December 2025 - Dr.Brieshkumar Chandrarav

Tuesday, December 30, 2025

I feel I'm alive..!
December 30, 20251 Comments

When you call on me,

when i hear you breathe,

I get wings to fly.

I feel I'm alive.
lofilulla.

जब तुम मुझे पुकारते हो, जब मैं तुम्हारी साँसें सुनता हूँ, मुझे उड़ने के पंख मिल जाते हैं..! मुझे लगता है कि मैं जीवित हूँ..! ● लोफिलुल्ला

कुछ शब्द नहीं होते, धडकन का साज होते हैं। ये शब्द जीवन की यात्रा को बेहतरीन बनाते हैं। ये शब्द भी तो वर्णो का मिलन हैं। और जहां मिलन होता है वहाँ लाजवाब ही घटित होगा। सारे ब्रह्मांड में प्रकृति के सभी पहलूओं में मिलाव ही तो भरा हैं। एक चीज दूसरी चीज से मिलकर एक ओर चीज निर्माण करती हैं। ब्रह्मांड में एकत्व का भाव ही मुख्य हैं, यहाँ समता हैं, संयोजन है और समाहित होना सहज भाव हैं। इसलिए प्रकृति वैविध्य से भरी होने के बावजूद एक ही हैं। उसके सामने 'मनुष्य' शब्द बोले तो कितना कुछ वैविध्य सामने आता हैं। फिर भी मनुष्यों में भी मिलन और प्यार की बात ही भरी है। मनुष्य में भी प्रकृति का एकत्व सहज उठ खडा होता हैं। इसलिए कहे, ईश्वरीय परिकल्पना में 'मिलन' ही केंद्र में हैं।


Thanks andres..for beautiful pic. 

हमारी ही बात करते हैं, यानि की मनुष्य की बात करते हैं। मनुष्य का एक मूलभूत स्वभाव हैं उसे अकेला रहना पसंद नहीं हैं। आदिकाल को देख़ें टोली और समूह सहज ही बन गए थे। मनुष्य का समाज और अपनो में रहने का स्वभाव मूलरूप दर्शाता हैं। शायद ये ईश्वर की अनजान करामात भी हो सकती हैं। अपनो में जीना है, तो प्रेम चाहिए। इसलिए प्रेम सबसे जरुरी हैं, ऐसा निश्चित हैं। ईश्वर ही प्रेम है, ऐसा सुनकर हमसब बड़े हुए हैं। मनुष्य को प्रेम में जीना पसंद हैं। अक्सर ये स्वभाव बदलता क्यों है ये मैं नहीं जानता। लेकिन एक बात तो तय है, हमारे मन में कुछ भी पाने की लालसा भले ही ज़्यादा हो। लेकिन प्यार सबको चाहिए..! ये सत्य किसीसे छिपा नहीं हैं।

किसी आवाज से मन भर जाय, किसी आवाज को बारबार सुनने का मन करे या उस आवाज को सुनकर उड़ने का मन हो जाए..! ये बड़ी ही नाजुक हरकतें सभी के नसीब में कतई नहीं होती। इसके लिए शायद मनुष्य के रुप में "जैसा हैं वैसा" या फिर "जैसे ईश्वर के साथ आनंद आता है वैसा" जीना होगा। ऐसी अंतरंगी हरकतें किसी ओर को आपकी ओर खींच लेती हैं..! प्रेम के लिए शायद कोई चाहिए ये भी सच हैं। प्रेम भीतर की धडकन हैं, इसे व्यक्तिगत रुप से सुनना भी फ़ायदेमंद और कोई ओर सुन ले उसके लिए भी लाभप्रद हैं। प्रेम जब पारस्परिक संबंध में झुडता है तो बडा सुंदर लगता हैं। शायद ये लोगो की जुबान बन जाए या एक खुबसूरत लम्हा..! जीने के लिए ये प्यार बड़ी जरुरी चीज हैं। प्यार स्वरुप के बिना, न दिखे फिर भी और चीज न होने के बावज़ूद भी बहुत ही जरुरी हैं।

