August 2026 - Dr.Brieshkumar Chandrarav

Thursday, August 20, 2026

बोध इति सर्वैः सह आत्मीयता...!?
August 20, 20260 Comments

Enlightenment is intimacy with all things.

ज्ञानोदय का अर्थ है सभी चीजों के साथ घनिष्ठता।

आज कुछ अलग विषय पर 'ब्लोग' प्रस्तुत करता हूं। विचार के साथ घनिष्ठता बनाने का प्रयास करना हैं। मैं इस प्रयास में खरा उतरता हूं या नहीं इसकी परवा किए बिना बस लिख रहा हूं। आपको इनमें कुछ अलग दिखे तो पढिए; अन्यथा समय बर्बाद न करे।


जन्म से मानव शरीर के साथ हमे पंच ज्ञानेन्द्रियां मिली हैं। उससे हम दुनिया को महसूस करते हैं। हमारे जीवन की अनुभवशीलता इसी से बढ़ती हैं। हम देखते हैं, सुनते हैं; महसूस करते हैं, अनुभव करते हैं। हम कुछ पढ़ते हैं फिर उसको अमल में लाने का प्रयास करते हैं, जीवन की क्रियाओं से जोड़ते हैं। इस जुड़ाव के बाद जो क्रिया बार-बार होती हैं, वो अनुभव की गहराई को छू लेती हैं। इस प्रक्रिया से जो मिलता है वो ज्ञान हैं। हमारे जीवन में अक्सर ये होता रहता हैं, बार-बार होता रहता हैं उसे जीवन की 'ज्ञानोदय' अवस्था कहेंगे।

'बोध इति सर्वैः सह आत्मीयता' संस्कृत उक्ति को समझने का प्रयास करते हैं। यहां 'आत्मीयता' शब्द पर जोर दिया गया हैं। 'आत्मीयता' के कारण मनुष्य जीवन में प्राप्ति की गति में बढ़ोतरी आती हैं। आत्मीयता का एक अर्थ 'घनिष्ठता' भी हैं। जिसे हम 'अंतरंग झुडाव' जैसे शब्द से भी समझ सकते हैं। किसी वस्तु-व्यक्ति से जुड़ाव होना। किसी स्थिति-परिस्थिति से जुड़ाव होना। किसी स्थान-सीमा से जुड़ाव होना। प्राणी-पशु एवं पंछीओं से जुड़ाव होना। कहोना प्रकृति से जुड़े रहने का मन होता हैं। जितना गहराई से जुड़ाव होगा उतनी हमारी 'ज्ञानसंपदा' बढ़ेगी। सभी चीज़ो के प्रति घनिष्ठता मनुष्य के रुप में हमें एक अलग पहचान दे सकती हैं। हम सब जानते है कि जो व्यक्ति प्रकृति कल्याण, मानव कल्याण एवं प्राणी-पशु-पंछीओं के लिए कुछ काम करते हैं। उनके संवर्धन और विकास के लिए कार्य करते हैं; वो व्यक्ति शानदार तरीके से प्रकाश में आये हैं। कईं प्रकार के सम्मानो से उनका अभिवादन होता रहा हैं। यह समाज का स्वच्छ दर्पण हैं। उन व्यक्ति की प्रतिभावान छवि से समाज स्वस्थ भी दिखता हैं।

Enlightenment का अर्थ 'ज्ञानोदय' एवं 'प्रबुद्धता' होता हैं। उसके लिए intimacy यानि घनिष्ठता, आत्मीयता का भाव एकदम जरुरी है। इन्सान के रूप में स्वार्थवश किया गया व्यवहार वैयक्तिक दुर्बलता को ही प्रेरित करेगा। हो सकता है व्यक्ति की पहचान कोई अन्य कारणों से बढ़ जाए। लेकिन आखिर में वो लडखडा जाएगी। उसकी असर चाबी वाले खिलौने की तरह होगी। 'ज्ञानसंपदा' बहुत ही शुभ बात हैं। उसके लिए आत्मीय होना आवश्यक हैं। मैंने व्यक्तिगत रूप से कईं लोगों को देखा है। उनके पद के अनुसार प्रतिभा नहीं होती। फिर भी किसीकी वैयक्तिक मनसा से ये 'प्रतिभाव्यापार' होता रहा हैं। हमारे मानव समाज में प्रतिभा की कभी नहीं हैं; प्रतिभा को पहचानने वालों की कमी हैं। जिसे ज्ञान के साथ जीना ही नहीं हैं वो समाज को दूषित करता हैं। जिसे मैं 'व्यवहारविष' शब्द देता हूँ। उससे शायद बेचनेवाले और खरीदनेवाले खुश होंगे। मानव समुदाय का कतई भला नहीं होगा।

फिर मैं 'आत्मीयता' और 'घनिष्ठता' की याद दिलाता हूं। हम केवल मानव संबंध की बात करें तो उसमें भी इनकी ही बोलबाला हैं। आज 'प्रेम' शब्द और भाव में भी कमी दिख रही हैं। उसका कारण घनिष्टता का अभाव ही माना जाएगा। इस सत्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा। मनुष्य जीवन की उत्कृष्ट गति का आधार प्रेम ही हैं। संसार में प्रेम के कारण ही मानव संबंधो में लचीलापन बना रहेगा। कैसी सुंदर बात हैं...! मुझे आत्मीय बनना है; मेरे जीवन में 'ज्ञानदीप' को प्रज्वलित करना हैंसंसार के उत्तम कार्यो में नैमित्तिक भूमिका अदा करनी हैं। शायद ईश्वर की मर्ज़ी इसमें होगी क्या !?

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बोध इति सर्वैः सह आत्मीयता...!?

Enlightenment is intimacy with all things. ज्ञानोदय का अर्थ है सभी चीजों के साथ घनिष्ठता। आज कुछ अलग विषय पर ' ब्लोग' प्रस्तुत कर...

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