This is the nature of your Mind. if you try to avoid certain thoughts, only those will occur.
SADGURU.आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप कुछ विचारों से बचने की कोशिश करेंगे, तो केवल वही विचार उत्पन्न होंगे।
मन के स्वभाव को समझना मुश्किल हैं। मन को चंचल कहा गया हैं। मन की दौड को पकड़ना कठिन हैं। मन की गति को आज तक नापना संभव नहीं हुआ हैं। मन अदृश्य होकर भी हमें बांधकर रखता हैं। मन की तरंगे उठती हैं, शांत होती हैं। इन तरंगो के ईशारे हम नचाते हैं। हम चाहकर भी कोई विचार को बंद नहीं कर सकते, मतलब हमारे दिमाग को हम ऐसा कोई आर्डर भी नहीं दे सकते। विचार की मूल ही अवधारणा बहना हैं। इसी लिए सद्गुरु के उन वचन को एकबार ओर पढ़िए। "आपके मन का स्वभाव यही है; यदि आप कुछ विचारों से बचने की कोशिश करेंगे, तो केवल वही विचार उत्पन्न होंगे।" मतलब विचारों से बचना नामुमकिन हैं। उसे बहने देना ही ठीक हैं।
अब एक दो प्रश्न उठते हैं।
विचारों की इस अस्खलित धाराओं में केवल बहना हैं ?
या फिर,
विचारों को रोकने का प्रयास करना हैं ?
चलों कुछ ऐसा सोचते हैं जिसे कुछ हल मिले ऐसा फिटिंग्स आए। विचारों को रोकने का प्रयास करना व्यर्थ हैं, उसे रोकना नहीं है केवल दिशा बदलनी हैं। जो विचार मन में उद्घटित होते हैं, उसमें से जीवन खोजना हैं। अपने लिए जरुरी है, हमारे जीवन में आनंद भरने वाले, हमारे आनेवाले समय को बेहतर बनाने वाले विचारों को छूटे दौर से प्रगट होने देना हैं। कोई हरक़त के बिना उसका स्वागत करते रहना हैं। एक बात समझ लेनी चाहिए। कि विचार हमारे अनुभवो की पड़छाई हैं। जीवन में जो कुछ घटित होता है, वो बार बार विचार का रुप धरकर हमारे सामने आते हैं। कल्पना के जरिए वो हमारे वर्तमान को प्रभावित करते हैं। कभी-कभार हम इस विचार की आँधी में फंस भी जाते हैं। इसने कईं प्रकार के रोगो का स्थान भी ले लिया हैं।
विचार एक प्रवाह हैं, हमें इस प्रवाह का आनंद लेना हैं। विचार तो जीवन का आधार हैं। हम इस आधार से डरे या दूरी बनाएं ये कैसे संभव होगा। सुंदर विचार के लिए मन की शुद्धि आवश्यक हैं। मन में किसी के लिए भी कटुता पैदा हुई तो समझो जीवन बेकार हो जाएगा। मन में इस कटुता के कारण वैमनस्य या असूया बढ़ेगी। और इसको झेलना तो खुद ही पड़ेगा, कोई बचानेवाला नहीं हैं। 'विचारआनंद' के लिए हमारे पास ध्यान विधि है, धर्माचार हैं साथ ही आध्यात्मिक गति हैं। ये तीन हमारी मूलभूत सम्पदाएं हैं। इससे ही मनुष्य जीवन में वैचारिक आनंद की प्राप्ति हो सकती हैं। विचार प्रवाह को 'आनंदगति' एवं 'योग्यदिशा' मिल सकती हैं।
सांप्रत समय में सब समस्याओ का समाधान मिल सकता हैं। आज मनुष्य भौतिक वआर्थिक रूप से संपन्न होता जा रहा हैं। फिर भी मनुष्य वैचारिक दुर्बलता में फंसे जा रहे हैं। इसका कारण धर्म अस्पष्ट होता जा रहा हैं। ध्यान की क्रियाएं मनोरंजन से भरी होती जा रही हैं। आध्यात्म केवल दिखावे का साधन बनता जा रहा हैं। आज ज्ञान-विज्ञान के युग में, स्पष्टता के युग में भी मनुष्य बेबस होता जा रहा हैं।
इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं ?
सत्य क्यों प्रताडित हो रहा हैं ?
भारत वर्ष की वैचारिक धरोहर क्यो डगमगा रही हैं ?
