Dr.Brieshkumar Chandrarav

Tuesday, January 16, 2024

What a love..! ❤️
January 16, 20240 Comments

Love is an endless mystery..!

for it has nothing else to explain it....Rabindranath Tagore.

प्रेम एक अनंत रहस्य हैं, उसे समझाने के लिए और कुछ नहीं !!


एक सदी के महानायक रवीन्द्रनाथ टैगोर। कला- साहित्य-शिक्षा के क्रांति पुरुष रवीन्द्रनाथ हैं। "शांतिनिकेतन उनकी प्रयोग भूमि हैं। जहाँ शिक्षा के बारें में कई प्रयोग हुए और उस समय के भारत को प्रबुद्ध बनाने का स्तुत्य प्रयास भी हुआ। ऐसी महान शख्सीयत को मन हो या न हो आदर देना ही पड़ेगा। अंग्रेज गवर्नमेंट को भी उन्हें 'सर' के खिताब से नवाजना पड़ा था। भारत के लिए प्रथम नोॅबल पारितोषिक के दमदार हकदार! पहेले गैर युरोपीय व्यक्ति !  "गीतांजलि" के काव्यों की चमक-दमक ही ऐसी थी। रहस्य और समर्पण की भाषा से  प्रकृति का आराधन हैं गीतांजलि..!
थोडी-सी पंक्तियाँ...

( विपोदे मोरे रक्षा क'रो, ए न'हे मोर प्रार्थना...बंगाली भाषा)
मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं हैं;
मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही हैं।
दुःख-ताप में व्यथित चित्त को
यदि आश्वासन दे न सको तो,
विजय प्रयास कर सकूँ दु:ख में मेरी चाह यही हैं।
मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए,
यदि दुनिया में क्षति ही क्षति हो,
(और) वंचना आए आगे,
मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही हैं।


ये कहने की ताकत कोई सामान्य व्यक्ति में नहीं होती। ईश्वर के साथ प्रकृति के साथ का एकत्व संबंध इन शब्दों को प्रेरित कर सके। कविता का कोई विवरण नहीं करता क्योंकी आपको सहज ही समज में आ जाएगा। एक बार नहीं दो बार पढ़िए...भीतर ताजगी से भर जाएगा।

रविन्द्रनाथ मात्र कवि नहीं थे। एक शुद्ध ह्रदय के धनी थे। प्रकृति की संवेदना को समझने वाले अनुभावक थे। ईश्वर की प्रेम दुनिया में डूबकी लगाए अपना जीवन प्रफुल्लितता से जीने वाले "जीवनराम" थे। ओर इसी कारण रवीन्द्रनाथ जी जो कहते हैं, वो दमवाला लगता हैं। उनकी बातें हमें सैद्धांतिक लगती हैं। ईश्वर और प्रकृति की लीलामय कल्पना जब एक मुकाम पर पहुंच जाए...तब जो कुछ बातें कहीं जायेगी वो सिद्धांत या सिद्धांत से करीबी हो सकती हैं।

प्रेम एक अनंत रहस्य हैं, उसके बारें में कुछ कहने के लिए सचमुच कोई समर्थ नहीं हैं। प्रेम अनुभूति हैं, प्रेम अद्वैत हैं। प्रेम जीवन के अमूलख श्वास की तरह है। प्रेम आनन्द है, प्रेम करीबी की मर्यादा हैं। प्रेम आसमान को छू लेने वाला उत्तुंग शिखर हैं। दोस्तों, ये सब प्रेम शब्दावलियां कैसी लगी !? मुझे पता हैं...बहुत ही सुंदर..! हमारे भीतर में छीपे हुए प्रेम को स्पर्श करने वाली लाजवाब बातें...! मगर ये रहस्य प्रेम करने वालों का अपना होता हैं। उसमें कोई बनावट नहीं होती। थोडे से शब्द ठीक हैं, लेकिन प्रेम सबका अपना होता हैं। उसकी अनुभूति अपनी, उसकी भाषा भी अपनी खुद की होती हैं। मैं भला प्रेम कैसे लिख सकता हूँ।

प्रेम के रहस्य को अपने भीतर पालते हुए..!
जीवन की खुबसूरती अपने-अपने रंग से ढंग से,
अनुभूत करें।
शुभकामनाएँ for प्राकृतिक संबंध के गहराई की Understanding.

