February 2026 - Dr.Brieshkumar Chandrarav

Wednesday, February 25, 2026

Supernatural spirits..!
February 25, 20260 Comments

The mystery of some supernatural spirits.

कुछ अलौकिक आत्माओं का रहस्य..!

एक तरफ़ समष्टि हैं, एक तरफ़ हमारा जीवन हैं। वैसे तो हम भी समष्टि का ही एक भाग हैं। लेकिन दो पहलूओं का अस्तित्व भी अलग हैं, इसलिए दो शब्दों में विभाजित करता हूँ। एक तरफ़ पर्यावरण है, आसमान की शून्यता हैं, एक ओर अदृश्य आत्मा हैं। इन सबके बीच संसार की गतिविधियां हैं। जन्म-जीवन और मृत्यु का फ़ासला हैं। छोटी-सी चींटी से लेकर कद्दावर हाथी तक के जीव की कहानियाँ हैं।

आज हम बात करेंगे कुछ अलौकिक आत्मा को लेकर पैदा हुए इन्सानों की। इस अंतरंगी विशाल सृष्टि में कितने लोग हैं..!? सबका अपना अस्तित्व हैं। सबके अलग चेहरे और सबकी अलग सोच हैं। सबकी पसंद नापसंद भी विभिन्नता से भरी हैं। खान-पान, रहन-सहन और भाषाभूषा भी अलग हैं। इनमें किसी को हम महान आत्मा के तौर पर स्वीकार करते हैं। उनका स्वीकार करते हैं साथ में उनका अनुसरण भी करते हैं। सबके लिए ऐसा होना संभव नहीं हैं। ऐसा थोड़े बहुत लोगों के लिए ही संभव हैं। एक श्लोक के जरिए हम इसे समझने का प्रयास करें..!
केचन आत्मान: स्थायिन: न भवन्ति
बोधनाय प्रविश्य उत्क्रांतये निर्गच्छन्ति।
Some souls are not meant to stay. They enter to awaken you and leave to evolve you. कुछ आत्माओं का यहाँ रहना तय नहीं होता। वे हमें जागृत करने के लिए आती हैं और आपको विकसित करने के लिए चली जाती हैं।


Friedrich Nietzsche फ्रेडरिक नीत्शे  जो जर्मनी के दार्शनिक और मनोविश्लेषणवादी थे। इस संसार में उनका जीवनकाल 15 अक्टूबर 1844 से 25 अगस्त 1900 तक का रहा था। अस्तित्ववाद एवं परिघटना मूलक चिंतन Phenomenalism के विकास में नीत्शे की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। युरोय के व्यक्तिवादी तथा राज्यवादी दोनों प्रकार के विचारकों ने नीत्शे से प्रेरणा ली थी। जर्मन कला-साहित्य पर नीत्शे का गहरा प्रभाव भी रहा है। उसे 'नीत्शेवाद' से जाना जाता है।

फ्रेडरिक नीत्शे 24 वर्ष की ही आयु में 'बेस्ल विश्वविद्यालय' में भाषा-विज्ञान के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हो गए थे। एकबार वो विद्यालय के दरवाज़े पर खड़े हो गए। उनके हाथ में एक बाॅर्ड था। इनमें लिखा था: "ईश्वर की मृत्यु हो गई..!" सारे छात्रों को अचरज हुआ। पूरे विद्यालय में यह बात फैल गई। इकट्ठे हुए सब लोग अपने विद्वान प्रोफ़ेसर के कारनामे से अचंभित थे। फिर नीत्शे ने उसपर प्रकाश डालते हुए कहा: " जब तक ईश्वर जिंदा है तबतक हम कुछ करने के प्रयास में आलस्य करेंगे। हम बिना प्रयत्न से सिर्फ़ ईश्वर पर भरोसा करके बैठे रहेंगे। लेकिन कोई ईश्वर हमें बिना लगन बिना प्रयास से कुछ भी देनेवाला नहीं हैं। ऐसा प्रतित होगा तब इस पुरुषार्थ के महत्व को समझ सकते हैं। इतना सुनते ही सब शांत हो गए और नीत्शे का कहना समझ भी गए..!"

