Dr.Brieshkumar Chandrarav

Thursday, October 17, 2024

The Horizons is real love..!
October 17, 20240 Comments

Real love is not easy and easy love is not real.

सच्चा प्यार आसान नहीं है और आसान प्यार वास्तविक नहीं है।


ईश्वर की दी हुई इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्ति होती ही रहती हैं। उससे हमारी वैयक्तिक सोच बनती हैं और बढती भी हैं। लेकिन उसके लिए जीवन का एक निर्धारण होना चाहिए। कोई लक्ष्य या ध्येय होना चाहिए। इन दो शब्दों में बहुत अंतर हैं। इसके बारें में एक अलग ब्लोग लिखूंगा।

लक्ष्य एक वांछित परिणाम होता है, व्यक्ति अपने मत अनुसार कुछ पाना चाहता है। वहीं, ध्येय लक्ष्य को पाने के लिए किए जाने वाले विशिष्ट कार्य होते हैं। आज बस इतना ही क्योंकि हम प्रेम की बात करने वाले हैं। कभी अच्छा सुनाई पडता हैं, कभी पढने में आता हैं। कभी-कभार हम अपनी आंखो से देखते हैं। इनमें सबसे बडी बात प्रेम हैं। एक प्रेम शब्द ही सबको आकर्षित करने में सक्षम हैं। फिर उसकी अनुभूति का तो क्या कहना..!?


सबको प्रेम चाहिए। प्रेम से भरा जीवन ही सबसे बेहतर जीवन हैं, ये भी सबको पता हैं। पद, प्रतिष्ठा और पैसों से बढ़कर प्रेम हैं, ये भी सब जानते हैं। मैं लिख रहा हूँ आप पढ रहे हैं..अंतर सिर्फ इतना हैं। चलों शुरु करते हैं, थोडी प्रेमभरी बातें। आपका पढने से और मेरा लिखने से मनभर जाएगा।

प्रेम और वास्तव एक दूसरें से झुडे है। वो ऐसे झुडे हैं कि उसको समझना भी बड़ा मुश्क़िल हैं। प्रेम सरल हैं, साहजिक हैं फिर भी वो वास्तविक नहीं बन पाता। हमें प्रकृति में से कई उदाहरण मिलते हैं। में एक ही बात रखता हूं, आकाश और धरती के अनुराग की। उनके मिलन को हम क्षितिज कहते हैं। आकाश ने धरती को थाम रखा हैं। आसमान से गिरती पानी की बूँदें धरती को तृप्त करती हैं, हरित भी बनाती हैं। धरती अपनी रुह से भाप छोडती हैं; और उससे आकाश को स्पर्श करती हैं। कैसा है, ये पारस्परिक व्यवहार !? ये कैसा अदृश्य रिश्ता हैं ? है ना, बडी कमाल का संबंध ! ये धरती और आकाश का प्रेम संबंध है। सबको आकाश और धरती का मिलन दिखाई पडता हैं, मगर वो आभास हैं। वास्तव में वो प्रेम मिलन अधूरा रहता हैं। प्रकृति के भितर पला हुआ ये सबसे पूराना प्रेम संबंध हैं।

सच्चा प्यार हम किसे कहेंगे। जिसमें शून्य प्रतिशत स्वार्थ न हो। न कुछ लेना न देना देना फिर भी सबकुछ समर्पित है। न कुछ पाना, न कुछ खोना फिर भी आकर्षण में खोट नहीं। कोई अलौकिक शक्ति बांधे रखती हैं। ये बढता भी नहीं और खत्म भी नहीं होता। ये संबंध क्यों है ? उसका उत्तर ही न मिले वो प्रेम हैं।

प्रेम है तो साथ हैं, साथ नहीं हो फिर भी प्रेम हैं। ये बडी असमंजसता वाली घटना हैं। धरती और आकाश के प्रेम की तरह कभी न खत्म होने वाली कहानी। प्रेम वास्तविक नहीं बन पाता हैं। शायद इसीलिए प्रेम सभी बंधनो से ऊपर हैं। उसका न मोल न तोल..!