आपका ThoughtBird. 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav.
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Thursday, January 11, 2024

LITTLE STEP 🚶‍♀️🚶‍♂️
January 11, 2024 4 Comments

 ONE DAY...we will find the right direction.

जिंदगी की डगर पे बस चलते रहना हैं !
न रुकना हैं न थमना हैं !


आनंदविश्व सहेलगाह आज अपनी वैचारिक सफर के १०० ब्लोग पूर्ण कर रही हैं। कुछ सोचें बीना एक काम शुरु हो गया। थोड़े शब्द थोड़े विचार से एक गति कायम हुई। दोस्तों की होनहार नजरें उस पर पडने लगी। विचार अच्छा लगा तो दूसरों से बांटा भी गया। इसके जरिए ही लाखों नजरें मेरे ब्लोग पर पडी। जाने-अनजाने सभी का दिल से धन्यवाद !!


वंदनीय अटलबिहारी बाजपेई जी की ये मशहूर कविता आज के दिन पेश करता हूं। सबमें दम हैं.. दम सबमें हैं।  इश्वर की दम बांटने की करामात में कभी गलती नहीं होती। शायद हम सोच को अपनी बना बैठे हैं। सोच में सब और सबका कल्याण ही होता हैं। उस दमदार के कदमों की आहट सुनाई पडती हैं...तब जाकर दुनिया उस कदमों का हिसाब रखती हैं।
चलों पढ़ें...दमदार अटलजी को,
बाधाएं आती है, आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ
निज हाथों में हँसते-हँसते..!
आग लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा।

इतनी दमदार बात सुनकर-पढकर अब मुझे पढनें की आवश्यकता होगी क्या ? मुझे पता है नहीं होगी मगर में अपने कदम चल रहा हूँ...ठीक लगे तो पढें। हजारों सालों से सत्वशीलता कोई एकल निमित्त के जरिए अपना बहाव कायम करती हैं। River finds a way...जैसे नदी अपना रास्ता खूद ही बना लेती हैं। रोक सकें तो रोक लो। जब ईश्वर की मर्ज़ी होगी तब नदी रुकेगी या सूखेगी !! बाकी नदी के बहाव का कभी मजाक नहीं हुआ। उसके बनाएं मैदानों में कई सभ्यताएं पली हैं, बढीं हैं। उनके बहाव से ही  धरती भी पली हैं। समग्र जीवसृष्टी का अंदरूनी चालक बल नदी मैया ही हैं। क्योंकि माता चलती रही हैं। रुकना उनका काम नहीं।

"आनंदविश्व सहेलगाह" का ThoughtBird थोड़ी-सी संवेदना बाँटता चला जा रहा हैं। कुछ अच्छाईयों को महसूस करके उसका वैचारिक बंटवारा करता जा रहा हैं। एक बात स्वीकार करता हूं..."मुझे सोचने-लिखने में बड़ा आनंद मिलता हैं !" बस कुछ छोटी-सी उम्मीदें पाल रखी हैं, रुकना नहीं हैं। कुछ करते ही रहना हैं। मान न मिले सम्मान न मिले,न मिले ईनाम अकराम..लेकिन मेरा आनंद बरकरार रहें। इसी उम्मीद में चलते जाना हैं। कोई हाथ पकडकर चलना चाहें..! कोई साथ एक दिशा में चलें ! कोई साथ कोई ऐसी डगर पे ले जाए...जहां पर सबका जहाँ हो। वहां सुकुन की अद्भुत दुनिया हो !

जहां एक बात सबको सही लगे ! कौन-सी बात पता हैं...प्रेम और अनुराग की...समता और स्वीकार की !
चलते रहेंग़े तो एक दिन दिशा भी दमदार होगी।

🐣  आपका ThoughtBird  🐣
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Thursday, January 4, 2024

THE YEAR.
January 04, 20240 Comments

 New year...run towards new dreams and new Destination.

नयेपन का माहोल और उत्साह को प्रेरित करता सर्दी का मौसम!