I feel I'm alive...मैं जीवित हूँ..! ऐसे अहेसास की किमत कोई चुका नहीं सकता। ये अनमोल रिश्ता, ये प्यारा संबंध कैसे बंध जाता है, इसके कारण कितना भी ढूंढो मिल नहीं सकेंगे !! प्यार के साथ जीना जीवन की सबसे बड़ी सफलता हैं। और मनुष्य के रुप में संबंध को समझना सबसे बड़ा व्यवहार हैं। ऐेसे जीव चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, बड़े ही भाग्यवान होते हैं या कहलाते हैं..! शायद उनका जीना ईश्वर को भी पसंद आता होगा..! शायद नहीं निश्चित ही पसंद होगा..! एक हिन्दी फिल्म 'किनारा' का ये गीत जो गुलजार ने लिखा हैं, और राहुलदेव बर्मनने संगीत से सजाया हैं..! सुने और आनंद की प्यारी लहर का अनुभव करें..!

'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा,
मेरी आवाज़ ही, पहचान है गर याद रहे..!
वक़्त के सितम, कम हसीं नहीं,
आज हैं यहाँ, कल कहीं नहीं,
वक़्त से परे अगर, मिल गये कहीं...!
मेरी आवाज़ ही पहचान हैं गर याद रहे...!

आज के लिए शायद इतना काफी हैं...! Thanks lofilulla.

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat.
INDIA
drbrijeshkumar.org
dr.brij59@gmail.com
+91 9428312234 
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Monday, December 29, 2025

Dr. jagdish trivedi, legendary personality
December 29, 20251 Comments

એક અદ્ભુત વ્યક્તિત્વ...!

ફોટોગ્રાફ્સમાં દેખાતા સહજ સરલ ઇન્સાનનો પરિચય આપવાની બિલકુલ જરૂર નથી. પ્રામાણિકતાથી કહું છું એમની સાથેની કેટલીક પળોના ફોટાથી મારી કિંમત વધે. બીજાની કિંમત પણ વધારનારા મુઠ્ઠી ઊંચેરા ઇન્સાન એટલે પદ્મશ્રી ડૉ.જગદીશભાઈ  ત્રિવેદી..!


ત્રણવાર Ph.D એટલે અખંડ અભ્યાસુ. ગુરુશ્રી. શાહબુદ્દિન રાઠોડ પ્રત્યે અનન્ય અનુરાગી એવા જીવનધર્મી વ્યક્તિ. વિશ્વભરની ખ્યાતિ ધરાવવા છતાં ડાઉન ટુ અર્થ..! એમની સાથેનો વ્યક્તિગત અનુભવ કહું તો હું એમને મળવા ઇચ્છતો હતો. એમણે મને કહેલું :"ભાઈ ! સુરેન્દ્રનગર સુધી શું કામ લાંબા થવું છે ? સમય અને પૈસા ખર્ચાશે. એના કરતાં હું મોડાસા કે તેની આજુબાજુ આવું એટલે મળીએ...!" એ વચન પ્રમાણે ૨૮ મી ડિસેમ્બરે માઁ ઉમિયાધામ ઊંજામાં ભદ્રજન ભરતભાઈ મોદી અને કિરણબેન મોદીના 'જીવનપર્વ' માં મળવાનું થયું. પહેલાં તો આખો ચાર કલાકનો કાર્યક્રમ ભરપૂર માણ્યો. જગદીશભાઈ મન મૂકીને વરસતા રહ્યા, સૌ કોઈ તરબોળ થતાં રહ્યા. ભાષા-ભાવ અને પહાડોમાંથી ઉઠતો હોય એવો અવાજ..! વધારે પડતું લાગે તો ભલે. પણ બેધડક કહું છું, ઓછા લોકો માટે આટલો બધો પ્રેમ ઉભરાઈ આવે છે. એ પોતાના કામને ઇબાદત સમજે છે, એનું જ કદાચ આ કારણ હોવું જોઈએ. જ્યાં પ્રાર્થના જેવો માહોલ સર્જાય ત્યાં ઈશ્વર જરૂર હાજર હોય જ...! એવી અનુભૂતિ વૈયક્તિક રીતે મેં અનુભવી છે. પહેલીવારના મળવા ટાણે સંવેદનાભર્યો સ્પર્શ અને પ્રેમાળ લાગણી મેં અનુભવી. મારા વૈયક્તિક જીવનના દૃષ્ટા ગુરુવર્ય ડૉ. વિનોદભાઈ પુરાણી અને મોડાસાના સેવાધર્મી તબીબ ડૉ. દિનકરભાઈ દવેનો અનન્ય અનુરાગ યાદ આવી ગયો. આ બન્ને મહાપુરુષો સ્વધામ થયા છે. ઘણા વરસે એમનો સ્પર્શ મને જગદીશભાઈના સ્પર્શમાં અનુભવાયો. યોગાનુયોગ દવે સાહેબ પણ મૂળ લીમડી, સુરેન્દ્રનગરના વતની. બ્રહ્મદેવોના આશીર્વાદનો આનંદ..!