प्रेम बस प्रेम हैं। प्रेम स्वयं भगवान का अदृश्य रुप हैं। प्रेम पूजनीय इसी कारण हैं और रहेगा। बस प्रेम प्रेम हैं।

आपका ThoughtBird 🐣
Dr.Brijeshkumar Chandrarav
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Thursday, October 10, 2024

My new little step.
October 10, 2024 6 Comments


Hello friends,


आप जो पढ रहे हैं उनके साथ एक पुस्तक का फोटो हैं।
ये मेरी नॉवेल हैं।
बाज के जीवन पर आधारित एक कहानी हैं।


आपकी उम्र जो भी हो..!
आप जीवन में कुछ करना चाहते हैं ?
आप संघर्ष से डरते हैं ?
क्या आप को ऊँची उडान में या कुछ कर दिखाने में विश्वास रखते हैं ?
क्या आपको अपने परिवार से लगाव हैं ?
ऊँची सोच, ऊँची उडान और ऊँची सफलता में विश्वास रखते हैं ?
एक बाज भी क्या अच्छा प्रेमी हो सकता हैं ?

इन सब खट्टी-मीठी बातों से मिश्रित कहानी..!
"फ्लाइंग मारवॅल" एक उडती अजायबी..!

जीवन बदलाव का दूसरा नाम हैं। संघर्ष ही जीवन हैं।
आनंद ही जीवन की सबसे बेहतरीन प्राप्ति हैं।
मेरे अनुराग से नहीं आप अपने जीवन के अनुराग के लिए पढना।

My Dream Book on online.
"Flaying marvel"


BlueRose publication store.
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Amazon.
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Its not a only book, its a voice of Heart.
BlueRose INTERNATIONAL publication, Delhi present my Book.
Wait for this book..! 

Thanks..!
Dr.Brijeshkumar Chandrarav 🐣

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Monday, October 7, 2024

Tradition and Experience.
October 07, 20241 Comments

More is learned from experience than from tradition.

परम्परा से अधिक अनुभव से सीखा जाता है।

समाज परंपराओं से बँधा हैं। आदिमानव से लेकर सुसंस्कृत मानव सभ्यता की यात्रा में परंपराओं का बहुत बडा योगदान हैं। एक रीति, एक रिवाज या हमारें पुरखों की जीवन संबंधित मान्यताएँ उसे हम परंपरा कहते हैं। युगों से चली आ रही एक सामाजिक व्यवहार की परंपरा से समग्र मानव प्रजाति झुडी हैं। इससे सामाजिक व्यवस्थापन हुआ। मनुष्य का विकास हुआ। यहां तक सब ठीक दिखाई पडता हैं।

Tradition

लेकिन कुछ लोग परंपरा से उपर उठकर कोई कार्य करते हैं। शायद वो कार्य समाज को उपयोगी नहीं होगा तो उसका विरोध निश्चित होगा। शायद उसके परिणाम बाद में समझमें आते हैं। तो बाद में उसका स्वीकार होता हैं। ये असमंजसता क्यो पैदा हुई ? बाद में उस विचार कों क्रांति का नाम दिया जाता हैं। परिवर्तन संसार का नियम हैं। उस न्याय के आधार पर परंपरा से उपर उठनेवालों का स्वीकार होता हैं, जयजयकार भी होता हैं। वो प्रतिष्ठित आदमी बन जाता हैं। ऐसा भी क्यो होता हैं।

जवाब हैं; परंपरा से उपर अनुभव हैं। समाज भी अनुभवों की बातों का अनुसार ज्यादा करता हैं। परंपराएं लुप्त हो सकती हैं। अनुभव कभी लुप्त नहीं होता। आज हम देखतें हैं कि भारत में कईं परंपरा अच्छी होने के बावजूद विद्यमान नहीं हैं। कईं लोग और संगठन परंपरा के ह्रास से चिंतित हैं। परंपरा पूजक बनकर खूब प्रयास करते हैं। लेकिन वो भी परंपरा को टीका नहीं पा रहे हैं। और संस्कृति के मूल्यहास की बूमराण मच जाती हैं। ऐसा माहोल पूरे विश्व में हैं। ऐसा क्यों होता हैं। अच्छी बात समाज में टिकती हैं, फिर परंपरा टिकती क्यों नहीं उसके कारण हमें मिलते नहीं। थोडा बहुत शांत बनकर सोचना पड़ेगा।