"आनंदविश्व सहेलगाह" की पाठक शक्ति को वंदन एवं शुभ कामनाएँ। दो हजार चौबीस के प्रथम ब्लोग से आपके साथ विचारसाक्ष्य से उपस्थित हूं। फिर याद दिलाते हुए की मैं एक छोटा-सा निमित्त कर्म बजा रहा हूं।

The year

परोक्ष उपस्थिति भी संवेदन को बढावा दे सकती हैं। जब आप रवैए से संवेगात्मक हैं। वैसे तो सभी जीव संवेग से झुडे हैं। हम और आप भी..! ईश्वर ने सबको अपना-अपना सांवेगिक मनोजगत दिया हैं। खान-पान-रहन-सहन के साथ सबका अपना एक मनोजगत होता हैं। उनके आनंद क्षेत्र भी अलग-अलग होते हैं। इसलिए हरेक के आनंदमन में अपने-अपने सपनें आकारीत होते हैं। संवेदना की तर्ज पर सब का बसेरा हैं। संसार में सबका गंतव्य स्थान भी अलग हैं। उस स्थान तक पहुंचने की सबकी उडान भी अपनी खुद की होती हैं।

युगों से ब्रह्मांड का अस्तित्व कुछ सिद्धांत पर ही टीका हुआ हैं। ईश्वर की अदृश्य नियंत्रितता के बंधन में सब हैं। सभी जीवों का नया साल हैं। समय का बदलाव सबके लिए होता हैं। तरुवर से लेकर नदी-पर्वत तक और पंछी से लेकर प्राणी। किटकों की अद्भुत दुनिया में भी ऋतु का परिवर्तन दिखाई पड़ेगा। एक नन्हीं चींटी भी सर्दी के मौसम में अपने कल का खुराक संग्रह करने में लग जाती हैं। सर्दी के बाद आने वाली धूप का अंदाज लगाकर कहीं पंछी अपने घोंसले भी बनाते हैं। ये सर्दी की मौसम भी बडी लाजवाब हैं। सर्दी में थकान कम उत्साह ज्यादा महसूस होता हैं। नये बरस के प्रारंभ में हमें अपने जीवन को उत्साह-उमंग से भर देना हैं। इनके बारें में जो ज्ञान मिलेगा सब व्यर्थ हैं। क्योंकी दिशा अपनी पसंद की... रास्ते अपनी पसंद के, कोई साथ हैं तो ठीक...मगर चलना तो अपने खुद के दम पर ही हैं।

ईश्वर के जगत में सभी लोग सपने पालते हैं। उस दिशा में सबके प्रयास भी होते हैं। प्रयास सक्षम और दमदार भी, लेकिन कहीं कुछ छोटी-सी बात डेस्टीनेशन तक पहुंचने की गति को कम करती हैं। एक बात हमेशा याद रखना वार और प्रयास कभी खाली नहीं जाते !! जब आपको लगता हैं थोडा समय ज्यादा बह रहा हैं तो चिंता मत करना..."अनसुलझे कोयडों के सुलझने का कर्म आपसे होगा।  प्रकृति का ये भी सिद्धांत हैं, प्रयास कभी विफल नहीं होते और प्रयास जब बढ जाए तो अचंभित आकारित होना तय हैं। इतिहास के पन्नों में से प्रयास की विफलता ढूँढ निकालिए ! आप मुझसे सहमत मत होना। मेरे साथ की सहमती का कोई मूल्य नहीं हैं। हां ये सही है कि...शायद इससे मुझे वैयक्तिक प्रशंसा मिल सकती हैं। मगर मेरी आनंद सहेलगाह कुछ मिनिटों के लिए ही खुशी अनुभूत करेगी। आपकी खुद की सहमती आपसे हो, इस बात में दम हैं। मैं एसा कुछ निमित्त बनना चहता हूं। ये मेरी छोटी-सी दुनिया हैं। है कुछ काम की बात ? नहीं भी तो भी आनंद...!

हरेक पर्ल, हरेक दिन, हरेक महिना, हरेक साल कुछ नई उम्मीदों से हमें भर देते हैं। हम कुछ भूल जाते हैं, कुछ नहीं भूल पाते। कभी-कभार याद याद ही बनी रहती हैं। कभी यादों से कुछ रंगीन सपनें...! कभी कडवाहट के घूंट भी उडान की मशीन में ईंधन का काम करते हैं। जीना इसी का नाम हैं..!
तो चलों, चलें..!
एक नई दिशा की ओर,
चलों शुरु करें...!
नई मंज़िल तक पहुचने की आनंद सहेलगाह !!

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Wednesday, December 27, 2023

THE MEERABAI.
December 27, 2023 2 Comments

Meera is not poet..she is a devotee.