એમની સાથે વધારે વાતો ન થઈ શકી. પરંતુ એમ કહું જરૂર પણ ન લાગી. કારણ કે પળવારમાં એમણે ઘણું જાણી લીધું હોય એવા અહેસાસમાં હું આવી પડ્યો હતો. ફરી મળવાનો ઉમળકો મનમાં પાળ્યો છે. મા.જગદીશભાઈ કેવળ કલાકાર નથી, એ કલાધર છે. કલાને ધારણ કરનારા છે. જ્યારે એક કલાધર પોતાની કલાને સમાજકાર્યમાં ધરે છે પછી જે કંઈ સર્જાય એ અવર્ણનીય અને અદ્ભુત જ હોય..! પોતાની કલા સમાજના જરૂરિયાતમંદ માટે ખર્ચાય પછી કલા સાધનાનું સ્વરૂપ ધારણ કરી લે છે. ફ્રેન્ચ ફિલસૂફી 'જીવન ખાતર કલા' એક મૂલ્ય વિધાન છે. જે કેવળ સૌંદર્યલક્ષી સિદ્ધાંત કે સંસ્થાકીય પ્રતિષ્ઠા અથવા ઔપચારિક સ્વ-સંદર્ભ માટે બનાવેલી કલા કરતાં પણ ઉપર વાસ્તવિક માનવજીવનને સમૃદ્ધ બનાવવાની ભૂમિકાને પ્રાધાન્ય આપે છે. કલાને ફક્ત આંતરિક નિયમો દ્વારા સંચાલિત સ્વાયત્ત વસ્તુ તરીકે નહીં, પણ લોકજીવનના વિચાર અનુભવ અને અનુકંપાને ગોઠવે છે.

રીથી કહું શ્રી જગદીશભાઈનું આ નાનકડું વર્ણન મારી જ શોભા વધારનારું છે. મને લાગે છે જગદીશભાઈ માટે હવે પ્રસંશાના શબ્દો કે વર્ણનોની કોઈ જ આવશ્યકતા એમના માટે નથી..! આ ધરતી ઉપર શ્વસી રહેલા એક અદ્ભુત વ્યક્તિત્વના ધણી જગદીશભાઈને ફક્ત માણ્યા કરીએ...! બસ, એજ અભ્યર્થના..! ઈશ્વર એમને 'પ્રેરણાપુરુષ' રૂપે સુંદર સ્વાસ્થ્ય અને દિર્ઘાયુષ્ય આપે..!

આપનો Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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Monday, December 22, 2025

Our lighting life...!
December 22, 20251 Comments

कैसे हमारी प्रकाशमान ज़िंदगी बनाए रखे...!

Be a light unto yourself.

स्वयं अपने लिए प्रकाश बनो..!

