September 2026 - Dr.Brieshkumar Chandrarav

Sunday, September 27, 2026

રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠનો અવસર...!
September 27, 20260 Comments

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...!

'રજતમિલન'

એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં, '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' નગર નિવાસ આદરે છે. મને નગર જીવને ઉચ્ચ અભ્યાસની ગતિ આપી. સજ્જન શક્તિ સાથેનો પ્રેમાનુબંધ આપ્યો. સંઘ RSS જેવા રાષ્ટ્રકાર્યની સંગત આપી. અનેક સહૃદયી વડીલો અને મિત્રો આપ્યા. કેટલું બધું આપ્યું છે, આ મોડાસા નગરે...! એ ઉત્કૃષ્ટ નિમિત્તને આપના સાંનિધ્યમાં ઉજવવું છે. સાથે વાતો કરીશું અને ભોજન લઈશું.

દિનાંક : ૨૧ મે ૨૦૨૬, ગુરૂવાર સાંજે ૭: ૦૦ કલાકે.
સ્થાન : આનંદા અતુલ્યમ, નીરવા ક્લબ એન્ડ રિસોર્ટ, ડુઘરવાડા, મોડાસા.
સૂરસંગત : શ્રી.પ્રવિણભાઈ બારોટ (કે.એન.શાહ)

All sweet memories link.

https://drive.google.com/drive/folders/1bzKa_durp5dtXJsDFoZjhtyIbLptdtk0


















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કૃતજ્ઞતાભાવપુષ્પ....મારા પુસ્તકનો વિમોચન પ્રસંગ.
September 27, 20260 Comments

 કૃતજ્ઞતામિલન...!

મારા સૌ નિમિત્તોને વંદન...!
જન્મના નિમિત્તરૂપ માતા-પિતા પછી મારા જીવનમાં જે કંઈ ઘટિત થતું ગયું એમાં કારણભૂત કેટલાક ચરિત્રોનો ઋણસ્વીકાર કરવો છે..!
અરવલ્લી અને મોડાસાએ મને સતત દ્વિગુણિત કર્યો છે. મારી શિક્ષણ-સેવા અને રાષ્ટ્ર પ્રત્યેની દૃષ્ટિ અહીં ઘડતર પામી છે. અનેક સહૃદયી વડીલો અને મિત્રોનો 'પ્રેમાનુબંધ' મારા જીવનની અમૂલખ મૂડી સમાન બની ગયો છે.
મારા જીવનમાં બ્રહ્મસમાજના સહવાસને શબ્દબદ્ધ કરતું એક 'કૃતજ્ઞતાભાવપુષ્પ'
નામનું પુસ્તક આપની નિશ્રામાં પ્રકાશિત કરવું છે. એ ઉત્કૃષ્ટ નિમિત્તને આપના સાંનિધ્યમાં ઉજવવાનો ઉમળકો છે. આવો, સાથે થોડી વાતો કરીશું અને ભોજન લઈશું.


All sweet memories of my Program.

https://drive.google.com/drive/folders/1g00jC8Y4hbgk6JekoDrusHBLJT7g4Be1?usp=sharing
































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Gretitude is life..!
September 27, 20260 Comments

A thankul heart becomes a magnet for miracles....The secret.

शुक्रगुज़ार दिल चमत्कारों के लिए एक चुंबक बन जाता है।


जीवन चमत्कारों से भरा हैं। लेकिन उसे हम आकर्षित नहीं कर पाते। कुछ ऐेसे शब्द हैं, कुछ ऐेसे वर्तन हैं, कुछ मन की अवस्थाएं हैं जो मूलभूत रुप से जीवन में चमत्कार घटित कर सकते हैं। "शुक्रगुज़ार दिल चमत्कारों के लिए एक चुंबक बन जाता है।" 'द सिक्रेट' बुक का यह प्रसिद्ध वाक्य हैं। उसे शांत मन से पढ़े। फिर शुक्रगुज़ार दिल बनाने का प्रयास करे। चलो, मैं आज इस ब्लॉग के जरिए मेरी कृतज्ञताए व्यक्त करता हूं। पहले तो आप मुझे पढ़ रहे हैं, उसके लिए आप सबका शुक्रिया अदा करता हूं। मैं जैसा भी लिख रहा हूँ आपकी एक नज़र यहाँ पड़ती हैं। उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। दूसरी बात यह भी मुझे बखूबी याद आती हैं। कईं लोग मुझे जानते होंगे लेकिन कईं अनजान दोस्त मुझे पहचानते भी नहीं होंगे। फिर भी मेरा लिखा हुआ पढ़ लेते होंगे। वो अदृश्य संबंध बनाने वाले लोगों का भी तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।