मीरा कोई कवयित्री नहीं हैं...भक्त हैं, समर्पिता हैं।

कृष्ण के पागल प्रेम में कौन नहीं हैं। हजारों सालों के बाद भी लोगों का कृष्ण के प्रति आकर्षण बढता ही जा रहा हैं। एक तरफ कृष्ण जीवन हैं। एक तरफ कृष्ण विचार हैं। एक तरफ कृष्ण उत्सव रूप हैं, एक तरफ जीवन उद्धारक के रुप में !! कृष्ण का जीवन आनंदलीला है, दूसरी ओर जगद्गुरु की परिकल्पना में कृष्ण विश्व के मार्गदर्शक हैं। इस समग्र असर की तहत पाँच हजार वर्षो के बाद भी कृष्ण मीराबाई की अनुभूति में जीवंत रहते हैं। मीरा की बात आए और कोई पद या भजन याद न आए हो ही नहीं सकता।
"ना मैं जानु आरती वंदन,
ना पूजा की रीत..!
मैं अनजानी दर्शन दिवानी,
पागल मेरी  प्रित..!
लिये री मैंने, दो नैनो के दिपक लिये संजोए !
ये री मैं तो.. प्रेम दिवानी मेरो दर्द न जाने कोई !"


मीरा कृष्ण की भक्ति में इतनी लीन हो गई हैं, कि उसे आरती-वंदन-पूजा की कोई रीत पता नहीं हैं। एकमात्र दर्शन का दिवानापन लिए नैनों के दिपक को संजोए हुए.. प्रेम की अलौकिक मस्ती में जी रहीं हैं। मीरा कृष्ण समर्पण का प्रतिक बन गई हैं। कृष्ण में मीरा का ब्रह्मलीन होना, कृष्ण में एकाकार हो जाना, मीराबाई अद्वैत हो गए हैं। कृष्ण के सहजीवन में मीरा नहीं हैं लेकिन मीरा के सह जीवन में कृष्ण कृष्ण ही हैं। कृष्ण का सख्य राधा को मिला है। राधा ने कृष्णप्रेम को जिया हैं। मीरा ने कृष्णप्रेम अनुभूत किया हैं। दोनों के दीवानेपन में कृष्णा का अनुराग हैं। कृष्णा के प्रति समर्पण हैं। मीरा का प्रेम भक्त वत्सला बन जाता है, कृष्ण तब प्रस्तुत होते हैं। मीरा के शब्द में, विचार में उनके गीत में और नृत्य में भी..! कृष्ण जब मीरा की अनुभूति में आकार सजते हैं तब कोई पद या भजन प्रकट होता हैं। तब कीर्तन-नर्तन की गति को धारण करता हैं। मात्र एकतारा से अनेक सूरों का प्रकट होना संभवित नहीं, सहज नहीं। ये कृष्ण का अप्रतिम भक्त वात्सल्य हैं।

मीरा कृष्ण आहट में सतत हैं। इसीलिए वो कृष्ण आगमन, उनके स्वागत के लिए उत्सुक रहती हैं। हरपल उनकी याद में कृष्णा बसे हैं। कृष्ण के मूर्त रुप के सामने मीरा का अमूर्त प्रेम हैं। कृष्ण जीवंतता की अनुभूति मीरा को एक कवयित्री से उपर समर्पण की मूर्ति बना देती हैं। मीरा कोई शब्द की आराधक नहीं हैं। मीरा कोई विचार के पागलपन में भी नहीं हैं। मीरा कृष्ण की केवल प्रेममय आराधना में हैं। हमें मीराबाई के भजन-पद के द्वारा नितांत भक्ति का आनंद मिलता है। मीरा के "आराधन-पुष्प" से ईश्वर प्रेम की आध्यात्मिक जीवंतता मिलती हैं। हमारे भीतर के कृष्ण को प्रकट होने का अवसर मिलता हैं। इसीलिए मीरा सबसे न्यारी हैं। मीरा के गीत सबके मीत हैं !! मीरा के गीत आनन्द का मूर्त रूप हैं !! आनन्द अनुभूति की क्षण हैं। मीरा के शब्द हमारें लिए भी अद्भुत आनंद के अवसर खडे करने के लिए सक्षम है, समर्थ हैं !!

हजारों सालों के बाद राजस्थान के एक शहर मेवाड की पुत्री में कृष्णप्रेम की फुहार प्रगट होती है। वे केवल आनंद की प्राप्ति में पागल हो जाती है। और कृष्ण में समाहित हो जाती हैं। मीरा धरती का अद्भुत चमत्कार हैं।  मीराबाई के कृष्ण प्रेम की प्रसादी उनके पद हैं। ये शब्द से उपर श्लोक बन जाते हैं ! आज मीराबाई ने ये बात मुझसे रखवाकर मुझ पर कृपा बरसाई...आनन्द !