जो परंपरा मात्र परंपरा रहे वो कभी टिकती नहीं। उसके साथ हमारा अनुभव झुडता हैं तभी परंपरा की तथ्यात्मक समझ हममें स्थापित होगी। परंपरा एक सामाजिक संयोग के रुप में हैं। जब परंपरा की सत्यार्थता हमारे अनुभूति में आ जाय फिर वो कायम होगी। समाज बुद्धिकी अमर्यादित सिमाओं को लांघकर विकसित हो रहा हैं। ये सही के ये गलत की होड मची हुई हैं। कोई धर्म को लेकर, कोई संप्रदाय से, कोई स्वर्ग को लेकर, कोई जन्म-मरण के बंधन को लेकर बैठा हैं। कोई दूसरों से कैसे डरना हैं, उसकी हटिया लगाकर बैठे हैं।

जिसको समाज की परवाह हैं, समग्र मानवजात की फिकर हैं वो परंपरा को अनुभूति में लाएंगे तब कुछ अच्छा संभव हो सकता हैं। भारतवर्ष ने विश्व को "वसुधैवकुटुंबकम्" परिकल्पना दी हैं। सारी पृथ्वी एक कुटुंब- परिवार की भांति हैं ये विचार हमने दिया हैं। सच हैं, लेकिन क्या उसे परंपरा की बातों में ही रहने देना हैं। तो फर्क क्या पड़ेगा !?

स्वयं की अनुभूति ही स्वयं का उद्धार हैं। हमें वैयक्तिक रुप से परंपरा को अनुभूति में लाना हैं। फिर जो बात कही जाती हैं, वो सनातन रूप से समाज में टिकती हैं। मनुष्य के रुपमें जब से हमें परंपरा पूजक बनें तब से ये समस्या खडी हुई हैं। परंपरा को निभाना हैं, उसे अनुभव में लाना भी कहते हैं। परंपरा का मात्र गौरव करना एक बात हैं। उसका अनुसरण करना दूसरी बात हैं।

भारत की परंपराएँ श्रेष्ठ है तो उसका अनुसर करें। न की मात्र वाह-वाही..! भारत की जय बोलना एक बात हैं। भारत की जय करवाना दूसरी बात हैं।

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Thursday, October 3, 2024

Biggest festival of the world..!
October 03, 2024 2 Comments

The glow of inner light this is navaratri.

आंतरिक प्रकाश की चमक यही है नवरात्रि।

विश्व का सबसे लंबा उत्सव नवरात्रि। संगीत और प्रकाश से रंगारंग हैं नवरात्र। नृत्य कला का बेहतरीन उत्सव। उमंग और उत्साह से भरा भक्तिमय माहोल, पूरे भारत में मनाया जाने वाला दैवीय उत्सव नवरात्र हैं। पूजा, आराधन, तप-तपस्या का सबडे बडा उत्सव है ये..!

आज क्या बदल गया ? उसके बारें में लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं। लेकिन नवरात्र के नौ दिनों में पूजा स्थल में रखे जानेवाले मिट्टी के मटकों का मुझे ज्यादा आकर्षण रहा हैं। उस मटके में जगह-जगह छिद्र किए हुए होते हैं। उसका पौराणिक नाम 'गर्भदीप' हैं। हम जानते हैं कि उस मटके के भीतर एक दीप जलाया जाता था। रात के अंधेरे में जब छिद्र में से प्रकाश की किरनें दिखाई देती थी, वो नजारा ही खुबसूरत था। वैयक्तिक रुप से मेरे सबसे अच्छे आकर्षणों में 'गर्भदीप' सबसे उपर हैं।