सुबह होती हैं, कोई न कोई पहली आवाज हमारे कानों में पडती हैं। हम जाग जाते हैं। कोई विचार भी हमें निंद से जगा देते हैं। और हमारी आँखें खुलती हैं। उस आवाज और विचार का शुक्रिया..! फिर सूरज की किरणों का स्पर्श होता हैं। ठंडी हवाएं हमें स्पर्श करती हैं साथ ही रंगबिरंगी पंछीओं की चहचहाहट...! हम रोमांचित हो उठते हैं। हर सुबह की उस हरेक पहलू का शुक्रिया हैं। फिर कईं प्रसाधन से हमारा कार्य शुरु होता हैं। धरती के अमृत समान पानी का स्पर्श और फिर खाने पीने की चीजें हमारे सामने आती हैं। कोई हमारे लिए नास्ता और चाय का कप लेकर खड़ा होता हैं। ऐसी कईं प्रवृत्तियां से हम स्वस्थता बनाए रखते हैं। ऐसे ही हम अपने दिन की खूबसूरत शुरुआत करते हैं। न्यूज पेपर के तरोताजा शब्दों के साथ थोड़ा-बहुत तालमेल करके नित्य के काम के लिए तैयार हो जाते हैं। यहाँ तक जो कुछ वस्तुएं हमारे सामाने आई है, उसको तैयार करने वाले हरकोई अनजान लोगो का शुक्रिया व्यक्त करता हूं।

अब शुरु होती है दिनभर की भागदौड़..! घर से निकलना और काम के स्थान पर पहुंचना। हमारे हिस्से का काम देखना। ईस पूरी कार्यशीलता में जाने-अनजाने कईं लोगो के साथ मिलना-मिलाव होता हैं। हमे कुछ लोग अच्छे लगते हैं, किसीसे मनमुटाव रहता हैं। लेकिन हमारा काम करनेवाले और न करनेवाले लोगो का भी स्वीकार करना हैं। पसंद न आनेवाले लोग भी कोई कारणवश हमारे जीवन में आते हैं। उन सबका दिल से शुक्रिया..! इस विषय पर लिखते लिखते मुझे जैन संप्रदाय की 'संवत्सरी' याद आ गई। 'मिच्छामि दुकडम' कहते हुए वो संवेदनशील लोग जाने-अनजाने में हुई गलतीओं के लिए माफी मांगते हैं। पूरे संसार में यह बात असामान्य हैं। साल का एक दिन हम ऐेसे मनाए तो बहुत अच्छी बात हैं। वैसे तो इस कृतज्ञता और दिलगीरी के भावो को भीतर में स्थापित करना हैं। पूरा जीवन शुक्रगुज़ार बना रहे ये भी दमदार जीवन के लिए आवश्यक हैं।

फिर शाम होती है, नितांत शांति से भरा माहोल बनता जाता हैं। पंछीओं की तरह हम सब अपने नीड की ओर चले जाते हैं। रात का खाना पूरे मन से आनंद पूर्वक होता हैं। सुबह और शाम के खाने में आई हरेक चीज को भी मैं याद करता हूं। इसे बनाने-पकानेवाले हाथो को भी वंदन करता हूं। अपनी भूख को शांत करनेवाली हर दृश्य-अदृश्य वस्तुएं हमारा जीवन हैं। वो हमारे शरीर को चलाते हैं, उससे हमें उर्जा मिलती हैं। शरीर की अद्भुत संरचना धड़कन को थामे रखती हैं। सांसो को बरकरार रखती हैं। हमारे शरीर का विकास और स्वास्थ्य बना रहता हैं। इनमें बसे हर निमित्त को प्रणाम हैं। भूलकर भी उससे असूया नहीं होनी चाहिए।