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Wednesday, December 20, 2023

The Similarity.
December 20, 20230 Comments

When similarity comes in our life,

Body reacted inner Happiness...!

आखिर मनुष्य जीवन की आत्मिक उम्मीद यहीं हैं...आनंद !!

मनुष्य के रुप में हम कईं उम्मीदों को पालते हैं। हमारे भीतर जो चाह उठती हैं, शायद उसी को हम उम्मीद कहते हैं। कुछ पा लेने की जरूरत महसूस होती है तब जीवन कोई सफलता के पडाव पे अपना मुकाम बनाता हैं। और शुरु होती है, एक सफर...उसे में आनंद सहेलगाह कहता हूं।
ईश्वर की अनजान करामाती हरकतें हरेक जीवन को एक बेहतरीन मोड देने के लिए सक्षम हैं।

The similarity


जीवन में कुछ ऐसा माहोल अंगड़ाई लेता हैं और कुछ नयी उड़ान की तैयारी शुरू होती हैं। मनुष्य के रुप में जब हम पैदा हुए, ईश्वर ने हमारें वर्तन पर ही हमारी उत्कृष्ठ उडान लिख दी हैं। इसे हम भाग्य कहते हैं। या फिर गतजन्म के कर्मफल भी कहते हैं। मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि, जब संवेदनाएँ- ईमोशन्स बहतरीन मार्ग प्रशस्त करें तब जीवन की उडान अच्छी लगती हैं। इसके बीना भी किसीको परेशान करके या अपनी बुद्धिमता से कुछ पा लेने की हरकतों से उडान या सफलता पाई जाती हैं। लेकिन उस उडान की ऊँचाई कहाँ तक ? उस उडने वालें को पता..! हमें ऊची उडान की तालीम दी जाती है। उससे एक संकुचित सफर निर्माण होगी। साथ इससे मिलने वाली सफलता का तो क्या कहना ?! उससे जीवनभर की घुटन से ज्यादा क्या मिलेगा ?

जीवन कुछ अच्छी सोच से संवर्धित होता हैं, दूसरों का विचार करते हुए अपने जीवन का मकसद समझ में आता है। प्रकृति की निरव शान्ति में भी गूंज हमें सुनाई पडती हैं। पंछी के गीत के कुछ शब्द बनते हैं, कोई दृश्य आकार धारण करता है। भीतर कुछ अच्छा महसूस होने लगता है। जीवन कोई मकसद को पालता हैं, जिनमें निमित्त कारण का भाव प्रकट होता हैं। तब कुछ आकारित होगा वो बहतरीन होगा। अपना शरीर भी खूबसूरत बननें लगता हैं, मतलब मनुष्य के रूप में जो स्वरूप चाहिए वो सहज निर्माण होगा। ईसे हम खुबसूरती कहते है। ईश्वर के स्पर्श वाली अलौकिक खुबसूरती...!
चलों चलें कुछ ऐसी बहतरीन सफर पे...!

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Tuesday, December 12, 2023

AN HONESTY...!
December 12, 20230 Comments

 Honesty is the fragrance of Humanity.

प्रामाणिकता बडी कीमती हैं, मानवता की महेंक हैं।

An honest man is always child - Socrates. प्रामाणिक व्यक्ति हरहंमेश बालक की तरह होता हैं। ये सोक्रेटिसजी का बहुत बडा विचार वाक्य हैं। मैंने पहले भी ब्लोग के जरिए कहा था कि, सत्य है वो ज्ञान ही हैं। और ज्ञान की असर भी सत्यात्मक होती हैं। ब्रह्मांड में जो बात सनातन महसूस होती हैं वो ईश्वर की सैध्दांतिक बानी हैं।

