Dr.Brieshkumar Chandrarav

Monday, March 17, 2025

Joy of Victory.
March 17, 2025 10 Comments

"In a war of ego, the loser always wins" BUDDHA

"अहंकार के युद्ध में हारने वाला हमेशा जीतता है।" - भगवान बुद्ध

जीवन की कला बड़ी ही पेचीदी हैं। जन्म से लेकर के मृत्यु तक जीवन जीना और समझना ही चलता रहता हैं। रात-दिन के समय चक्र में जीना हैं। संसार सागर के खारेपन को पीना हैं। कहीं माँ गंगा की शीतलता धारा को महसूस करना हैं। कभी खुशी कभी गम की तरह जीवन बहता ही रहता हैं। सृष्टि के प्राकृतिक व सामाजिक पहलूओं के साथ जीवन का तालमेल करते जाना हैं।

जन्म मिला है, जीवन मिला है तो गुजरेगा भी सही...! लेकिन जिसको जीवन का अर्थ समझ में आता हैं। कुछ करने की उम्मीद उनके मन में पलती हैं। या नियंता के निमित्त उनको वैसे ही मार्ग पर ले जाते हैं। या ईश्वर की विशेष मर्ज़ी के तहत कुछ अनूठा व्यक्तित्व आकारित होता हैं। कुछ विशिष्ट कार्य संभावित होते हैं। एक ऐसा व्यक्तित्व जो संसार को मार्गदर्शित करता हैं। जिसे युगपुरुष का नाम देकर हम उनका बहुमान करते हैं।

Buddha

अब, जिसको जीवन के बारें में ज्यादा कुछ समझना हैं। अपने नियत कर्मो को पहचान कर समाज में कुछ अच्छा देना हैं उसे आगे पढना चाहिए। बाकी टाइम पास के लिए कईं ओर भी काम हैं। शेखचल्ली या उनका भी बाप बनना हैं, वो इस मार्ग पर चल सकते हैं।

भगवान बुद्ध के जीवन की गति कुछ इस प्रकार की थी। उनको जीवन के मर्म को पकडना था। गहराई से जीवन को समझना था। सत्य और असत्य क्या है उसका भेद जानना था। जीवन और मृत्यु के रहस्यो को समझना था। ऐसे अनूठे मार्ग पर जिसे भी चलना है, उसे सब से मिलना होगा। उनको सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करना होगा। सद्गुण आवश्यकता की महत्ता को स्वीकार करना होगा। और भगवान बुद्ध ऐसे ही जीये है। हमें उपदेश करते हैं, मतलब जीवन का अनुभव बताते हैं। उन्होंने नियंत्रित जीवन जीया हैं। त्याग और समर्पण को महसूस किया हैं। जीवन की भरपूर उर्जा के लिए तप एवं साधना हैं।

वो परम प्राप्ति के वाहक भगवान बुद्ध अपनी जीवन प्रज्ञा से कहते हैं; हमें अहंकार के युद्ध में बख़ूबी भाग लेना हैं। लेकिन अहंकार के सामने तो हार ही जाना हैं। किसी प्रकार अहंकारी जीत जाता हैं। उसके सामने वाला हारता हैं। इस दोनों स्थिति में बहुत फर्क हैं। वैसे तो अहंकारी का विनाश ही होता हैं। एक व्यक्ति के रुप में हमें ego पालने से बचना होगा। क्योंकि उससे हमारें भीतर का मनुष्य कुंठित हो जाएगा। ईश्वर की दी हुई शक्तियाँ समाप्त हो जायेगी। हम मनुष्य के रुप में "कुछ करना चाहते हैं" ऐसे कईं संकल्पो से दूर ही रहेंगे।

