Love needs breathing Natural, graceful, enduring.
प्रेम को स्वाभाविक, सुंदर और स्थायी रूप से सांस लेने की आवश्यकता होती है।बेहतरीन शब्द और विचारों का मैं दिवाना हूँ। एकबार कोई विचार मुझे पसंद आ जाए फिर उस पर चिंतन शुरु हो ही जाता हैं। शायद ये मेरी बेहतरीन कमज़ोरी भी हैं। मुझे इस कमजोरी से प्यार हैं। इन्ही स्वभाव के कारण शायद अच्छे शब्द-विचार के संपर्क में आना सहज हो जाता हैं। healing hearts page पर से एक विचार मिला। चलों, इसे हम प्यार से समझे और अपना अच्छावाला मूड़ बनाए।
सांस लेने की जरुरत हरेक जीव को होती है। साथ में हरेक शरीर को भी होती हैं। लेकिन यहाँ तो प्रेम को स्वाभाविक सुंदर और स्थायी रुप से सांस लेने की आवश्यकता है, ऐसा कहा गया हैं। प्रेम खुद स्वाभाविक हैं, प्रेम को शरीर नहीं हैं, आकार नहीं हैं। प्रेम सचेतन भी नहीं हैं। प्रेम की कोई आवाज भी नहीं हैं। प्रेम रंग और सुगंध से भी परे हैं। प्रेम को प्रकृति की किसी भी वस्तु के साथ तुलना कर सकते हैं। जहाँ ख़ुशनुमा वातावरण दिख़े वहाँ प्रेम प्रकट होगा ही होगा। लेकिन दिखाई नहीं पड़ेगा, तो प्रेम सांस कैसे ले सकता हैं !? जरा, सोचने में जोर लगना पड़े ऐसी बात हुई हैं। चलों, आज कुछ हवा जैसा बनकर अदृश्य प्रेम को पकड़ने का थोड़ा प्रयास करते हैं। जहाँ प्रेम दिखे वहाँ एकदम से रुक जाएंगे...!
प्रेम तो अक्सर सांस लेता हैं। प्रेम सृष्टि का अनमोल 'स्थायीभाव' हैं। वो सृष्टि के कण-कण में समाहित हैं। सृष्टि की हरेक सुंदरता में प्रेम हैं। हवा के हरेक झोंके में, हरेक लहर में प्रेम बसा हैं। प्रेम के साथ स्वाभाविकता खड़ी हो तो ही वो प्रकट होगा। मनुष्य जीवन के दूसरे भावो की तुलना में प्रेम की कीमत भारी हैं। जब प्रकृति में दो वस्तु या व्यक्ति के बीच एकत्व का संचार होता हैं। तब अद्वैत का पुष्प आकारित होता हैं। उसे हम प्रेम कहते हैं। जब एक दूसरे का सानिध्य बनता है, तब प्रेम सांस लेता हैं।
प्रकृति में से एक घटना लेते हैं। जब धरती की तृषा बढ़ जाती हैं, गर्मी सीमा तोड़ रही होती हैं, व्याकुलता की पराकाष्ठा के बाद बादल का बरसाना एक अदृश्य होकर भी जीवंत घटना हैं। तब धरती के सांस की महसूसी शानदार होती हैं। हमें भी वो पहेली बारिश की खुशबु याद रहती हैं। हमारी सांसो को भी ये महसूस होती हैं। ये हैं, सांसो का कमाल, ये प्यार की खुशबु हैं। मनुष्य के रुप में हमारी सांसे भी ईश्वर के दिये हुए 'प्रेमपुष्प' से कम नहीं हैं। उस पर हमारा अधिकार भी नहीं हैं। "जितनी चाबी भरी रामने उतना चले खिलौना..!" गीत की तरह शरीर को जितनी सांसे मिली हैं इतना चलेगा। हरेक जीवन को मिली सांस और धड़कन निराकार ईश्वर की देन हैं। इस सत्य का स्वीकार करना न करना वैयक्तिक स्तर की बात हैं। संसार प्रेम के लिए ही आकारित हुआ हैं, ऐसी मेरी दृढ़ मान्यता हैं।
प्रेम जहाँ पलता है वहाँ सांस एक संगीत की तरह बजने लगता हैं। जहाँ जीवंतता है वहां अक्सर प्रेम पनपता ही जाता हैं। वहाँ अदृश्य़ सांसे चलती ही रहती हैं। इसे अद्भुत अनुभूति समझकर चलेंगे तो जीवन आनंद से हराभरा रहेगा। सृष्टि के झड-चेतन सभी पहलूओं में सांस है तब-तक उनका अस्तित्व रहता हैं। शायद इसे 'प्रेमबंधन' कहो, इसके कारण कोई स्थिति कायम रहती हैं। बाकी सनातन बने रहना कठिन हैं। हां, प्रकृति और सनातन जहां विद्यमान हैं, वहाँ हमेशा प्रेम सांस लेता ही रहता हैं। सांस की सुंदरता और स्वाभाविकता कायम रहती है। चलो, प्रेमभरी सांसो को महसूस करे..!
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli
Gujarat.
India.
drbrijeshkumar.world
Dr.brij59@gmail.com
M 91+ 9428312234

No comments:
Thanks 👏 to read blog.I'm very grateful to YOU.