हमारी श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के सिद्धांत के बारे में ही कहा हैं। अकर्मण्य तो विष समान हैं। श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय के इस श्लोक से हम सब भलीभांति परिचित हैं। भगवान कहते हैं :
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
"तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करना ही है| कर्मों के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है| अतः तुम निरन्तर कर्म के फल पर मनन मत करो और अकर्मण्य भी मत बनो।"

'ज्ञान-कर्म' की गहराई को स्थापित करने हेतु महान आत्माएं इस धरती पर अवतरित होती रहती हैं। समष्टि का उचित मार्गदर्शन करती हैं। और एक सिमास्तंभ रुप कार्य करती हैं। जीवन का बहतरीन उद्देश्य सिखाकर चली जाती हैं। सारे संसार में ऐसी बहुत कम आत्माएँ जन्म धारण करती हैं। ये ईश्वर की ही अदृश्य करामात हैं। कईं लोग उनके व्यक्तित्व को कलुषित करने का प्रयास करते हैं लेकिन कुछ नहीं कर पाते। वो अपना निमित कर्म दमदार तरीके से पूरा करते हैं। वे महान आत्माएं संसार को जागृत करके विकसित होने का पाठ सिखाकर दुनिया छोड़कर चली जाती हैं। हमारे भारतवर्ष की ऐसी कईं आत्माओं को नमन करता हूँ। स्वामी विवेकानंद का एक नामस्मरण काफ़ी लगता हैं। बाकी आप सब जिस चरित्र से प्रभावित है उनके बारें में अपना अहोभाव प्रकट कर सकते हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat, INDIA
Dr.brij59@gmail.com
drbrijeshkumar.world
+91 9428312234





Reading Time:

Sunday, February 15, 2026

Enduring of love..!
February 15, 20260 Comments

Love needs breathing Natural, graceful, enduring.

प्रेम को स्वाभाविक, सुंदर और स्थायी रूप से सांस लेने की आवश्यकता होती है।

बेहतरीन शब्द और विचारों का मैं दिवाना हूँ। एकबार कोई विचार मुझे पसंद आ जाए फिर उस पर चिंतन शुरु हो ही जाता हैं। शायद ये मेरी बेहतरीन कमज़ोरी भी हैं। मुझे इस कमजोरी से प्यार हैं। इन्ही स्वभाव के कारण शायद अच्छे शब्द-विचार के संपर्क में आना सहज हो जाता हैं। healing hearts page पर से एक विचार मिला। चलों, इसे हम प्यार से समझे और अपना अच्छावाला मूड़ बनाए।

सांस लेने की जरुरत हरेक जीव को होती है। साथ में हरेक शरीर को भी होती हैं। लेकिन यहाँ तो प्रेम को स्वाभाविक सुंदर और स्थायी रुप से सांस लेने की आवश्यकता है, ऐसा कहा गया हैं। प्रेम खुद स्वाभाविक हैं, प्रेम को शरीर नहीं हैं, आकार नहीं हैं। प्रेम सचेतन भी नहीं हैं। प्रेम की कोई आवाज भी नहीं हैं। प्रेम रंग और सुगंध से भी परे हैं। प्रेम को प्रकृति की किसी भी वस्तु के साथ तुलना कर सकते हैं। जहाँ ख़ुशनुमा वातावरण दिख़े वहाँ प्रेम प्रकट होगा ही होगा। लेकिन दिखाई नहीं पड़ेगा, तो प्रेम सांस कैसे ले सकता हैं !? जरा, सोचने में जोर लगना पड़े ऐसी बात हुई हैं। चलों, आज कुछ हवा जैसा बनकर अदृश्य प्रेम को पकड़ने का थोड़ा प्रयास करते हैं। जहाँ प्रेम दिखे वहाँ एकदम से रुक जाएंगे...!


प्रेम तो अक्सर सांस लेता हैं। प्रेम सृष्टि का अनमोल 'स्थायीभाव' हैं। वो सृष्टि के कण-कण में समाहित हैं। सृष्टि की हरेक सुंदरता में प्रेम हैं। हवा के हरेक झोंके में, हरेक लहर में प्रेम बसा हैं। प्रेम के साथ स्वाभाविकता खड़ी हो तो ही वो प्रकट होगा। मनुष्य जीवन के दूसरे भावो की तुलना में प्रेम की कीमत भारी हैं। जब प्रकृति में दो वस्तु या व्यक्ति के बीच एकत्व का संचार होता हैं। तब अद्वैत का पुष्प आकारित होता हैं। उसे हम प्रेम कहते हैं। जब एक दूसरे का सानिध्य बनता है, तब प्रेम सांस लेता हैं।