हमारी ज़िंदगी अनोखे अवसर से कम नहीं हैं। मनुष्य के रुप में हमें ये अद्भुत अवसर मिला हैं। इसे कैसे सजाया जा सकता हैं ? प्रकाशमान स्थिति को बनाए रखने के लिए कैसे प्रयास करने चाहिए ? इसके मार्ग बताऊंगा ऐसा मत समझना। क्योंकि सभी मनुष्य खुद अपने जीवन का मार्ग हैं। मनुष्य के रूप में हमें क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए उसके बारें में नित्य ही भीतरी आवाज उठती रहती हैं। लेकिन भाग दौड़ भरी जिंदगी में कुछ छूट जाता है तो उसे याद करवाने का छोटा-सा काम इस ब्लोग के जरिए करता हूं। विश्व में विपश्यना के प्रसारक सत्यनारायण गोयन्काजी के प्रवचन में मुझे ये बात सुनने में आई। बात बहुत अच्छी है, तो उसे बाँट रहा हूं।


मनुष्य की जीवन गति इन चार बातों पर निर्भर हैं। जन्म से जो स्थिति मिलती है उसे हम बदल नहीं सकते। मगर हमारी अपनी जिन्दगी की चाहत में काफी-कुछ सीख सकते हैं। अपने जीवन से प्यार होना एक बहुत ही सुंदर बात हैं। प्रयास पूर्वक कुछ विशिष्ट करना है, तो कुछ हो सकता हैं। इसके लिए हमारा मन तैयार है, बस इतना जरुरी हैं। गोयन्काजी ने कही चार बातों को आपके सामने रख रहा हूँ। इन चार स्थितियों में हम कौन-सी स्थिति में हैं ? ये हमें ही तय करना पड़ेगा। इन चार स्थितियों में से कहां जाना है ? वो भी हमें ही तय करना हैं।

From darkness to darkness.
अंधकार से अंधकार की ओर
From light to darkness.
प्रकाश से अंधकार की ओर
From light to light.
प्रकाश से प्रकाश की ओर
From darkness to light.
अंधकार से प्रकाश की ओर

गोयन्काजी के विचार की मूल विभावना हमें 'बुद्ध दर्शन' में दिखाई पडती हैं। 'अप्प दीपो भव' ये बुद्ध कालीन पाली भाषा का वाक्यांश है। जिसका अर्थ है 'अपना दीपक स्वयं बनो' या 'खुद का प्रकाश स्वयं बनो' ये बुद्ध की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण उपदेश कहा जाता हैं। जो हर मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देता हैं। अपनी आंतरिक शक्ति और ज्ञान पर निर्भर रहने को प्रेरित करता हैं। तथा सत्य और सही आचरण के मार्ग पर चलने के लिए भी प्रेरित करता है। भगवान बुद्ध अपने भीतर के प्रकाश मतलब ज्ञान, विवेक और सत्य को खोजने और उस पर विश्वास करने का अद्भुत संदेश देते है।

अब उन चार स्थितिओं को फिर एकबार पढ़ ले। सबसे अच्छी स्थिति वो मनुष्य खुद निर्माण करता है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर गति करता हैं। ये जीवन के ख़ूबसूरत क्षण कहलायेंगे। जो इन्सान जागता हुआ हैं, वो कदापि अंधकार में डूबता नहीं हैं। चाहे कुछ असुविधाओं में जीना पडता हो। अवहेलनाओं में से गुजरना पड़ता होता हो। जन्म के कुछ अमानवीय बंधनों से जूझना पड़ता हो। इसे जीवन का अंधेरा मान ले फिर भी उस इन्सान की नज़र प्रकाश की तरफ रहती हैं। वो कभी हारता नहीं, वो कभी अमानवीय स्थिति के दलदल में फंसता नहीं। ईश्वर ऐसे इन्सान को सही दिशा में पहुंचा ही देते हैं। अंधकार से प्रकाश की ओर...एक मानवीय मुकाम की ओर वो पहुंच ही जाता हैं।