अहंकार दूसरें को परास्त करने की विचित्र कला हैं। उससे व्यक्ति खुद ही खत्म हो जाएगा। इतिहास के पन्नों में काफी कुछ भरा पड़ा हैं। अहंकार में किसका सर्वनाश हुआ और अहंकारीयों से हारकर कितनों ने अपने मुकाम को बहतरीन अंजाम दिया हैं। इतिहास गवाह हैं, चांद और सूरज भी कुदरत की ओर से सब देख रहे हैं। मिटाने वालो की हस्ती खूद ही मिट गई हैं। अहंकारीयों के अपमान को झेलते हुए कईं नस्ल आज भी जिंदा हैं। तुच्छता के मार से आज भी कईं संवर गए हैं। और एक तरफ सबकुछ अपने हाथ में होने के बावजूद लोग परेशान हैं। कईं लोग अपने भीतर की झीलमिलाहट से दूर जा रहे हैं।

क्योंकि हारना भी जरुरी है...!?
और जीतना ही है तो...सबको अपनी ज्ञाति-जाति-धर्म का अहंकार मुबारक !!

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Wednesday, March 5, 2025

STARTING THE CHANGES.
March 05, 2025 2 Comments

Falgun is glorious month of the nature.

फाल्गुन प्रकृति का गौरवशाली महीना है।

भारत प्राकृतिक वैविध्य के साथ मौसम के वैविध्य में भी अनूठा हैं। वैदिक परंपरा का वाहक भारत मनुष्य जीवन के नैसर्गिक जीवन को सहज ही विकसित करता हैं। ऋतुओं का बदलाव मनुष्य के मन-मस्तिष्क को सँवार ने का काम करता हैं। वैसे एक सत्वशील मौसम की बात करता हूं।

फाल्गुन मास हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष का अंतिम महीना है। वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है फाल्गुनमास..! इसे रंगों और खुशियों का महीना भी कहा जाता है। फाल्गुन मास से जुड़ी कुछ सुनी-अनसुनी बातें इस ब्लॉग में करते हैं।

Spring

फाल्गुन मास का नाम 'फाल्गुनी' नक्षत्र पर आधारित है। इस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा फाल्गुनी नक्षत्र में होता है, इसलिए इसे फाल्गुन कहा जाता है। ये प्रकृतिक बदलाव का महीना हैं। फाल्गुन मास में सर्दि का अंत और गर्मि का प्रारंभ होता है। इस समय प्रकृति में नए पत्ते और विविध प्रकार के फूल खिलने लगते हैं।  जिससे वातावरण मनमोहक बन जाता हैं।
फाल्गुन का धार्मिक महत्व भी बडा हैं। वसंत के आगमन में शारदा पूजन का विशेष महत्व हैं। शिवरात्रि पर्व के कारण पूजा-पाठ भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। होली के साथ ब्रजवासी कृष्ण को झोडकर रंगोत्सव मनाया जाता हैं। ब्रज में मनाई जानेवाली होली की तो बात ही निराली थी। राधा और कृष्ण के साथ गोप-गोपियों का नृत्य बडा ही सुहावना था। इसके चित्र से भी आज सब मोहित हो जाते हैं। भक्त प्रह्लाद की उपासना के साथ भगवान विष्णु झुडे हैं। इसतरह यह महीना भगवान कृष्ण और भगवान शिव को समर्पित है। एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुन माह में चंद्रमा का जन्म हुआ था। इसलिए इस माह में चंद्रमा की उपासना का विशेष महत्व है। वैसे भी गर्मी के मौसम में शीतलता चंद्रमा से ही मिलती हैं।

एक महत्वपूर्ण बात होली की हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का त्योहार मनाया जाता है। हमेशा बुराई पर अच्छाई की जीत होती रही हैं। कुदरत का मूलभूत सिद्धांत प्रकृति बयां करती हैं। इसके साथ मनुष्य जीवन की गतिविधि झुडती हैं। इसे हम त्योहार कहते हैं। इसतरह ये त्योहार इसके प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। रंगों और खुशियों का अद्भुत साथवाला उत्सव होली हैं। इसलिए ये आनंद और उल्लास का भी महीना कहा जाता हैं।