प्रकृति में से एक घटना लेते हैं। जब धरती की तृषा बढ़ जाती हैं, गर्मी सीमा तोड़ रही होती हैं, व्याकुलता की पराकाष्ठा के बाद बादल का बरसाना एक अदृश्य होकर भी जीवंत घटना हैं। तब धरती के सांस की महसूसी शानदार होती हैं। हमें भी वो पहेली बारिश की खुशबु याद रहती हैं। हमारी सांसो को भी ये महसूस होती हैं। ये हैं, सांसो का कमाल, ये प्यार की खुशबु हैं। मनुष्य के रुप में हमारी सांसे भी ईश्वर के दिये हुए 'प्रेमपुष्प' से कम नहीं हैं। उस पर हमारा अधिकार भी नहीं हैं। "जितनी चाबी भरी रामने उतना चले खिलौना..!" गीत की तरह शरीर को जितनी सांसे मिली हैं इतना चलेगा। हरेक जीवन को मिली सांस और धड़कन निराकार ईश्वर की देन हैं। इस सत्य का स्वीकार करना न करना वैयक्तिक स्तर की बात हैं। संसार प्रेम के लिए ही आकारित हुआ हैं, ऐसी मेरी दृढ़ मान्यता हैं।

प्रेम जहाँ पलता है वहाँ सांस एक संगीत की तरह बजने लगता हैं। जहाँ जीवंतता है वहां अक्सर प्रेम पनपता ही जाता हैं। वहाँ अदृश्य़ सांसे चलती ही रहती हैं। इसे अद्भुत अनुभूति समझकर चलेंगे तो जीवन आनंद से हराभरा रहेगा। सृष्टि के झड-चेतन सभी पहलूओं में सांस है तब-तक उनका अस्तित्व रहता हैं। शायद इसे 'प्रेमबंधन' कहो, इसके कारण कोई स्थिति कायम रहती हैं। बाकी सनातन बने रहना कठिन हैं। हां, प्रकृति और सनातन जहां विद्यमान हैं, वहाँ हमेशा प्रेम सांस लेता ही रहता हैं। सांस की सुंदरता और स्वाभाविकता कायम रहती है। चलो, प्रेमभरी सांसो को महसूस करे..!

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli
Gujarat.
India.
drbrijeshkumar.world
Dr.brij59@gmail.com
M 91+ 9428312234


Reading Time:

Wednesday, February 4, 2026

Spring sings within me..!
February 04, 20260 Comments

 मम अन्तः वसन्तः गायति...!

आज वसंत के साज छेडने का मन हैं। सहज ही वसंत मुझे छेड़ रही हैं। वैसे तो सबका यहीं अनुभव होगा। चलो, आज वसंत के साथ आनंदभरी मस्ती करते हैं। पहले दो सुंदर कृति का आस्वादन करें..! फिर आगे बढ़ते हैं। अच्छे शब्द विचार से झुडते हैं।

मैं देख रहा हूँ..!
झरी फूल से पँखुरी,
मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।
मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
स्रोत : पुस्तक : सन्नाटे का छंद (पृष्ठ 87) संपादक : अशोक वाजपेयी रचनाकार : अज्ञेय प्रकाशन वाग्देवी प्रकाशन संस्करण :1997

वसंत
जब तक तुम हो डर नहीं हमें।
पेड़ ने कहा:
और अपनी एक-एक पत्ती झरा दी।
स्रोत : पुस्तक : पेड़ अकेला नहीं कटता (पृष्ठ 20) रचनाकार : दफ़ैरून प्रकाशन : रामकृष्ण प्रकाशन संस्करण : 2001

