June 05, 2026
BY Brij Chandrarav0
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14'th Dalai Lama says that...!
we all have right to achieve happy life.हम सभी को सुखी जीवन प्राप्त करने का अधिकार है।
"So dear brothers and sisters. I always start mention brothers, sisters everywhere. That I deliberately using that word. because much troubl, We are facing is on the basis of much division. Religiously. Nationality and like that and the political economy system. so therefore we really need a sense of oneness of humanity. seven billion human beings, actually same human being. and mentally, emotionally, physically we are same. and then most important we all have right to achieve happy life."
इन शब्दो का हिन्दी अनुवाद करके रख रहा हूं। इसे भी पढ़ें और अपने भीतर के मनुष्य को शाता पहुंचाए। दरअसल यह केवल शब्द नहीं हैं मगर आदरणीय दलाई लामा के हृदय के भाव हैं। भाव की शुद्धता कैसी होनी चाहिए ? इसकी पराकाष्ठा बयां कर रहे है ये शब्द..! साथ ही उच्चतम व्यक्तित्व की पहचान कैसे होती हैं उसका भी उचित उदाहरण हैं, १४ वे दलाई लामा।
"तो प्यारे भाइयों और बहनों। मैं हमेशा हर जगह भाइयों और बहनों का जिक्र करके शुरुआत करता हूँ। मैं जानबूझकर इस शब्द का प्रयोग करता हूँ। क्योंकि हम जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश विभाजन पर आधारित हैं। धार्मिक, राष्ट्रीयता और इसी तरह के विभाजन और राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के कारण। इसलिए हमें वास्तव में मानवता की एकता की भावना की आवश्यकता है। सात अरब मनुष्य, वास्तव में एक ही मनुष्य हैं। मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से हम सब एक हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम सभी को सुखी जीवन जीने का अधिकार है।"
१४ वें दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध है। 'दलाई लामा' कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक उपाधि है, जिसका अर्थ है 'ज्ञान का सागर' तिब्बती मान्यताओं के अनुसार वे 'अवलोकितेश्वर' जिसका मतलब करुणा के 'बोधिसत्व' हैं। वे बोधिसत्व के अवतार भी माने जाते हैं। वर्तमान में जो चौदह वें दलाई लामा हैं, उनका मूल नाम लामा 'तेनज़िन ग्यात्सो' है। उनके बारे में कुछ प्रमुख और आवश्यक जानकारी इस प्रकार हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को पूर्वोत्तर तिब्बत के एक छोटे से गाँव, ताकत्सेर में हुआ था। बचपन में उन्हें ल्हामो थोंडुप नाम दिया गया था। दो वर्ष की आयु में ही उन्हें 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दे दी गई थी। दलाई लामा पुनर्जन्म से मिलते हैं, ऐसी उनकी धर्म मान्यता हैं। पडोसी देश चीन द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा करने और 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद उन्हें अपनी जान बचाने के लिए तिब्बत छोड़ना पड़ा था। विश्व की ये भयंकर करुणांतिका कही जायेगी। बाद में उन्होने भारत में शरण लिया। वर्ष 1959 में वे पैदल ही हिमालय पार करके भारत पहुंचे थे। तब से वे भारत के हिमाचल प्रदेश में स्थित 'धर्मशाला' में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। और यहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन निर्वासित तिब्बती सरकार का संचालन कर रहे हैं।
दलाई लामा के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी देने का प्रयास हैं। लेकिन मूलरुप से मैं उनकी कही हुई मानव सभ्यता की बात को इस ब्लोग के जरिए पहुँचाने का छोटा-सा प्रयास कर रहा हूं। आज विश्व में जो कुछ सत्वशीलता हैं, उसका जीवंत दस्तावेज वर्तमान दलाई लामा हैं। उनकी सादगी और मनुष्य मात्र के लिए समानता- बंधुत्व के भाव अद्भुत हैं। 'विश्वशांति' जिनकी सोच में तरबतर दिखाई पड़ती हैं। ऐसे महान पुरुष की बात करते हुए मैं धन्यता का अनुभव कर रहा हूं। आप एक अनमोल चरित्र को पढ़कर आनंद लिजिए। दलाई लामा के वैश्विक योगदान यानी की दुनिया भर में शांति, अहिंसा और करुणा का संदेश फैलाने के लिए उन्हें वर्ष 1989 में प्रतिष्ठित 'नोबेल शांति पुरस्कार' से सम्मानित भी किया गया हैं। एक प्रकार से सम्मान जरूरी हैं मगर उससे भी जरूरी हैं उनके विचारों को अपनाया जाए। महान ईश्वर की दुनिया को बेहतर रहने दिया जाए।
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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