हिंदु संस्कृति के गौरवशाली फाल्गुन मास का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है। साथ प्रकृति के साथ जुड़ने और जीवन में खुशियाँ लाने का अवसर प्रदान करता है। जीवन का मकसद आनंद हैं। ईश्वर की सारीं योजनाएं मनुष्य जीवन एवं प्रकृति के समग्र जीवजंतुओं के हित के लिए ही हैं। ऋतुओं का बदलाव प्रकृति में बदलाव लाता हैं। और प्रकृति का फ़रमान हम सबके लिए होता हैं। हमारे मन पर उनकी गहरी छाप पड़ती हैं। हमारी सोच भी बदलती हैं। खानपान में भी काफी-कुछ बदलाव आते हैं। एक प्रकार की गति से दूसरे प्रकार की गति में जाना होता हैं। नई उर्जा से फिर एकबार हम भर जाते हैं।

हिंदु संस्कृति जीवन के आनंद और उल्लास की संस्कृति हैं। इसमें सबका समान अधिकार हैं। आनंद प्राप्ति की गति में कोई क्षति पैदा करना प्रकृति का ही अपमान कहलाता हैं। सबके आनंद को वंदन करता हूं।

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Monday, February 24, 2025

अद्भुत महाकुंभ २०२५
February 24, 2025 6 Comments

शाश्वत परंपरा का संयोग...!

भारत की सनातन हिन्दु धरोहर का साक्ष्य..!

माँ गंगा का अप्रतिम दुलार का उत्सव...महाकुंभ।

पंडित जगन्नाथ की उत्तम संस्कृत काव्य रचना 'गंगालहरी' के कुछ श्लोक पढ़ते हुए महाकुंभ की साक्ष्य अनुभूति करें...!

महाकुंभ 2025

पंडित जगन्नाथ सत्रहवीं सदी के एक प्रमुख भारतीय कवि, आलोचक व साहित्यशास्त्रकार एवं वैयाकरण थे। जगन्नाथ पंडित का जन्म एक तैलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पेरुभट्ट था। जगन्नाथ ने अपनी शिक्षा अपने विद्वान पिता से प्राप्त की और जल्द ही प्रतिभाशाली छात्र के रूप में उभरे। उन्होंने विभिन्न विषयों का अध्ययन किया, जिसमें साहित्य, दर्शन और व्याकरण शामिल थे।

जगन्नाथ पंडितने कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जिनमें रसगंगाधर, चित्रमीमांसाखंडन प्रमुख हैं। रसगंगाधर उनका सबसे प्रसिद्ध काम है, जो साहित्यशास्त्र का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें उन्होंने रस, भाव, और अलंकार जैसे विभिन्न साहित्यिक तत्वों का वर्णन किया है।

महैश्वर्यं लीला जनित जगतः "जगतउत्पन्ना" माँ गंगा को वंदन करते हुए।
"सुखं शेषे शेतां हरिः अविरतं नृत्यतु हरः।
सवित्री कामानां यदि जगति जागर्ति भवती॥"

भावार्थ: "यदि आप जगत में जागृत हैं और सबकी कामनाएँ पूर्ण कर रही हैं, तो भले ही ब्रह्मा समाधि में लीन रहें, विष्णु शेषनाग पर शयन करें, और शिव निरंतर नृत्य करें।

"सकल-कल्मष-ध्वंसिनी सुकृत-राशि-प्रवर्षिणी।
हिमाद्रि-हृदयागार-प्रकाशिनी शशांक-शेखर॥"

भावार्थ : "समस्त पापों का नाश करने वाली, पुण्यों की वर्षा करने वाली, हिमालय के हृदय में निवास करने वाली, चंद्रमा को धारण करने वाले भगवान शंकर की जटाओं में विहार करने वाली...माँ गंगा जीवों पर कृपा करने वाली और उन्हें भवसागर से पार लगानेवाली हैं। ऐसी ब्रह्मस्वरूपा भगवती भागीरथी गंगा माता पुण्यात्माओं द्वारा सेवित, पूजित, वंदित और अभिनंदित हैं।

माँ गंगा की इससे बेहतर बात मैं कैसे कर सकता हूँ। बस इतना कह सकता हूं। गंगा अनुभूति हैं..गंगा शीतल गोद हैं ! गंगा अलौकिक स्पर्श हैं, गंगा आशिर्वाद हैं। गंगा प्राण में चैतन्य का संचार हैं। गंगा उद्धार है, गंगा संसार की माँ हैं।

