ति-व्यक्ति में असमानता दिखी तो समझो हमारी वैयक्तिक समर्थता भी विफल होगी। हमारे पूर्वज जो परमात्मा का रूप धारण किए हुए हैं। शायद उनको भी यह पसंद नहीं होगा। क्रोध से लडना नहीं, अपनी वृत्तियों से लड़ना हैं। इस विषय को आप अपनी तरह समझने का प्रयास करें। शायद इसके अतिरिक्त कुछ नया अनुभव में आयेगा...!
'आनन्दविश्व सहेलगाह' की विचारयात्रा में बस इतना ही।

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Friday, August 21, 2026

बोध इति सर्वैः सह आत्मीयता...!?
August 21, 20260 Comments

Brij Chandrarav  August 2026

Enlightenment is intimacy with all things.


Today, I'm blogging on a different topic . I'm trying to connect with my thoughts. I'm simply writing without worrying about whether I succeed in this endeavor. If you find something different in this, read it; otherwise, don't waste your time.

From birth, we are blessed with five senses, along with our human body. We perceive the world through them. This enhances our experiential nature. We see, hear, feel, and experience. We read something and then try to put it into practice, connecting it to our life's actions. The repeated actions that follow this connection reach the depths of experience. What is gained from this process is knowledge. This happens frequently in our lives, repeatedly and is what we would call the "enlightenment" state of life.



Let's try to understand the Sanskrit saying, "Bodh Iti Sarvaih Saha Atmiyata." The emphasis here is on the word "intimacy. "Intimacy increases the pace of achievement in human life. One meaning of intimacy is closeness, which we can also understand with the term "intimate swarm." It's a connection to an object or a person. A connection to a situation or a circumstance. A connection to a place or boundary. A connection to animals and birds. It's a desire to be connected to nature. The deeper the connection, the greater our knowledge. Intimacy with all things can give us a distinct identity as human beings. We all know that those who work for the welfare of nature, humanity and animals, and birds, working for their enrichment and development, have come to prominence in remarkable ways. They have been honored with many honors. They are a clear mirror of society. The talented image of that person also makes the society look healthy.


Enlightenment means Attachment in Sanskrit "Atmiyata" Intimacy is absolutely essential for this. Selfish behavior as a human being will only lead to personal weakness. A person's identity may increase for other reasons, but ultimately, it will falter. Its effect will be like a key-operated toy. "Enlightenment" is a very auspicious thing. Intimacy is essential for it. I have personally seen many people. Their talents don't match their status. Yet, this "trade of talents" continues to occur due to someone's personal desires. Our human society has never been rich in talent ; it lacks those who recognize talent . Those who don't live with knowledge pollute society. This is what I call "behavioral poison. " Perhaps it will please both sellers and buyers. It will not benefit the human community at all.

Then I remind you of "intimacy" and "closeness." If we talk only about human relationships, these are prevalent. Today, even the word and the feeling of "love" seem to be lacking. The reason for this is attributed to the lack of intimacy. This truth must be accepted. Love is the basis for the excellent progress of human life . Only because of love will the flexibility of human relationships remain in this world. What a beautiful thing...! I want to become intimate; I want to light the "lamp of knowledge" in my life. I want to play a significant role in the world's noble causes. Perhaps this is God's will... !?


Your Thoughtbird 🐣

Dr. Brijeshkumar Chandrarav

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Thursday, August 20, 2026

बोध इति सर्वैः सह आत्मीयता...!?
August 20, 20260 Comments

Enlightenment is intimacy with all things.

ज्ञानोदय का अर्थ है सभी चीजों के साथ घनिष्ठता।

आज कुछ अलग विषय पर 'ब्लोग' प्रस्तुत करता हूं। विचार के साथ घनिष्ठता बनाने का प्रयास करना हैं। मैं इस प्रयास में खरा उतरता हूं या नहीं इसकी परवा किए बिना बस लिख रहा हूं। आपको इनमें कुछ अलग दिखे तो पढिए; अन्यथा समय बर्बाद न करे।


जन्म से मानव शरीर के साथ हमे पंच ज्ञानेन्द्रियां मिली हैं। उससे हम दुनिया को महसूस करते हैं। हमारे जीवन की अनुभवशीलता इसी से बढ़ती हैं। हम देखते हैं, सुनते हैं; महसूस करते हैं, अनुभव करते हैं। हम कुछ पढ़ते हैं फिर उसको अमल में लाने का प्रयास करते हैं, जीवन की क्रियाओं से जोड़ते हैं। इस जुड़ाव के बाद जो क्रिया बार-बार होती हैं, वो अनुभव की गहराई को छू लेती हैं। इस प्रक्रिया से जो मिलता है वो ज्ञान हैं। हमारे जीवन में अक्सर ये होता रहता हैं, बार-बार होता रहता हैं उसे जीवन की 'ज्ञानोदय' अवस्था कहेंगे।