हमारी आज अच्छी हैं, प्रकाशमान है। तो उसको बचाए रखने की या उस स्थिति को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी हमारी हैं। आज के उपर ही कल निर्भर हैं। हमारा जीवन अच्छा हैं तो इसे ईश्वर की कृपा समझेंगे। आज ठीक नही हैं फिर भी अच्छा करते रहना हैं। उससे आनेवाला कल बेहतरीन होगा। इन चार बातों में मनुष्य जीवन की प्रकृति बताई गई हैं। हमें हमारी प्रकृति खुद तय करने का अधिकार हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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Monday, December 15, 2025

VIPASSANA एक अद्भुत अनुभव..!
December 15, 2025 4 Comments

VIPASSANA is one of india's most ancient meditation techniques.

विपश्यना भारत की सबसे प्राचीन ध्यान तकनीकों में से एक है।

ईश्वर की करामात या फिर पूर्व जन्म के कर्म कहे मुझे अच्छे अनुभवो में से गुजरने का अवसर मिल ही जाता हैं। मेरा वैयक्तिक जानना और सीखने का स्वभाव भी इस आनंद क्षण के लिए निमित्त रहा हैं। एक ऐसा ही संयोग मेरे जीवन में आया, कुछ अनुभव साझा करुं इससे पहले थोडी जानकारी विपश्यना के बारें में...!


बर्मा में से शुरु हुई एक अद्भुत साधना ने आज एक विशेष मुकाम हासिल कर लिया हैं। लेकिन ये साधना विधि तो हमारे प्राचिन भारत की ही देन हैं। लगभग पच्चीस शतक पहेले भारत में हुए भगवान बुद्ध ने इसका अनुसरण करके हमें इस 'विपश्यना साधना विधि' से अवगत करवाया था। काल की कुछ विषैली घटनाओं ने प्राचीन विपश्यना साधना को नष्ट कर दिया था। हम जानते हैं की भारत में गौतम बुद्ध के द्वारा बौद्ध परंपरा विश्व के काफ़ी कुछ देशों में पहुंची हैं। शरीर और मन की गहराई को अनुभूत करने से जो स्पष्टता मिलती है वही उत्तम जीवन हैं। भगवान बुद्ध वो अनुभूति के महासागर हैं। इसके कारण ही चीन-नेपाल, बर्मा-जापान, इन्डोनेशिया, म्यांमार से लेकर श्रीलंका तक यह करुणामय बौद्ध विचार पहुंचा था।

आज 'विपश्यना' आचार्य सत्यनारायण गोयन्काजी के अथक प्रयास से पूरे विश्व में आकर्षण पैदा कर रही हैं। गोयन्काजी १९२४ में बर्मा में जन्मे थे। लेकिन उनका परिवार मूलभूत रूप से भारत के राजस्थान से था। बर्मा सरकार के महालेखाकार सयाजी-उ-बा खिन ने गोयन्काजी को इस विधि से अवगत कराया था। मनुष्य जीवन की अध्यात्मिक गहराई से झुडी ध्यान की यह साधना विधि हैं। अपने हिन्दु होने के गौरव को बचाने की भ्रांति में सत्यनारायण गोयनका ने १ सितंबर १९५५ को विपश्यना की पहली शिविर की। केवल सांस के आवागमन को देखते रहेना और चित्त की मूलभूत अवस्था को दृष्टाभाव से देखते रहेना। उन्होने शील पालन के लिए कठोरता पूर्वक संयमित १० दिन शिविर में बिताए। साथ ध्यान विधि में 'आर्यमौन' का पालन भी करना था। आर्यमौन का मतलब 'इशारे और नजर' से भी किसी दूसरे व्यक्ति से अनुसंधान नहीं करना हैं। गोयन्काजी के लिए शिविर का अनुभव द्विजत्व से कम नहीं था। उनके विचारो में स्पष्टता आने लगी थी। कईं भ्रांतियां टूटने लगी थी। वास्तविक स्थिति सामने स्पष्ट हो रही थी। परंपरागत मान्यताओं की समझ बढ़ने लगी थी। भारत का एक व्यक्ति भारत के प्राण के संपर्क में आ रहा था।