The Navaratri

कितना सुंदर उत्सव हैं..! भीतर तेज का प्रगटन करना हैं। हमारा शरीर जैसे एक मिट्टी का घडा हैं। उसमें आत्मा तेज स्वरुप हैं। छिद्र शायद हमारी ज्ञानेन्द्रियों है, उससे हमारी क्रांति दिखाई पडती हैं, हमारी आभा प्रकट होती हैं। ये हमारी मानवीय संवेदन की विरासत हैं। नवरात्र प्रगट होने की शानदार रात्रिओं का उत्सव हैं। हमारी भागदौड भरी जिंदगी में ये सूकून से भीतर को समझने का उत्सव हैं। नौ दिन कुछ नया सोचना हैं। भीतर की आवाज को सुनना हैं। एक नई समझ को प्रदीप्त करना हैं। भीतरी प्रकाश को प्रज्वलित करना हैं। ये माँ दूर्गा की कृपा प्राप्ति करने का उत्सव हैं। शक्ति प्राप्त करने के लिए थोडे बहुत शांत और धीर बनने का अवसर हैं। नवरात्री जीवन उत्सव हैं। सालभर की उर्जा का प्रकटन करने का उत्सव हैं। इसे हम आध्यात्म कह सकते हैं। पूजा ब आराधना कह सकते हैं। तांत्रिक एवं कर्मकांड की बात में नहीं पडता हूँ। वो अपनी-अपनी सोच पर निर्भर हैं। इसके लाभ-अलाभ की बात भी नहीं करता, ये एक अलग विषय हैं।

अंतःकरण की खुशी और जागृतता की बात करता हूं। वैसे तो एक छोटे से दीपक की क्रांति बेशुमार होती हैं। सूरज गैरमौजूदगी में उनका प्रयास लाजवाब होता हैं। इसीलिए स्वाभाविक रुपसे दीपक पर प्यार उमडता हैं। नवरात्र हमारें भीतर के दीप की आभा को निखारने का उत्सव हैं।

नवरात्री व्यक्ति जीवन के कईं पहलूओं को स्पर्श करती हैं। कला-संस्कृति-धर्म-अध्यात्म-तपस्या-पूजा एवं आरोग्य को नियंत्रित करने वाले हमारी सांस्कृतिक विरासत को प्रकट करने वाले उत्सव की सहस्रकोटि शुभकामनाएँ..!

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Thursday, September 26, 2024

Practice and detachment..!
September 26, 2024 2 Comments

।। अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध: ।।

Practice and detachment are key to controlling the mind.

अभ्यास और वैराग्य मन को नियंत्रित करने की कुंजी हैं।


'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः' यह एक योगसूत्र है। इसका अर्थ है; अभ्यास और वैराग्य से चित्त की वृत्तियों का निरोध होता है। थोडा विस्तार से अर्थ को समझने का प्रयास है;

१ 'अभ्यास' का अर्थ है किसी काम को बारबार करना..प्रेक्टिस।
२ 'वैराग्यभ्याम्' का अर्थ है इच्छाशून्यता से, अनासक्ति से..!
३ 'तद्' का अर्थ है उनका।
४ 'निरोधः' का अर्थ है संयम एवं नियंत्रण।
इससे समझ में आता है; 'चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए अभ्यास और वैराग्य का पालन करना चाहिए। चित्त की वृत्ति पूर्ण रूप से रुकती हैं, तब साधक समाधि प्राप्त करता है।

                  Special thanks for this beautiful picture. 
बडी फिलासफी हो गई।  शब्द की बडी व्याख्या हो गई। लेकिन जब भी कोई बडा टास्क आए तो उससे भागना थोडी हैं ? उसे समझने का प्रयत्न करना हैं। मैंने योग का एक अर्थ जुड़ाव भी सुना हैं। अपने काम प्रति एकरूप हो जाना या हमें जो करना हैं उस कार्य में डूब जाना मग्न हो जाना भी योग हैं।

