जीवन में जुड़ाव की आवश्यकता है..!
अंग्रेजी शब्द बॉन्डिग का अर्थ बड़ा ही गहराई भरा हैं। बुद्धि और संवेदना के धनी के रुप में इससे हम जुड़ें हैं। अर्थ देखते हैं; 'भावनात्मक जुड़ाव या रिश्ता' Emotional Connection और Relationship.
लेकिन आज मैं बॉन्डिग या जुड़ाव की बात करनेवाला नहीं हूँ। लेकिन उस शब्द से जुड़े एक ओर शब्द की बात करता हूं। 'ट्रॉमा बॉन्डिंग' थोड़ा विपरीत अर्थवाला शब्द हैं। लेकिन इसकी बात करना जरुरी नहीं हैं; इसे समझना जरुरी हैं। इस शब्द की फूल डेफिनिशन इस तरह हैं।
A 'trauma bond' is a strong emotional attachment that develops between an abuse victim and the person who is hurting them.
'ट्रॉमाबॉन्ड' एक गहरा और भावनात्मक जुड़ाव है; जो दुर्व्यवहार के शिकार व्यक्ति और उसे नुकसान पहुँचाने वाले व्यक्ति के बीच विकसित हो जाता है।' दो बार पढ़नी पड़े ऐसी कुछ बात इस में छीपी हैं। जीवन सहज-सरल तरीके से जीना हैं। ईश्वर सामंजस्य चाहते हैं; संवेदनात्मक जीवन प्रणाली के लिए हमें इस संसार के मंच पर उतारा हैं। लेकिन कईं फांटाबाज यानी की अपने स्वार्थ के लिए अपनाए जाने वाले फंडे। उसका चलन बढ़ने लगा हैं। कौन-क्यों ये हथकंडे आजमा रहा है वो सबको समझ में आए के थोड़ा संभव नहीं हैं। शिक्षा इसके लिए आवश्यक हैं। वैसे तो सीखना ही शिक्षा हैं। जन्म से सीखने-समझने की प्रक्रिया शुरु हो जाती हैं। इस प्रक्रिया के कारण हमें समावेशी बनना है; संवेदनशील बनना हैं। मगर कुछ वर्गीय बदबो के कारण सृष्टि में विचित्रता फैल जाती हैं। हम सब जानते हैं; सबको अच्छा पसंद हैं। सहाय और सेवा की मिसाल सबको पसंद हैं।
आज हम देखते हैं; विश्व विख्यात 'नोबेल पुरस्कार' और 'मेग्सेसे पुरस्कार' जैसे सन्मान किसे दिये जाते हैं !? जिसने विश्व के कल्याण में अपना योगदान दिया हो। विश्वशांति और पर्यावरण के लिए विशिष्ट काम हुए हो। इसका मतलब यह हुआ की मनुष्य मात्र को अच्छाई पसंद हैं। लेकिन संसार को २ या ३ प्रतिशत लोग नुकसान पहुंचाते हैं। उनको सत्ता चाहिए होती हैं। किसी की सत्ता का स्वीकार भी ठीक हैं; लेकिन उस सत्ता के पीछे के मनसूबो पर विचार करना चाहिए। शायद हो सकता है; एक व्यक्ति के विचार में कल्याण और विकसित होने की बात हो। मगर ऐसा कम होता हैं; स्वार्थ और लालच के कारण सत्ता दूषित होती हैं। और इससे मानव समुदाय का हमारे बौद्धिक और सांवेगिक समाज का नुकसान होता हैं।
मैंने एक कहानी सुनी थी। एक राजा ने अपने दरबार में एक मुर्गे को उल्टा लटकाया। और मुर्गे के पंख को नोंच ने लगा। अपने पंख की खिचाई से मुर्गा चीख रहा था। सब दरबारी यह दृश्य देख रहे थे; परेशान भी हो रहे थे। लेकिन राजा के सामने कौन बोले ? आधे पंख तोड़ने के बाद राजा ने मुर्गे को फर्श पर छोडा। मुर्गा थोड़ा शांत हुआ। लोगों को लग रहा था की मुर्गा अब भाग जायेगा; लेकिन ऐसा हुआ नहीं। राजाने थोड़े अनाज के दाने मुर्गे के मुह के पास डाले। मुर्गे को लगा अब यह आदमी मुझे मारेगा नहीं। उसको थोड़ा भरोसा बैठा। और मुर्गा दाने खाने लगा। मानो वो थोड़ा स्वस्थ हो रहा था। राजा आगे-आगे चलने लगा। और दाने डालने लगा, मुर्गा राजा के पीछे-पीछे जाने लगा। अब उसे खुराक मिल रहा था। इकट्ठे हुए सब लोग यह देखकर हैरान थे। तब राजाने बताया, "इस तरह राज किया जाता हैं..!" कहानी खत्म हुई।
इसको ही 'ट्रॉमाबॉन्ड' कहते हैं। पहेले शरीर को नोच लो, लोगो को परेशानी और ज़िल्लत में डालो, फिर उनके मसीहा बन जाओ। उनकी सोच ही बदल डालो। ध्यान रहे उनको अपनी पीड़ा याद न रहे। और जो मिल रहा है; उसका आनंद वो लेने लगे। दुर्व्यवहार को भुला देना और अपनी अच्छाई को स्थापित करने की यह विचित्र और मानव सभ्यता को खत्म करने वाला कौशल हैं। इसे कौशल कहना भी ठीक नहीं लगता हैं। मगर शब्दों की अपनी सीमा होती हैं। इसे 'ट्रॉमाबॉन्डिग' कहते हैं। इसका प्रयोग केवल राजा या सत्ताधीश करता हैं ऐसा भी नहीं हैं। जिनको दूसरों को परेशान करने में आनंद मिलता है, वैसे मानसिक रोगियों का भी यही रास्ता हैं। बड़े-बड़े उदेश्य रखकर समाज के लोगों को फंसाया जाता हैं।
विचार बड़ी ही सुंदर चीज हैं ; साथ ही ख़तरनाक भी हैं। विचार को माध्यम बनाकर अपनी सोच को प्रस्थापित करना भी इसी दिशा का काम हैं। हर मनुष्य को समज में आए ऐसी यह बात हैं। लेकिन उसका स्वीकार करना दूसरी बात हैं। शायद यह फिलासफी को समझ गये हैं; तो एक निर्धार बनता हैं की मुझे किसीको नोचना नहीं और कोई मुझे नोच ले वो बर्दाश्त भी नहीं करना हैं। शायद ईश्वर अपनी श्रेष्ठतम कलाकृति के उपर ऐसी श्रद्धा बनाए बैठे होंगे...!
आपका Thoughtbird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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