Honesty

आज इस छोटे से वाक्य में जो बडी बात छिपी है, उनकी बात छेडता हूँ। थोड़ा-सा समझदार, छोटा-सा बालक...हम उसे जो भी पूछते हैं, उनका वो अपनी समझ के हिसाब से प्रामाणिक उत्तर देता हैं। प्रामाणिक का सबसे अच्छा प्रदर्शन बच्चें ही करते हैं। " जो है वो " सही क्या ? गलत क्या ? कुछ पता नहीं। जो जैसा है वैसा दिखता हैं, जब उनका वर्णन भी हूबहू शब्दों से होता है, तब जो अभिप्राय बनता हैं वो प्रामाणिक कहलाता हैं। ये वर्तन दोनों पक्षों में बडा ही लाज़वाब दिखाई पडता हैं। बच्चा कुछ छुपाता नहीं। जो देखता हैं, जो सुनता है वैसा ही सहज वर्तन करता हैं। इसीलिए बच्चों का वर्तन सबसे अच्छा माना गया हैं। जो बच्चा हैं, वो अक्सर प्रामाणिक है। ऐसा स्पष्ट प्रतिपादित होता हैं। लेकिन बात कुछ उपर हैं। बात कुछ अलग हैं।

प्रामाणिक मनुष्य बच्चे जैसा हैं। ये बात जरा हटके हैं। तो प्रामाणिक बनें रहना जरुरी है। तो हम भी बच्चा बनें रहेंगे। बात कुछ अटपटी लग रही है ना ?! बिल्कुल अलग है। अक्सर प्रामाणिक वो ही बनते हैं जिनका मन बचपने से भरा हैं। जिनकी Imagination- कल्पनाशीलता में उम्र की कोई असर नहीं होती। जिनके इरादों में स्वार्थ नहीं हैं। वो सृष्टि के कण-कण से कृतज्ञता महसूस करते रहते हैं। उनका झगडा भी क्षण का और जीद भी थोड़ी... उनका बैठना,उठना और चलना सबको पसंद पडता हैं। वो अपने फायदों का विचार कम करते हैं। सब का भला जिनके भीतर समाया है, वो प्रामाणिक हैं। मनुष्य को सबसे अच्छा ही पसंद हैं। मनुष्य दुसरों के अच्छे व्यवहार से नतमस्तक भी होता हैं। मनुष्य को बच्चें सबसे ज्यादा पसंद होते हैं। बच्चों के साथ उनका व्यवहार भी सबसे अच्छा होता हैं। हम सब थोड़े-बहुत मनुष्य हैं न !? ये बात हमारी भी हैं। हमें भी अपना वर्तन...जब स्वार्थ से उपर हुआ होगा...तब खूब पसंद आया होगा। हमारे भीतर वो दृश्य आज भी संग्रहीत होगा। तब जो खुशी मिली होगी वो आज भी हमें याद होगी। क्योंकि वो थोड़ा-सा, छोटा-सा किरदार प्रामाणिक मनुष्य के रूप का था। उसे याद करके भी हमारा चेहरा खिल उठता हैं।

हम बचपन की निर्दोषता दबाने लगे तब से शायद हम प्रामाणिक नहीं रहें।
हम बडे होना सिखते हैं, सबसे अलग कुछ कर दिखाने की चानक चढती हैं। दुनिया की भीड में जब खो जाते हैं तब बचपना छूट जाता हैं। कहीं खो जाता है। सबके जीवन में एक समय तो ऐसा भी आया होगा...जब हमारें बचपनेवाले वर्तन पर कोई हँसा होगा। तब शायद हमने बचपना छोड दिया होगा। सहजता के रंगों में तब से मिलावट शुद्ध हुई होगी। शायद तब-से हम-सब प्रामाणिक बनना छोड़ते गए होंगे। हम बड़े बनते गए...प्रामाणिक बनें रहना मतलब मनुष्य जीवन में से सबकुछ छूट जाना..! हम सब कुछ छोड़ने वाले ईन्सान नहीं रहना चाहते।
So we are not always child, because we do not try for it.

But I'm small ThoughtBird.🐣
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Tuesday, December 5, 2023

Theater of creation.
December 05, 20231 Comments

 सृष्टि का रंगमंच...!

ईश्वर-सृजला, ईशानंदा, ईशस्नेहा...सृष्टि !!

ईश्वरीय सृष्टि के हम अंश, मुट्ठीभर मिट्टी से बना एक नायाब किरदार...! सृष्टि की संपूर्ण विविधता में हम मनुष्य सबसे उपर हैं। शायद ईश्वर हमसे कुछ करवाना चाहते हैं। हमारे निमित्त तले वो लाजवाब कारनामें करते हैं। ईश्वर ने मनुष्य की श्रेष्ठता शायद इसी उम्मीद पर बनाए रखी हैं। मनुष्य के रुप में हमें जो किरदार मिला है, उसे बखूबी निभाने का दमदार प्रयास ही हमारा प्राकृतिक आनंद बन सकता हैं। क्योंकी हम सृष्टि के रंगमंच की कठपुतलियां से ज्यादा कुछ नहीं।  William Shakespeare says, "The world is a stage and we are all puppets of this beautiful show called LIFE."