अब बात करते हैं अभ्यास और वैराग्य की। अभ्यास की निरंतरता के लिए वैराग्य जरुरी हैं। वैराग्य मतलब सबकुछ छोड़कर कहीं एकांत में मग्न हो जाना या संसार को त्याग देना ही नहीं हैं। वैराग्य का मतलब हम संसारीयों के लिए निग्रह भी हैं। चित्त में उठती सामान्य इच्छाओं को नियंत्रित करना फिर बडी इच्छाएं भी नियंत्रण में रहेगी। अभ्यास के लिए ये अत्यावश्यक हैं। संसार में जिन-जिन लोगों ने नियंत्रित होकर अपनी उपलब्धि के प्रति एकरूपता की है, वे  दुनिया की नजर में सफल कहलाएं हैं।

आप नियंत्रित हैं, तो अभ्यास के लिए सहज ही क़ाबिलियत बढेगी। जब अभ्यास के प्रति रुचि बढ़ती हैं, तो सहज ही हम नियंत्रित हो जाते हैं। हमारी लब्धि केन्द्र में रहती हैं, वो हमारा लक्ष्य बन जाती हैं। अभ्यास और वैराग्य पारस्परिक हैं, एक है तो दूसरा जरुर आएगा।   दोनों की सप्रमाण अहमियत हैं, इससे ये भी सिखने को मिलता हैं। दोनों का एक होना एकत्व हैं, अद्वैत हैं। अद्वैत की स्थिति से जो उत्पन्न होगा वो सबसे बेहतरीन होगा।

अद्वैत की बात समझनी है तो एकमात्र कृष्ण को याद करें। कृष्ण का संपूर्ण जीवन एकत्व हैं। राधा और कृष्ण का प्रेम अद्वैत की दृश्यमान स्थिति हैं। राधाकृष्ण का प्रेम इसीलिए सबसे उपर हैं। यहाँ अभ्यास कृष्ण है तो वैराग्य राधा हैं। उससे जो प्राप्ति होगी वो राधाकृष्ण के प्रेम की तरह होगी...सबसे निराली..!

सांसारिक मनुष्य के रुप में हमारे साथ जो कुछ जुडता है, वो इसी सिद्धांत का अनुसरण हैं। इन दोनों का आचरण हमें अद्वैत मार्ग पर  ले जायेगा.. जिसे हम क़ाबिलियत कहते हैं !!

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Thursday, September 19, 2024

Excellent work of weaverbird.
September 19, 2024 6 Comments

If you want some work to be done well, then do it yourself.

"आप चाहते हैं कि कोई काम अच्छे से हो तो उसे  खुद किजिए।"

एक चित्रकार का चित्र लाखों-करोडों में बिका। एक पुस्तक की लाखों करोडों प्रतें बिक गई। एक गीत ने करोडों की कमाई की। एक हफ्ते में फिल्म ने एक हजार करोड का बिजनेस कर दिया। ये सब हम रोज सुनते आए हैं, और सुनते भी रहेंगे।

इतनी बडी पृथ्वी पर कईं देश हैं। इनमें कई लोग रहते हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग हैं। रंग-रुप-वेश-भाषा-धर्मसंप्रदाय-खानपान और रहन-सहन में काफी-कुछ बदलाव हम देख रहे हैं। इनमें कुछ अदल-बदल भी होते रहते हैं। जिसको जो पसंद आता है वो अपनाता हैं।

Weaverbird
                                           Special thanks for this beautiful photo. 

सृष्टि के वैविध्य में जो व्यक्ति अपनी रस और रुचि के अनुसार अपना काम चुनता हैं, और वो काम खुद करते हैं। अच्छे से करते हैं। जब वो काम खुद की नजर में परफेक्ट बनता हैं। तब वो सारी दुनिया के लिए पसंदीदा बन जाता हैं। वो काम लाखों में एक बन जाता हैं।

पहले तो अपने उस काम को चाहो। जिनके द्वारा आप अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। वो काम एकदम उत्तम तरीक़े से होना चाहिए। उनमें जान डाल देनी चाहिए। फिर देंखे, वो काम आपको बेहतर साबित कर देगा। आपकी निपुणता स्पष्ट हो जायेगी।