रात के अंधेरे में हम शांत होकर अगली सुबह के सपनों को सच करने का प्रयास करने के लिए सो जाते हैं। पूरे दिन की थकान गायब हो जाती हैं। सबकुछ भूलकर हम निंद्राधीन हो जाते हैं। फिर एक ओर सुबह होती हैं। ईस तरह हमारे जीवन का एक-एक दिन बढ़ता हैं। अच्छे बुरे कईं अनुभवो से गुजरना होता हैं। हम कुछ भूलते हैं कुछ याद रखते हुए बढ़ते रहते हैं। कभी-कभार सफलता एवं प्राप्ति का आनंद मिलता हैं। तो कहीं पर विफलता का सामना भी करना पड़ता हैं। मगर इन सभी घटनाओं का कुछ तो मतलब होगा। यह मान्यता हमारे मन में दृढ़ होनी चाहिए। अच्छे और बुरे सभी अनुभवों से हम शुक्रगुज़ार बने रहे..! शायद हमारे जीवन की कृतज्ञता राह को काफी-कुछ मज़बूती मिल सके !?!

अब सबसे बेहतर बात...! जन्म के साथ शुरु हुई पहेली सांस से लेकर अंतिम सांस तक हमारा जीवन एक नाम लेकर चलता हैं। कईं जीवन को सुंदर गति मिलती हैं। दुनिया उनसे प्रभावित होती हैं। ऐेसे कईं चरित्र विश्व में निर्मित होते रहते हैं। जो जीवन को बडी नाजुकता से जीने का प्रयास करते हैं। ऐसे अद्भुत मानव का जन्म और संवर्धन कोई अदृश्य कृपा के कारण होता हैं। विराट-विशाल ब्रह्मांड में सभी जीवो के जीवन का संतुलन बना रहता हैं। यह संतुलन बनाए रखने वाली शक्ति का तो निरंतर शुक्रगुज़ार बने रहना हैं। प्रकृति के हरेक पहलूओं की कृतज्ञता व्यक्त करते रहेना हैं। जीवन में कुछ अच्छी घटनाएं घटित हो जीसे 'द सिक्रेट' बुक 'चमत्कार' कहती हैं।

हमारे जीवन को संवारने वाली हरेक घटना और इनमें शामिल हरेक व्यक्ति के शुक्रगुज़ार बने रहेना हैं। परम शक्तिसंपन्न ईश्वर मनुष्य जीवन की बेहतरीन गति के लिए मदद करते हैं। प्रभु की अदृश्य भूमिका या परमेष्ठी की योजना निमित्त ढूंढ लेगी। ऐसे चमत्कार को जान लिया तो जीवन कृतज्ञता से संवृत हो जाएगा। हमारे जीवन में कृतज्ञता-ग्रेटिट्यूड को स्थापित करने का प्रयास दिल से करने हैं।

आपका Thoughtbird 🐣
 Dr.Brijeshkumar Chandrarav
Modasa, Aravalli.
Gujarat, INDIA
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Mobail number: + 91 9428312234 
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Wednesday, September 9, 2026

DALAI LAMA says that...!
September 09, 2026 2 Comments

The real destroyer of our inner peace is anger.

हमारी अंदर की शांति को खत्म करने वाली असली चीज़ गुस्सा है।

एकबार समारोह में एक बच्चे ने दलाई लामा से सवाल किया। बौद्ध धर्म के पवित्र पुरुष दलाई लामा ने जो उत्तर दिया वो अक्षरश: यहाँ लिख रहा हूँ। एकबार इसे पढ़ने से दिल को सूकुन मिलेगा। अपने जीवन को परिवर्तन के राह पर चलाना आसान हो जाएगा। चलो पढ़ते हैं, लाजवाब शब्द..!


Sir, my question is how we develop inner peace ?
I think, frankly speaking, use our intelligence.Think. The real destroyer of our inner peace is anger. Anger very much related with irritation. These very much related with extreme self- Centered attitude. me, me, me that. so the method in order to reduce self-centered attitude, think of other. self, Yourself, Your entire existence depend on the rest of Your community. so you have to develop respect, of each Community respect. That reduce self-centered attitude. that reduce fear, distrust. that reduce anger. Actually compassionate mind is realistic sort of mind. Anger is unrealistic mind. so use our intelligence, pros and cons. then you get more conviction about compassion. it's really useful, including your own health. and Your longevity.
● Dalai lama.

