नभ ने धरा से कुछ नहीं कहा,
और न ही धरा ने नभ से कुछ कहा !
फिर भी न जाने,कितने अरब प्रकाश-वर्ष से चल रहा है
यह अद्भुत प्रेम..!
स्रोत: पुस्तक, 'राबिया का ख़त' पृष्ठ १८४ रचनाकार, मेधा। प्रकाशन: राधाकृष्ण पेपरबैक्स।
आज कुछ नया करने का मन हैं। 'आनंदविश्व सहेलगाह' में आसमान की सैर करने का मन हुआ। विशालता विराटता के बीच हम सब तिनके से भी छोटे हैं। लेकिन हमारा वास्तविक अस्तित्व यहां विद्यमान हैं। इस आकाश के नीचे 'नीले गगन के तले' हमारा जीवंत बसेरा हैं। इस नीले आसमान के नीचे हम श्वास ले रहे हैं, हमारे हृदय की धड़कने धबक रही हैं। हम जिंदा है, मस्ती में हैं, आनंद में हैं।
Come on, let's talk to our sky..! आज आसमान से बाते करते हैं। है विराट आकाश ! तुम सारी धरती की परछाई धरे, सारे रंगो को धारण करके युगों से अस्तित्व को धारण किए हो। धरती का सारा इतिहास तेरी आंखों में बसा हैं। मैं तुझे वंदन करता हूँ। मेरे इस जन्म के अस्तित्व को और नजाने कितने जन्मो को तुमने देखा होगा। तुम मेरी हर हरक़त के साक्षी के कितने अरब प्रकाश-वर्ष से चल रहा है तेरा और धरती का अद्भुत प्रेम..! मैं तो तेरी इस दीवानगी का छोटा-सा आनंद स्वरुप हूँ। धरती पर पैदा हुआ एक छोटा-सा पौधा हूँ ! तेरे रंगो की परछाई हूं ! बचपन से मैंने सुना है, तुम अदृश्य ईश्वर का ठिकाना हो। इस ईश्वर को याद करते हुए तेरे सामने ही देखते रहे हैं। ये सत्य है या असत्य हम नहीं जानते फिर भी आस बनाए हुए हैं। सच कहुं, तेरी विशालता पर एक नजर करता हूं तो खुश हो जाता हूं। थोड़ी देर के लिए भी मैं शांत हो जाता हूँ ! बड़ा सुकुन मिलता हैं !
हे आकाश ! तुम मुझे हरदम देख पा रहे हो और मैं भी..! मैं नहीं देख पा रहा उन्हें भी तुम देख पा रहे हो। शायद मेरी याद बनकर उन्हें अचंभित कर सकते हो। क्योंकि तेरा अधिकार सर्वत्र हैं। तेरे विशाल क्षेत्र में हम सब बसे हैं। तेरी असीमित शक्तियों के सामने मैं आनंद पूर्वक नत मस्तक हूं। एक बात बताऊं, बचपन में तेरे 'क्षितिज मिलाप' को देखने का बहुत मन करता था। फिर समज में आया कि ये मेरे मन की कल्पना हैं, संभावना के प्रति केवल एक विचार हैं, हक़ीकत नहीं..! ये जानते हुए भी मुझे क्षितिज से लगाव हैं। धरती और तेरे मिलन की ये कल्पना मुझे आनंदित करती हैं। सचमुच, मुझ में प्यार की तरंगे उठती हैं। हृदय में मिलन का विचार स्पष्ट रुप से आकारित होता हैं।
हे शून्यता के सागर ! तुम मुझे एकांत सिखाते हो। अपनी विशाल आगोश में मुझे सूकुन की गहराई का अनुभव होता रहा हैं। जब भी परेशान हूँ तो तुम्हें देखता हूँ और आनंद से भर जाता हूं। तेरे 'अखंड मंडलाकारं' स्वरुप से मैं शांति का अनुभव करता हूं। हे आकाश ! तेरी शून्यता ही शांति की मुख्य धारा हैं। तेरी विशालता ही प्रेम प्रगटन का आधार हैं। धारण करते हुए भी स्थिर रहना ये तेरी असिमित कृपा हैं..! तेरी आगोश में मैं हरदम प्रेम और शांति का मंजर अनुभूत करता रहा हूं।
मेरी कल्पना के साथ 'धरती और आसमान' कविता जो अंजना भट्ट ने लिखी है, चलो, कविता का आस्वादन करते हैं।
मैं ? मैं हूँ एक प्यारी सी धरती!
कभी परिपूर्णता से तृप्त और कभी प्यासी आकाँक्षाओं में तपती,
और तुम ? तुम हो एक अंतहीन आसमान !
संभावनों से भरपूर और ऊंची तुम्हारी उड़ान।
कभी बरसाते हो अंतहीन स्नेह और कभी
सिर्फ धूप.! ना छांह और ना मेंह...!
मैं रहूँगी तुम्हारी प्रिया धरती !
और रहोगे तुम मेरे प्रिय आसमान..!
मैं ? मैं हूँ आसमान की धरती और तुम ?
तुम हो धरती के आसमान..!
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat.
INDIA
drbrijeshkumar.org
drworldpeace.blogspot.com
+91 9428312234

હે શૂન્યતા કે સાગર...
ReplyDeleteधरती और आकाश का समन्वय एक सुंदर और गहरा विषय है! धरती और आकाश दोनों ही हमारे जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और उनका समन्वय हमारे अस्तित्व को बनाए रखने में मदद करता है
ReplyDeleteधरती हमें जीवन के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करती है, जैसे कि पानी, हवा, मिट्टी और वनस्पति
धरती की मिट्टी में पोषक तत्व होते हैं जो पौधों को बढ़ने में मदद करते है
धरती की विविधता हमें विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं और पौधों के लिए आवास प्रदान करती हैं आकाश हमें सूर्य की ऊर्जा प्रदान करता है, जो जीवन के लिए आवश्यक है
आकाश में बादल होते हैं जो वर्षा को नियंत्रित करते हैं और धरती को पानी प्रदान करते हैं
आकाश की विविधता हमें विभिन्न प्रकार के मौसम और जलवायु प्रदान करती है
धरती और आकाश का समन्वय हमारे जीवन को बनाए रखने में मदद करता है
धरती की मिट्टी और आकाश की ऊर्जा मिलकर पौधों को बढ़ने में मदद करते हैं
धरती की विविधता और आकाश की विविधता मिलकर हमें विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं और पौधों के लिए आवास प्रदान करते हैं
JJSL✍️✍️✍️
Nice bro 🙏
ReplyDelete