हा..एक बात हैं। उसे स्वीकार करने वाला समाज भी समदर्शी होना आवश्यक हैं। वो उस कलाकृति को समझने वाला हो। झवेरी ही हीरों की परख कर सकता हैं, वैसे समाज की ये दृष्टि होनी चाहिए। समाज की दृष्टि और वैयक्तिक दृष्टी में काफी अंतर हैं। समाज में कार्य की उचित्ता पर संदेहास्पद व्यवहार होगा तो वो करने वाला समाज या व्यक्ति जरुर उसका भुगतान करेगा। ये हमारें पुरखों से चली आ रही नग्न सत्यता हैं। स्वीकार करना या न करना वैयक्तिक सोच पर निर्भर हैं। ईश्वर सब देखता हैं। समाज या व्यक्ति इन वक्र दृष्टि से कहाँ मार खा रहा हैं वो भी दिखना चाहिए।

मैं बात कर रहा था एक सुंदर कार्य कैसे आकारीत होता हैं। कुदरत में ही उत्तर ढूँढते हैं। अब मैं एक छोटे से पंछी बया की बात करता हूं। पक्षी छोटा हैं लेकिन कार्य से प्रसिद्ध हैं। सब जानते हैं उसे..!

बया पक्षी को अंग्रेज़ी में 'weaver finch', 'weaver', या दूसरें शब्द में 'weaverbird'  कहते हैं। इस वीवर बर्ड- बया पक्षी के बारे में कुछ अनसुनी बातेंः 
बया पक्षी का रंग हल्का पीला होता है। 
ये छोटा-सा पंछी घास के छोटे-छोटे तिनकों और पत्तियों को बुनकर एक खुबसूरत घोंसला बनाता हैं। ये लालटेन की तरह लटकता हुआ कईं जगह पाया जाता हैं।
बया पक्षी को पक्षियों का इंजीनियर भी कहा जाता है।
ज्यादातर कांटो से घिरी जगह या जहां पहुंचा नहीं जाता वैसे स्थान पर ये घोंसला बनाते हैं।
बया पक्षी बीज और कीड़ों पर फ़ीड करता है। 
कभी-कभी अनाज की फसलों के लिए विनाशकारी होता है।
इसके आहार में कुछ कीट और तितलियां भी होते हैं।
इनको छोटे मेढक तथा सीप, घोंघा इत्यादि भी ले जाते देखा गया है।
(खासकर अपने बच्चों को खिलाने के लिए)

इस छोटे-से पंछी की बात रखकर मुझे आनंद मिला। घोंसला सभी पंछी बनाते हैं। लेकिन बया का घोंसला सबसे बहतरीन इसलिए है, कि वो अपना काम खुद करते हैं। बात खत्म हुई..अबतक पढा है तो अपनी सोच को आनंदित करें...मस्त रहें।

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Thursday, September 12, 2024

Intelligence has limit.
September 12, 2024 6 Comments

The difference between stupidity and intelligence, is that intelligence has a limit.

Albert Einstein.


हां, अल्बर्ट आइंस्टीन को यह कहने का श्रेय दिया जाता है, "मूर्खता और प्रतिभा के बीच अंतर यह है कि प्रतिभा की अपनी सीमाएं होती हैं"। एकदम सही बात हैं और अल्बर्ट आइंस्टीन को हक भी है ये कहने का। उन्होंने अपनी प्रतिभा के लिए तपस्या की हैं। अपनी जरुरतों का ख्याल छोडकर। उनमें एक प्रतिबद्ध लगन थी। जीवन की सही मूल्यता को वो पहचान गए थे। फिर उनको किसी ओर को पहचानने की जरुरत ही न पड़ी।

अल्बर्ट आइंस्टीन के बारें में थोडी इंफॉर्मेशन जी इन्डिया डॉटकॉम पर उपलब्ध हैं। उनके संशोधन के बारें में काफी-कुछ जानकारी प्राप्त हो सकती हैं। आज सोशल साइट्स पर्याप्त हैं। फिर भी थोडा कुछ..!