माँ गंगा के संगम तट पर सनातन संस्कृति का महा उत्सव होता हैं। उसे हम कुंभ के नाम से जानते हैं। गंगा-यमुना और लुप्त सरस्वती का संगम स्थान प्रयागराज हैं। इस वर्ष 144 बरस के बाद दिव्यकुंभ लगा हैं। ऐसा एक मत इसे विशेष बना रहा हैं। मकरसंक्रांति से लेकर माघ मास की महाशिवरात्रि तक चलने वाला ये महाकुंभ भारत की आध्यात्मिक धरोहर को प्रस्तुत करता हैं।

युगों से गंगा स्नान की परंपरा चली आ रही हैं। आज सोशल मिडिया एवं यातायात के साधन की सुविधा बढ़ी हैं। सहज पर्याप्तता के कारण कुंभ में लोगों की भीड बढ़ी है। व्यवस्था की आवश्यकता, भीड का नियंत्रण एवं मार्ग प्रबंधन जरुरी हो गया हैं। प्रशासन इसके उपर खरा उतरा या कुंभ का मनचाहा व्यवस्थापन हुआ इसके बारें में कुंभ के साक्षी अच्छा बयान दे सकते हैं।

धार्मिक आस्था को बढावा देना एक बात हैं। लेकिन धार्मिक आस्था में जीना दूसरी बात हैं। आध्यात्मिकता वृत्ति हैं, संवेदनात्मक अनुभूति हैं। उसको न फैलाया जाता है न रोका जा सकता हैं। इसके बारें में मूर्खता पूर्ण व्यवहार न करें तो ईश्वर खुश रहेंगे।

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Tuesday, February 4, 2025

Victory of Vasant..!
February 04, 2025 4 Comments

वसंत भारत की प्रसिद्ध छह ऋतुओं में से एक हैं। भारतीय वांग्मय के मनीषियों ने वसंत को ऋतुराज कहकर सम्मान दिया है। लेकिन महाकवि कालिदास की बात ही निराली हैं। महाकवि से प्रसिद्ध कालिदास प्रकृति वर्णन के संवेदनशील कवि थे। प्रकृति की वस्तुतः प्रस्तुति को हम 'छायावाद' से जानते हैं। छाया प्रकृति की आत्मा होती हैं। कालिदासजी 'छायावाद' के महारथी थे।


महाकवि की लगभग सभी कृतिय़ों में वसंत का अद्भुत वर्णन देखने को मिलता हैं। वसंत में प्रकृति की रमणीयता खिल उठती हैं। सृष्टि के सभी जीवों को तरबतर करती वसंत अपने साम्राज्य को स्थापित करती हैं। कवि कालिदास का प्रकृति काव्य 'ऋतुसंहार' का एक सुंदर श्लोक लिखते हुए मैं भी आनंदित हूँ।

प्रफुल्लचूतांकुरतीक्ष्णसायको द्विरेफमाला विलसद्वनुर्गुण:।
मनांसिमेत्तं सुरतप्रसंगिऩां वसन्तयोद्धा समुपागत: प्रिये ।। (६.१ ऋतुसंहार)

"हे प्रिय ! आम्र की मंजरियों के तीखे बाण के साथ तथा अपने पुष्पधनुष पर भ्रमर-पंक्तियों की प्रत्यंचा चढ़ाकर सुरतप्रेमी रसिकों के हृदय बेधने के लिए वसंत योद्धा की तरह आ पहुंचा हैं।"