वसंत को हम प्रकृति की श्रद्धा कहते हैं। प्रकृति का एक स्वभाव खिलना और सँवरना भी है। ईश्वर की यह अद्भुत करामात हैं। अदृश्य होकर भी वो एक ऐसा मंजर खडा करते हैं जिसमें सबका कल्याण ही कल्याण बसा हैं। सृष्टि के सभी चेतन-अचेतन पहलूओं को स्पर्श करनेवाली वसंत इसका जबरदस्त प्रमाण हैं। एक और बात पतझड़ की बेला शीत ऋतु में आती हैं। उस वक्त पत्तों का गिरना प्राकृतिक रुप से संभव नहीं लगता। और ग्रिष्म की शुरुआत में यानि की वसंत में नए पत्तों का उग आना भी अचंभे से कम नहीं हैं। शायद बारिश की मौसम में यह संभव लगता हैं। लेकिन ईश्वर को कुछ ओर ही मंज़ूर हैं। वो धूप में भी झरनों का बहाव कर सकता हैं। और रात के अंधेरे में भी फूल खिला सकता हैं। उसकी मर्ज़ी के अनुसार ही प्रकृति में बदलाव आते रहते हैं।


इससे यह पता चलता हैं की ईश्वर चाहे वो कर सकते हैं। किसीको अभाव या संघर्ष में से भी निकाल सकते हैं। केवल निकालना नहीं उसको उच्चतम शिखर पर स्थापित भी कर सकते हैं। उसके लिए यह सहज हैं, हम इसे चमत्कार भी कह सकते हैं। वसंत इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार हैं। ईश्वर की दुनिया चमत्कारों से भरी हैं। वो कुछ भी कर सकते हैं। वसंत को शायद ईश्वर भी चाहते हैं। उसका भी एक प्रमाण देखे...श्रीमद्भगवद्गीता के दसवे अध्याय के पैंतीसवे श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं,
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०•३५॥

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है ,जो ऋतुओ में कुसुमाकर अर्थात वसंत है, वह मैं ही तो हूँ। इसलिए कुसुमाकर की 'कृष्णप्रियता' में जीवसृष्टि का सृजन हैं। कुसुमाकर वो मौसम है जो कुसुम के एक-एक दल को पल्लवित करता हैं। इसे हम 'पुष्पऋतु' भी कहे तो भी एकदम ठीक हैं। अमराइयों में मंजरियो के रससिक्त होकर महकना और मधुमय पराग लिए उड़ाते भौरों के गुनगुनाने का अवसर है 'वसंतऋतु'..! इसे ऋतुराज या ऋतुओं की रानी भी कहा गया हैं। वसंत स्वयं ईश्वर को पसंद है इसलिए वो हमें भी पसंद पड़नेवाली हैं।

वसंत जैसे तरुवर का विश्वास है, वैसे वसंत सृष्टि की खुशबूदार मौसम भी हैं। साथ ही सौंदर्यां भी कह सकते हैं। धरती पर सुंदरता को प्रगटानेवाली ऋतु हैं। वसंत को मैं सौंदर्यां कहते हुए मन ही मन अलौकिक भाव में मस्त हो रहा हूँ। इसे मैं 'सौंदर्यांवसंत' की ही अनुभूति कहता हूं। साथ ही इसे मैं प्रकृति का 'सौंदर्यशास्त्र' कहते हुए एक हिन्दी सिनेमा 'सिंदूर' के गीत की कुछ पंक्तियाँ गा ने लगा। आप भी थोड़ा संमिलित होकर जीवन का आनंद लिजिए...! स्वर सम्राज्ञी लताजी और सुदेश वाडेकर के मधुर आवाज का मजा लीजिए..! वैसे तो यह गीत जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव जैसे पतझड़, सावन, बसंत के बीच प्यार के अनूठे मौसम बसंत में छुपे नाजुक प्रेम की भी बात करता हैं। 

पतझड़ सावन बसंत बहार,
एक बरस के मौसम चार, मौसम चार मौसम चार..!
पांचवा मौसम प्यार का इंतज़ार का,
पतझड़ सावन बसंत बहार...!

कोयल कूके बुलबुल गाए,
हर एक मौसम आये जाये,
लेकिन प्यार का मौसम आये,
सारे जीवन में एक बार, एक बार एक बार..!
पतझड़ सावन बसंत बहार..!

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat. INDIA
dr.brij59@gmail.com
drbrijeshkumar.world
+91 9428312234



Reading Time:

Our thought process..!!

This is the nature of your Mind.  if you try to avoid certain thoughts, only those will occur. SADGURU. आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप क...

@Mox Infotech


Copyright © | Dr.Brieshkumar Chandrarav
Disclaimer | Privacy Policy | Terms and conditions | About us | Contact us