बाद में गोयन्काजी ने आचार्य सयाजी के मार्गदर्शन में १४ साल की कड़ी तपस्या की। गुरुजी ने प्रेमाआदर से और गोयनकाजी की विकसित प्रज्ञा को देखते हुए गृहस्थ आचार्य पद पर नियुक्त किया था। साथ उन्होंने ऐसी श्रद्धा व्यक्त की "भगवान बुद्ध के कारण यह ध्यान साधना विधि हमें मिली हैं, हम इसे भारतभूमि का बर्मा के उपर ऋण समझते हैं। मैं इच्छुक हूं की आप भारत में यह विपश्यना विधि को पुनः प्रस्थापित करें और हमें भारत से ऋण मुक्त करें।" बौध उपासक सयाजी उ-बा-खिन के ऐसे सद्भाव से 'विपश्यना ध्यान विधी' सत्यनारायण गोयन्काजी के निमित्त से भारत में पुन:स्थापित हो रही हैं।

The Buddha said, a mediator practises ardently, without neglecting for a moment awareness and equanimity towards sensations, such a person develops real wisdom, understanding sensations completely.

भगवान बुद्ध ने कहा है, "जब कोई ध्यान करने वाला व्यक्ति चेतना और इंद्रियों के प्रति समभाव को क्षण भर के लिए भी उपेक्षित किए बिना लगन से अभ्यास करता है, तो ऐसा व्यक्ति सच्ची बुद्धि विकसित करता है और इंद्रियों को पूर्णतः समझ लेता है।" इन शब्दो की विश्वसनीयता क्या हैं तो कह सकते हैं, स्वयं भगवान बुद्ध...! इन शब्दो के आधार पर विपश्यना आज आचरण बनकर उभर रही हैं। हमारी उच्चतम परंपरा की झड़े कितनी गहरी है उसे मिटाना असंभव हैं। स्वार्थवश समाज और सत्य से पराभूत समाज कुछ समय के लिए इसे नुकसान कर सकता हैं। इसे मिटा नहीं सकता..! संसार में बुद्ध पैदा होते ही रहेंगे। शायद इसे हम प्रकृति का अमर फ़रमान भी समझ सकते हैं।

बुद्ध की जीवन के प्रति करुणा, शांति और समता के विचार को अनुभूत करना संभव हुआ है, विपश्यना ध्यान साधना के द्वारा ऐसे प्रमाण मिल रहे हैं।

विपस्सना शब्द दो भागों से मिलकर बना है। 'वि' का अर्थ है 'स्पष्ट' और पस्सना का अर्थ है देखना। 'स्पष्ट रुप से देखना, वस्तु या घटना को वास्तविक रुप में देखना ऐसी एक समझ विकसित होती हैं। इसे 'अंतर्दृष्टि ध्यान' के रूप में अनुवादित कीया जा सकता है, साथ इसे मनुष्य और प्रकृति की साम्यता से भी समझा जा सकता हैं।

अतुलित अनुभव...और मेरे वैयक्तिक जीवन की पहचान कराने का अद्भुत अनुभव हुआ। बार-बार इस चित्तशुद्धि की विधि में आनंद करने का मन हो रहा हैं। अनुभूत गंगा-सागर में तैरने का एक अवसर कहते हुए अपना कृतज्ञभाव प्रकट करता हूं। भारत के मूलभूत प्राण को स्पर्श करने का अवसर विपश्यना के कारण संभव होगा ऐसी श्रद्धा प्रकट करते हुए..!

भवतु सब्ब मंगलम् !!
May all beings be happy...be peaceful, be liberated..!


आपका Thoughtbird 🐣
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Our thought process..!!

This is the nature of your Mind.  if you try to avoid certain thoughts, only those will occur. SADGURU. आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप क...

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