Albert Einstein

अल्बर्ट आइंस्टीन की उम्र चार या पांच साल रही होगी, जब पिता ने उनको एक छोटा सा कंपास दिखाया। आइंस्टीन कंपास के कांटो को इधर-उधर जाता देख सोच में पड़ गए। वह कौन सी अदृश्य ताकत है जो कांटे को इधर से उधर ले जा रही है ? जिज्ञासावश हुआ ये सवाल आइंस्टीन के लिए पूरी जिंदगी का सफर बन गया...! ब्रह्मांड को समझना आइंस्टीन के लिए 'अमर पहेली' बन गया !

वह सूर्य ग्रहण 29 मई, 1919 को पड़ा था। जैसे ही आसमान से बादल छंटे, 17वीं सदी से चली आ रही आइजैक न्यूटन की गुरुत्वाकर्षण की परिभाषा किसी काम की नहीं रही थी। सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आए और ग्रहण लगा। तब तक जितने तारों की जानकारी थी, उनकी तस्वीरों ने उस बात की पुष्टि कर दी थी जिसकी भविष्यवाणी आइंस्टीन 'सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत' में कर चुके थे। वह भविष्यवाणी थी- 'सूर्य का गुरुत्वाकर्षण एक लेंस की तरह कार्य करता है और दूर स्थित तारों से आने वाले प्रकाश को विक्षेपित (deflect) कर देता है, जिससे वे नई जगहों पर दिखाई देने लगते हैं।'


अगले कुछ महीनों के भीतर अल्बर्ट आइंस्टीन का नाम दुनियाभर में फैल गया। 7 नवंबर, 1919 को The Times of London ने खबर छापी- विज्ञान में क्रांति, ब्रह्मांड का नया सिद्धांत, न्यूटोनियन विचारों को उखाड़ फेंका गया'। उसके बाद तो मीडिया में आइंस्टीन को लेकर रातों रात ऐसी दिलचस्पी जगी कि वह दुनिया के सबसे मशहूर वैज्ञानिक बन गए। आने वाले कुछ सालों में आइंस्टीन के सिद्धांतों ने भौतिक विज्ञान को नई दिशा दी।

आइंस्टीन की उपलब्धि एक तरफ हैं, कठोरतम साधना एक तरफ हैं। उनका अनुभव एक तरफ हैं, बुद्धिमत्ता एक तरफ हैं। व्यक्ति जन्म के बाद अपनी रूचि ढूंढ लेता हैं, अपने जीवन का मकसद ढूंढ लेता हैं। उसे अपना पसंदीदा काम मिल जाता हैं। वो बखूबी उस काम में झुड जाता हैं। फिर बारी आती हैं परिणाम की...कुछ सफलताएँ शोर मचाती हैं। उनमें दुनिया के लोगों का स्वर झुडता हैं।
ये बुद्धिमत्ता को प्राप्त करने की सफर हैं। जो व्यक्ति सफर पर निकलेगा। वो ही अपने अनुभव से कुछ कहेगा जो दुनिया के लिए अच्छा हैं। 'बुद्धिमत्ता की मर्यादा होती हैं, एक सीमा होती हैं। लेकिन मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती।' उससे यह भी सिखने को मिलेगा कि हमें बुद्धि पर कितनी और कहाँ लगाम लगानी हैं ! दूसरी तरफ मैं ही बुद्धिमान हूं ! मानकर जो भी करना हैं करते चलो। जीवन अपना हैं। मार्ग भी हमारा होना चाहिए। एकबार ह्रदय से पूछकर अपने कार्य को आरंभ करना। सब पता चल जायेगा। लेकिन कुछ मूर्खता बडी अटपटी होती हैं, वो फंसा लेती हैं। उनमें मेरी बुद्धि है ही नहीं..!
हमें नचा कौन रहा हैं ? ये बात समझ में आए तो भी ठीक हैं।

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રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠનો અવસર...!

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...! 'રજતમિલન' એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં,  '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' ...

@Mox Infotech


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