'बोध इति सर्वैः सह आत्मीयता' संस्कृत उक्ति को समझने का प्रयास करते हैं। यहां 'आत्मीयता' शब्द पर जोर दिया गया हैं। 'आत्मीयता' के कारण मनुष्य जीवन में प्राप्ति की गति में बढ़ोतरी आती हैं। आत्मीयता का एक अर्थ 'घनिष्ठता' भी हैं। जिसे हम 'अंतरंग झुडाव' जैसे शब्द से भी समझ सकते हैं। किसी वस्तु-व्यक्ति से जुड़ाव होना। किसी स्थिति-परिस्थिति से जुड़ाव होना। किसी स्थान-सीमा से जुड़ाव होना। प्राणी-पशु एवं पंछीओं से जुड़ाव होना। कहोना प्रकृति से जुड़े रहने का मन होता हैं। जितना गहराई से जुड़ाव होगा उतनी हमारी 'ज्ञानसंपदा' बढ़ेगी। सभी चीज़ो के प्रति घनिष्ठता मनुष्य के रुप में हमें एक अलग पहचान दे सकती हैं। हम सब जानते है कि जो व्यक्ति प्रकृति कल्याण, मानव कल्याण एवं प्राणी-पशु-पंछीओं के लिए कुछ काम करते हैं। उनके संवर्धन और विकास के लिए कार्य करते हैं; वो व्यक्ति शानदार तरीके से प्रकाश में आये हैं। कईं प्रकार के सम्मानो से उनका अभिवादन होता रहा हैं। यह समाज का स्वच्छ दर्पण हैं। उन व्यक्ति की प्रतिभावान छवि से समाज स्वस्थ भी दिखता हैं।

Enlightenment का अर्थ 'ज्ञानोदय' एवं 'प्रबुद्धता' होता हैं। उसके लिए intimacy यानि घनिष्ठता, आत्मीयता का भाव एकदम जरुरी है। इन्सान के रूप में स्वार्थवश किया गया व्यवहार वैयक्तिक दुर्बलता को ही प्रेरित करेगा। हो सकता है व्यक्ति की पहचान कोई अन्य कारणों से बढ़ जाए। लेकिन आखिर में वो लडखडा जाएगी। उसकी असर चाबी वाले खिलौने की तरह होगी। 'ज्ञानसंपदा' बहुत ही शुभ बात हैं। उसके लिए आत्मीय होना आवश्यक हैं। मैंने व्यक्तिगत रूप से कईं लोगों को देखा है। उनके पद के अनुसार प्रतिभा नहीं होती। फिर भी किसीकी वैयक्तिक मनसा से ये 'प्रतिभाव्यापार' होता रहा हैं। हमारे मानव समाज में प्रतिभा की कभी नहीं हैं; प्रतिभा को पहचानने वालों की कमी हैं। जिसे ज्ञान के साथ जीना ही नहीं हैं वो समाज को दूषित करता हैं। जिसे मैं 'व्यवहारविष' शब्द देता हूँ। उससे शायद बेचनेवाले और खरीदनेवाले खुश होंगे। मानव समुदाय का कतई भला नहीं होगा।

फिर मैं 'आत्मीयता' और 'घनिष्ठता' की याद दिलाता हूं। हम केवल मानव संबंध की बात करें तो उसमें भी इनकी ही बोलबाला हैं। आज 'प्रेम' शब्द और भाव में भी कमी दिख रही हैं। उसका कारण घनिष्टता का अभाव ही माना जाएगा। इस सत्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा। मनुष्य जीवन की उत्कृष्ट गति का आधार प्रेम ही हैं। संसार में प्रेम के कारण ही मानव संबंधो में लचीलापन बना रहेगा। कैसी सुंदर बात हैं...! मुझे आत्मीय बनना है; मेरे जीवन में 'ज्ञानदीप' को प्रज्वलित करना हैं। संसार के उत्तम कार्यो में नैमित्तिक भूमिका अदा करनी हैं। शायद ईश्वर की मर्ज़ी इसमें होगी क्या !?

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Thursday, July 30, 2026

A beautiful light waiting for you..!
July 30, 2026 3 Comments

 BE BRAVE

when your path is dark. Believe you are healing with cvery step because there's a beautiful light waiting for you.
Roger Lee

मैं विचार और उस विचार के स्रोत से अक्सर अभिभूत होता रहा हूं। वैसे चरित्र के बारे में जानना, पढ़ना और उनके संघर्ष को महसूस करना अच्छा लगता हैं। एक विचार पढकर पसंद आता हैं फिर मैं यह विचार किसने लिखा हैं ? इसके बारें में छानबीन शुरु करता हूं। मुझे उस मशक्कत से भी आनंद मिलता हैं। वो मेरा आनंद आप सब में बांटता रहता हूं। इसे मैं मेरा 'आनन्दविश्व' कहता हूँ।


