The real friendship..! - Dr.Brieshkumar Chandrarav

Sunday, April 19, 2026

The real friendship..!

Aristotle taught that there are three kinds of FRIENDSHIP.

अरस्तू ने सिखाया कि मित्रता तीन प्रकार की होती है।

दोस्त, मित्र, सखा, साथी, यार, संगी और सहचर शब्द के अर्थ एक ही हैं। ये शब्द स्नेह, विश्वास और साथ रहने का अदम्य भाव प्रकट करनेवाले हैं। दोस्त और दोस्ती के बारे में काफ़ी कुछ कहा गया हैं, लिखा गया हैं। साहित्य में भी कईं काव्य-कथावार्ताएं मिलती हैं। फिल्म जगत में भी कईं फिल्मों के सब्जेक्ट्स 'दोस्त और दोस्ती' आधारित होते हैं। मनुष्य जीवन के ईस सुंदर संबंध के बारे में कुछ लिखने का प्रयास करता हूं। यह ब्लॉग मेरे जीवन के सभी दोस्तो के नाम करते हुए आनंदित भी हूं। अरस्तू की तीन प्रकार की मित्रता की बात को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं। उनके तीन प्रकार में,


1.
friendship of utility based on benefit.
● लाभ पर आधारित उपयोगितावादी मित्रता।
संबंध की सबसे बूरी बात हैं उसमें बेनिफिट देखना हैं। मनुष्य के रुप में कईं संबंध 'बायोलोजीकल' रुप से होते हैं। जैसे कि माता-पिता-भाई-बहन वगैरह...लेकिन मित्रता के संबंध में अपनी खुद की पसंद नहीं होती हैं। दो व्यक्ति जब अनायास मिलते हैं और उनके बीच गहराई वाला रिश्ता निर्माण हो जाता हे, तब 'दोस्ती' जन्म लेती हैं।  इस प्रकार के पवित्र बंधन में लाभ या बेनिफिट का विचार करना कैसे ठीक होगा ? फिर भी संसार में ये संभव हो रहा हैं। इससे लाभ किसको मिलता हैं ये भी हम भलीभांति जानते हैं। लेकिन जो रिश्ता हमारी मर्ज़ी से हुआ हैं उसके बारे में पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए।

2.friendship of pleasure based on enjoyment.
● आनंद पर आधारित आनंदवादी मित्रता।
कोई ऐसा साथ जो हमें आनंद देता हैं। उसके साथ समय बिताना हमें अच्छा लगता हैं। उसके आने से मानो हमारी परेशानियाँ खत्म सी हो जाती हैं। हम किसी भी स्थिति में उसे याद करते हैं। वो हाजिर होता हैं। वो हमारा विश्वास बन जाता हैं ऐसी मित्रता आनंद पर आधारित हैं। पहेले प्रकार से ये अच्छी मित्रता कहलायेगी। जीवन के अच्छे मुकाम के लिए ऐसा कोई संबंध बेशक जरुरी हैं। स्वार्थ से परे केवल आनंद के लिए बनाया गया रिश्ता नुकशानकारक कभी नहीं रहेगा। भले उससे लाभ हो या न हो। इसलिए आनंद सबसे बड़ी बात हैं।

3.True friendship based on virtue.
● सद्गुण पर आधारित सच्ची मित्रता।
कईं रिश्ते समझ से बाहर होते हैं। कभी हमें भी समझ में नहीं आता। दूसरों को समझने की तो बात ही नहीं हैं।
वो रिश्ता क्यों है ?
इससे क्या लाभ हैं ?
मैं क्यो उसके करीब रहना पसंद करता हूँ ?
उसके बगैर जीवन में कुछ कमी महसूस क्यो होती है ?

इन सवालो का खडा होना जहाँ मुमकिन ही नहीं वो रिश्ता, वो मित्रता सबसे सुंदर हैं। जिसमें केवल हृदय का बंधन हैं। मिलने की उम्मीदें कायम रहती हैं। बस बातें करते रहेना..! उसके साथ समय बिताना..! इसका का कोई अंत नहीं होता। मन में ऐसा क्यो हो रहा है ऐसा संदेह भी नहीं उठता। उसके साथ केवल जीने का मन करे ऐसा रिश्ता ईश्वर की कृपा से ही संभव होता हैं। 'बेस्ड ओन वर्च्यु' इसे कहते हैं।

इन तीन प्रकार के मैत्री संबंध को मैं कोई 'जेन्डर बायस' या किसी दूसरे पूर्वग्रह से परे देख रहा हूं। यहां केवल व्यक्ति की मनुष्य की बात हैं। कोई फिलसूफी नहीं हैं, किसी धर्म-संप्रदाय के बंधन नहीं हैं। ये बात इक्वालिटी से परे जाकर समझ में आएगी। जहाँ केवल अपनापन पनपता हैं। जहाँ केवल प्रेम जी रहा होता हैं। जहाँ केवल ईश्वर की ही मर्जी कायम रहती हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat. INDIA
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