                             Picture by Wikipedia. Artwork by Raja Ravi Varma 

यहां वसंत को योद्धा कहा गया हैं। लेकिन ये योद्धा कोई युद्ध के लिए नहीं हैं। हृदय को बंधक बनानेवाला युद्ध हैं। पुष्पधनुष के ऊपर हारबंध भ्रमरों की प्रत्यंचा की कल्पना कालिदास ही कर सकते हैं। 'कुमारसंभवम्' में शिव को मोहित करने के लिए स्वयं कामदेव वसंत का माहौल खड़ा करते हैं। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' तो पूरा नाटक होते हुए भी 'प्रकृतिकाव्य' बन गया हैं। कविवर कालिदासजी की ये बेहरिन कल्पनाएं हैं। प्रकृति के संमोहन को महसूस करते हुए उत्तम रुपको का प्रयोग करते हैं। संस्कृत काव्यशास्त्र में उपमा प्रयोजना तो कालिदास की ही, इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। इसी कारण 'उपमा कालिदास्य' का बहुमान कालिदास को मिला था। कालिदास हमारी देवभाषा संस्कृत का गौरव हैं।

वसंत सृष्टि में नवसंचार- नवसंचरण- नवोत्साह के लिए प्रगट होती हैं। प्रकृति के रंगो की बौछार हमारी नज़र में भी छा जाती हैं। वातावरण में अनोखी खुश्बू और तरुवर का नवपल्लवन, फूलों की तो बात ही क्या करें ? धरती में रंगो का उत्सव छाने लगता हैं। यह परिवर्तन सब देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। कोई पागलपन से इस नूतन बदलाव में नाचते हुए अपने जीवन को आनंद से भर देता हैं। कोई इसके स्पर्श से काफ़ी दूर रहता हैं। अपने जीवन को अपने ही घोंसले में बंद करते हुए..! अपने प्रगटन को दबाकर या फिर अपने जीवन की संकुचित गोलाकार दुनिया सजाता हुआ..! उस में वो कायम अकेला ही रहता हैं।

बसंत तो मिलन हैं, बसंत एकाकार होने का अवसर हैं। बसंत की सदाबहार संवृत्ति में जीना होगा। नये पन्नों को प्यार से सहलाना होगा। पुष्पो की रंगभरी दुनिया में कूद पड़ना होगा। वसंत को दिलों-जान से अंगीकृत करना होगा। बसंत ही कुदरत के दृश्यरुप आशिर्वाद हैं। जो कोई इन्सान वसंत की मदहोशी को महसूस कर सकता है, वो ईश्वर की अपार शक्ति का स्वीकार करते हुए मस्त रहेगा। जो कुछ हो रहा हैं, उसका सहज स्वीकार करता रहेगा। अपनी खुशियाँ का आनंद ले पाएगा और पीड़ाओं का समाधान ढूँढ पाएगा।

वसंत के आक्रमण जैसा माहौल खड़ा हो जाता हैं। कालिदास ने इसी कारण वसंत को योद्धा कहा हैं। लेकिन इस आक्रमण में परास्त होना ही आनंद हैं। यहाँ 'प्रकृतिजय' हैं, 'वसंतविजय' हैं। इनमें हारने की हरक़त हमें काफ़ी कुछ दे सकती हैं। हैं ना कालिदासजी !?

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Tuesday, January 28, 2025

If a human being stays focused the universe..!
January 28, 2025 7 Comments


"मैं चाहता हूँ कि आप किसी चीज़ पर ध्यान केंद्रित करें, चाहे वह कोई भी चीज़ हो, क्योंकि अगर कोई इंसान ध्यान केंद्रित रखता है, तो ब्रह्मांड उसे स्वीकार कर लेता है।"

● सद्गुरु

ध्यान एक क्रिया हैं। जीवन की अद्भुत क्रिया हैं। ध्यान के दो पहलू हैं। ध्यान का लगना और ध्यान का भटकना। दोनों की संभवना बराबर हैं। वैसे तो भटका हुआ ध्यान भी कहीं तो लगता ही हैं। इसलिए हम ये भी नहीं कह सकते। आज इस ध्यान को एक ही पहलू से समझे। ध्यान लगना एक सहज और स्वाभाविक घटना हैं। हां एक बात से सहमत होना पड़ेगा कि ध्यान किस बात पर टिकता हैं।