सच कहूँ तो, हमें अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए। सोचना चाहिए। हमारी अंदर की शांति को खत्म करने वाली असली चीज़ गुस्सा है। गुस्सा चिड़चिड़ेपन से बहुत जुड़ा होता है। और ये सब बहुत हद तक बहुत ज़्यादा खुद के बारे में सोचने वाले रवैये से जुड़े होते हैं - 'मैं, मैं, बस मैं'। इसलिए खुद के बारे में सोचने वाले रवैये को कम करने का तरीका है, दूसरों के बारे में सोचना। आपका अपना अस्तित्व आपके समुदाय के बाकी लोगों पर निर्भर करता है। इसलिए आपको हर समुदाय के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी चाहिए। इससे खुद के बारे में सोचने वाला रवैया कम होता है। इससे डर और अविश्वास कम होता है। इससे गुस्सा कम होता है। असल में, दयालु या करुणामय मन एक यथार्थवादी (हकीक़त को समझने वाला) मन होता है। गुस्सा अवास्तविक मन की उपज है। इसलिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, फायदे और नुकसान पर सोचें। तब आपको दयालुता के बारे में ओर ज़्यादा यकीन होगा। यह वाकई में फायदेमंद है, आपकी अपनी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी। ● दलाई लामा

गुस्सा-चिड़चिड़ेपन से जुड़ा हैं। हर व्यक्ति के स्वभाव में जन्म से ही अच्छे-बुरे गुण स्थापित ही होते हैं। उसमें से कौन-से गुण को बढ़ाना है ? या कौन से अवगुण को बढ़ाना है, यह अपने आप पर आधारित हैं। मन में ठान ही लिया है कि हमें ठीक ढंग से जीना ही नहीं है तो बात कुछ और हैं। तब शुरु होती है मन के भीतर एक लड़ाई, अपने आप से लड़ाई...! जब पराभूत अवस्था का सामना करना पड़ता है तब गन खिन्नता से भर जाता हैं। वास्तव से दूर सब जगह जीतने की आह मन को दूषित करती रहती हैं। फिर स्वभाव में चिड़चिड़ापन छा जाता हैं। क्रोध का जन्म इसतरह होता हैं। और वही क्रोध मनुष्य के भीतर और बाहर को तोड़कर रख देता हैं। मनुष्य की सारी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।

इससे बचने के उपाय में दलाई लामा करते हैं : "आपको हर समुदाय के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी चाहिए। इससे खुद के बारे में सोचने वाला 'स्व-केन्द्री' रवैया कम होता जाता है। इससे डर और अविश्वास कम होते है। इससे गुस्सा-क्रोध कम होता है।" सच में मनुष्य को अपने भीतर को करूणार्द्र से भरा हुआ बनाए रखना है तो अपने आप को संतुलित रखना होगा। हमारे आसपास सौहार्द को महसूस करना हैं। और सभी लोगो का स्वीकार करना होगा। जब किसी से असूया होगी तो समझो भीतर हलचल मचना तय हैं। मनुष्य के रूप में यह समझना होगा। हमें व्यक्ति-व्यक्ति में असमानता दिखी तो समझो हमारी वैयक्तिक समर्थता भी विफल होगी। हमारे पूर्वज जो परमात्मा का रूप धारण किए हुए हैं। शायद उनको भी यह पसंद नहीं होगा। क्रोध से लडना नहीं, अपनी वृत्तियों से लड़ना हैं। इस विषय को आप अपनी तरह समझने का प्रयास करें। शायद इसके अतिरिक्त कुछ नया अनुभव में आयेगा...!
'आनन्दविश्व सहेलगाह' की विचारयात्रा में बस इतना ही।

आपका Thoughtbird 🐣
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Believe in yourself...!

"BELIEVE IN yourself when life seems impossible to move forward. Your strength is greater than you know." "जब ज़िंदगी में आग...

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