कुदरत का दिया हुआ Role, ईश्वर का बनाया चरित्र, उनके ही संवाद और उनकी दी हुई समय मर्यादा। उनकी दी हुर्ई बुद्धि से अपने-अपने किरदार को रुआबदार बनाना। हकीक़त ये है कि ये रुतबा भी ईश्वर की कमाल हैं।

सुबह होती है, सूरज की किरनों से धरती प्रकाशमान हो उठती हैं। माऩों सृष्टि के रंगमंच पर सभी जीव-जंतु, मानव-पशु-पंखीओं के पाठ शुरु हो गए। संतोष और असंतोष से भरी भागदौड के बीच कईं जिंदगियां अपने साँसों की गति को तेज करती हैं। कोई खेलता है, कोई गाता है, कोई नाचता है, कोई अपने आप को लूपाता-छूपाता हैं। कोई बहादुरी के स्वांग सजाता हैं। कोई कपट के रंग लेकर खडा हैं। कोई बेवफाई से नाता झोड लेता हैं। कोई एक दिन की रोटी के लिए कोई पुरखों तक चलने वाली धन दौलत के पीछे पडा है। कोई निरांत के श्वास ढूँढता हैं। किसी को नशा है सत्ता का...कोई नशे में ही हैं। ये हैं जिंदगी की रफ़्तार..! सृष्टि के रंगमंच पर ऐसे लाखों दृश्य अपने-अपने पराक्रम को प्रकट करते हैं। इसे मैं अपने अस्तित्व का प्रेजेंटेशन कहकर आगे बढ़ता हूं।

सृष्टि के रंगमंच का सबसे बेहतरीन किरदार कौन-सा हैं ?
स्वयं ईश्वर भी किस तरह के किरदार से वाकई प्रसन्न होंगे ?

वो किरदार, जब भी रंगमंच पर फॉक्स्ड होता है, तब तालियों की बौछार होती हैं। जब कोई किरदार किसी दूसरें के संग अलौकिक संबंध निर्माण करता हैं। मैं तो कहता हूं...ये भी ईश्वर की ही कोई करामात होगी। जब सूरज निकलता है...और सृष्टि के दो पात्रों का मिलन एक उत्सव बन जाता हैं। उनके चेहरें का स्मित समर्पण प्रकट करता हैं। दो चरित्रों के संवाद एक होने लगते है। एक दूसरों के सपनों में एकत्व का संचार होने लगता हैं। एकमेव पारस्परिक सख्य का दृश्य आनंद ईश्वर को प्रसन्न करने वाला होगा। सृष्टि के रंगमंच का ये बहतरीन किरदार हैं। शांत-निर्मल झरनों के बहाव का संगीत व पावित्र्य इन किरदार में से सहज ही प्रकट होंगे। प्रेमतत्व से बंधा ईश्वर का पसन्दीदा किरदार...!!

सृष्टि के कोई कोनें में दो जीवों का अप्रतिम मिलन संभव होता हैं।  भिन्नताएं एकत्व के मार्ग पर चल पडती हैं। अप्रस्तुत ईश्वर अदृश्य होकर भी दो जीवों के 'अद्वैत' का आनंद लेते हैं। ये सृजन भी ईश्वर का ही हैं। उनके आनंद पात्रों के रुपमें कौन पसंद होता हैं ? सृष्टि के कौन-से किरदार पर ईश्वर की अमीदृष्टी पडती हैं, क्या पता !? ये बेमिसाल किरदार वाला फॉर्म्युला गजब का हैं। सृष्टि के रंगमंच का आनंदृश्य...!

"आनंदविश्व सहेलगाह" कुछ  विचार रखकर खूश हैं। शायद ईश्वर ने दिया हुआ ये मेरा किरदार हैं। उसे अच्छी तरह से निभाने की शक्ति भी वो ही देंगे..! ऐसी अतूट श्रद्धा के साथ....!!

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રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠનો અવસર...!

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...! 'રજતમિલન' એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં,  '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' ...

@Mox Infotech


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