वैयक्तिक स्वार्थ, ज्ञाति-जाति-धर्म-संप्रदाय आधारित संगठनात्मक स्वार्थ वैचारिक दूषण फैलाता हैं। इससे किसीको फ़ायदा होनेवाला नहीं हैं फिर भी चल रहा है। आज समृद्ध विश्व में समस्याएँ बढ़ रही हैं इसका कारण वैचारिक दुर्बलता हैं। खैर, मनुष्य के रूप में अच्छे बुरे वर्ताव का फर्क समझमें आना, अच्छाई को सीखना खुद के लिए जरुरी हैं।
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat.
INDIA
drbrijeshkumar.world
Dr.brij59@gmail.com
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Best keep it up
ReplyDeleteComment of AI Gemini...thanks
ReplyDeleteनमस्कार डाॅ ब्रिजेशकुमार,
विचारों की जटिलता और उनकी अनवरतता पर आपके विचार बेहद गहरे और विचारोत्तेजक हैं। आपने बिल्कुल सही कहा है कि "विचार एक जटिल प्रक्रियागत मनोव्यापार हैं" और "विचार उत्पन्न होते हैं उसे हम रोक नहीं सकते।"
विचारों की धारा और हमारा मन:
आपका यह अवलोकन कि विचारों को रोकने का प्रयास अक्सर विफल रहता है, आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन ध्यान पद्धतियों दोनों के निष्कर्षों से मेल खाता है। हमारा मन विचारों की एक बहती हुई नदी की तरह है। जब हम इसे बलपूर्वक रोकने का प्रयास करते हैं, तो यह और भी अधिक अशांत हो जाता है। "कुछ प्रयास करें तो भी हम विफल होंगे" - यह कथन इस वास्तविकता को दर्शाता है कि विचारों का दमन करना संभव नहीं है, और न ही यह स्वस्थ है।
विचारों को अनुभूत करने का सही मार्ग:
"आज विचार को अनुभूत करने के सही मार्ग पर सोचे...!" - यह आपके ब्लॉग का सबसे महत्वपूर्ण आह्वान है।
मेरे दृष्टिकोण से, विचारों को अनुभूत करने का सही मार्ग उन्हें साक्षी भाव (Watchfulness/Mindfulness) से देखना है।
दमन के बजाय प्रेक्षण: विचारों को 'गलत' या 'सही' के रूप में लेबल करने या उन्हें दूर भगाने के बजाय, हमें उन्हें सिर्फ एक पर्यवेक्षक के रूप में देखना चाहिए। जैसे हम सड़क पर चलती हुई कारों को देखते हैं, बिना उनके साथ उलझे।
पहचान न करना (Dis-identification): यह समझना महत्वपूर्ण है कि "मैं विचार नहीं हूँ, मैं विचारों का दृष्टा हूँ।" जब हम अपने विचारों के साथ बहुत अधिक जुड़ जाते हैं, तब वे हम पर हावी हो जाते हैं। दृष्टा भाव हमें विचारों के प्रभाव से मुक्त रहने में मदद करता है।
वर्तमान क्षण में उपस्थिति: जब हम विचारों के प्रवाह में बहने लगते हैं, तो हम अक्सर अतीत या भविष्य में खो जाते हैं। विचारों को अनुभूत करने का अर्थ है - वापस वर्तमान क्षण में लौटना, अपनी सांसों या शारीरिक संवेदनाओं पर ध्यान केंद्रित करना। यह हमें मानसिक शांति के करीब लाता है।
विचारों की प्रकृति को समझना: विचार अस्थायी हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं। जब हम उनकी इस क्षणभंगुर प्रकृति को अनुभव करते हैं, तो हम अनावश्यक चिंताओं और तनाव से मुक्त हो पाते हैं।
निष्कर्ष:
विचारों को रोकना लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि विचारों के प्रति जागरूक होना और उनके साथ एक नया, स्वस्थ संबंध बनाना लक्ष्य होना चाहिए। साक्षी भाव हमें विचारों के "अनुभूत" करने का वह सही मार्ग दिखाता है, जहाँ हम विचारों के दास नहीं, बल्कि स्वामी बनते हैं।
आपके द्वारा प्रस्तुत इस विषय पर गहराई से विचार करना निश्चित रूप से मानसिक शांति और आत्म-जागरूकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आपके ब्लॉग्स और विचारों के लिए