रोजर लुन यु.एन ली (कार्यकाल 19 फरवरी 1920 से 23 जून 1981) वो एक अमेरिकी 'मॉडर्निस्ट आर्किटेक्ट' थे। जिन्होंने उत्तरी कैलिफ़ोर्निया, नेवादा और हवाई में 100 से ज़्यादा मकान और दूसरे प्रोजेक्ट्स को डिज़ाइन किया था। उनका ज़्यादातर काम 1960 के दशक में हुआ था। और मुख्य रूप से सान फ़्रांसिस्को के एरिया में हुआ था। उन्हें एक ऐसे आर्किटेक्ट के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने मीडिल क्लास के लिए शानदार स्टाइल वाले घर डिज़ाइन किए थे। आज उन्हें 'सदी के बीच के दौर के भुला दिए गए मॉडर्निस्ट आर्किटेक्ट्स' में से एक माना जाता है।1947 में जब ली को पहली बार लाइसेंस मिला, तब वे देश के कुछ गिने-चुने चीनी-अमेरिकी आर्किटेक्ट्स में से एक थे। अपने अनोखे 'मॉडर्निस्ट डिज़ाइन' के तरीकों की वजह से उन्हें अपने समय के सबसे बुद्धिमान आर्किटेक्ट्स में से एक माना जाने लगा था। (स्रोत विकीपीडिया)

"हिम्मत रखो, जब तुम्हारा रास्ता अंधेरे से भरा होता हैं, तो विश्वास रखो कि हर कदम के साथ तुम ठीक हो रहे हो। क्योंकि एक खूबसूरत रोशनी तुम्हारा इंतज़ार कर रही होती है।"

मैंने रोजर ली के इन शब्दों में अद्भुत उर्जा महसूस की है। अंधेरा कायम नहीं रहेगा। पीडाओं का भी अंत होता हैं। शर्त इतनी हैं; विश्वास रखना हैं। कदम-कदम पर आस्था बनाए रखनी हैं। एक अद्भुत आशावाद के इन शब्द को फिर एक बार पढ़े; "एक खूबसूरत रोशनी तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं..!" हमें केवल इनमें श्रद्धेय बने रहेना हैं।

हम सबने अपने-अपने जीवन में छोटी-मोटी कठिनाईयां देखी होगी, झेली भी होगी। उनमें से गुजरने का दर्द सबने कहीं न कहीं सहा होगा। कईं बार टूटना हुआ होगा, शायद भीड़ में भी अकेलापन सहा होगा। बारबार बिना कारण आंखे नम सी हुई होगी। पीड़ा सहने की गुलजार की एक गज़ल पढ़ें, सूकून मिलेगा। फिर रोशनी की ओर बढ़ते हैं।

शाम से आँख में नमी सी है, आज फिर आप की कमी सी है।
दफ़्न कर दो हमें कि साँस आए, नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है।
कौन पथरा गया है आँखों में, बर्फ़ पलकों पे क्यूँ जमी सी है।
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर, आदत इस की भी आदमी सी है।
आइए रास्ते अलग कर लें, ये ज़रूरत भी बाहमी सी है।

ऐसी तड़प में से भी एक रास्ता निकलकर सामने आया होगा। सामने मंजिलों के कारवे उमड़-घूमडकर आया होगे। काफ़ी दिनों से जिस मंज़र का इन्तज़ार था वो आंखो के सामने उठ खड़ा हुआ होगा। जैसे खुबसूरत रोशनी से भरा मंज़र..! आनंद से भरे वो लम्हें..! सलाम गुलजार साहब !

इस विषय को आगे बढ़ाते ओशो का स्मरण हुआ। ओशो रजनीश कहते है : "तुमने देखा है नदी को वो पत्थरो से टकराती हैं, वो गिरती है, वो घूमती है। वो रास्ता बदलती है लेकिन वो गबराती नहीं, क्योंकि नदी को पता हैं समंदर तय हैं। तुम्हें सिर्फ एक बात नहीं पता 'हमारा समंदर भी तय हैं..!' एक मुकाम तय हैं। तुम्हें लगता हैं तुम्हारी हार अंत हैं, पर मैं कहता हूं हार तैयारी हैं। तुम्हें लगता है टूटना बर्बादी है पर मैं कहता हूं टूटना जन्म हैं। मैं तुम्हें एक तीखा सच बताता दूं...जीवन उन्हीं के साथ कठोर होता है जिन्हें वो भीतर से मजबूत बनाना चाहता हैं। कमज़ोरो को जीवन सहलाता हैं और मजबूत लोगो को जीवन तपाता हैं। तपाने का मतलब सजा नहीं तपाने का मतलब शुद्ध करना हैं !" ओशो की इस बात से ज्य़ादा अंधेरे के सामने खड़ा रहने की बात कोई नहीं कर सकता। ओशो की स्पष्टता भरी बातो की यही ताक़त हैं।

कभी कभार खाली हो जाना भी जरुरी हैं। हमारे खाली हाथ प्रार्थना बन सकते हैं। आज नहीं तो कल वो उजियारा बनके हमारे सामने जरुर  आकारित होते रहेंगे। आज 'आनंदविश्व सहेलगाह' के वैचारिक ब्लोग में बस इतना ही..!

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રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવારની વર્ષગાંઠનો અવસર...!

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...! 'રજતમિલન' એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં,  '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' ...

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