सृष्टि के उपर भी ब्रह्मांड हैं। पृथ्वी जैसे अनेक ग्रह विद्यमान हैं। साथ खगोलिय विज्ञान तो आकाशगंगा की बात करता हैं। जिसमें लाखों करोडों ग्रह हैं। हमारे ज्ञान की मर्यादा हैं कि हम ब्रह्मांड को समझ सके। बस ब्रह्मांड की शक्तिओं का विचार करें। ब्रह्मांड असीमित शक्तिओं का भंडार हैं। इन सारी शक्तिओं का अदृश्य नियमन हो रहा है, उस नियंता को हम ईश्वर के रुप में जानते हैं।

सद्गुरु जैसे महान आत्मा हमें सरलता से ध्यान प्रक्रिया सिखाते हैं। उनका मार्गदर्शन हमें भी अपने कार्यो में सफल बनाने के लिए सक्षम हैं। यदि हमारा ध्यान वैयक्तिक प्राप्ति की ओर लगता हैं, तो सहज ही उसे हासिल कर सकते हैं। इससे उपर समष्टिगत हित के उपर ध्यान करेंगे तो वो बड़ी ताक़त से पूरा होगा। क्योंकि ब्रह्माण्डीय शक्ति हमें देने के लिए तैयार हैं। हमारें ध्यान का परिशीलन ब्रह्मांड की शक्ति का आकर्षण बनता हैं। मैं इसे कृपा कहता हूँ...ये ब्रह्मांड के आशीर्वाद हैं। इसको एक सीधी बात से समझने का प्रयास करें। कोई सामान्य परिवार एवं ज्ञाति का व्यक्ति, जिनके पास जीवन को विकसित करने के पर्याप्त भौतिक-आर्थिक साधनों की अपर्याप्तता हैं। वो अपनी निजी ध्यान प्रक्रिया से कुछ पाने का जज्बा मन में पालता हैं। कोई विशेष प्राप्ति करता हैं। समाज में सम्मान की भावना पैदा हो जाती हैं। ऐेसे कईं उदाहरण हमारे सामने मौजूद होंगे।

ऐसा होने के कईं कारण हैं। इसमें सबसे पहला कारण तिरस्कार है, अवहेलना हैं, अपर्याप्तता हैं। ये व्यक्ति में कुछ कर दिखाने की चिड़न पैदा करती हैं। तब ध्यान की क्रिया सहज कार्यान्वित होती हैं। उठते बैठते बस कुछ ख़यालात उनके साथ विकसित हो जाते हैं। फिर विचार एक स्वप्न का रुप धारण करते हैं। दिन-रात वो स्वप्न व्यक्ति को जागृत करता रहता है। और रास्ते भी खुदबखुद आकारित होते हैं। ये सब ब्रह्मांड की असीम कृपा के कारण होता रहता हैं।

मनुष्य के रुप में इसपर सबका अधिकार हैं। ईश्वरीय वरदान सब के लिए समान हैं। कोई ध्यान को समझने का प्रयास करता हैं। कोई ध्यान को जीने का प्रयास करता हैं। मगर ध्यान भीतर में उठती आग की तरह हैं। एकबार ये आग प्रज्जवलित हो गई फिर उसे रोकना नामुमकिन हैं। वो अपना रास्ता खुदबखुद तय कर लेगी। जैसे River finds a way...मैं कहना चाहता हूँ...life finds a way..! हम सबने देखा हैं, कोई इन्सान संघर्षकाल में जाता हैं। वो ध्यानस्थ होकर अपने कार्य में झुट जाता हैं। एक नया मुकाम तय होता हैं। एक नई मंजिल की दौड़ कायम होती हैं। एक स्वप्न हकीक़त बनने का रास्ता तय करता हैं। कुछ नया आकारित होता हैं। सफलता शोर मचाती हैं। स्वीकार, प्रशंसा, मान-मर्तबा, इनाम-अकराम जैसे शब्द साज़ सामने लगते हैं। ध्यान की क्रिया का फल एक उत्सव बन जाता हैं।

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Monday, January 20, 2025

Everything is under your control...SENECA.
January 20, 2025 4 Comments

 "सबकुछ आपके नियंत्रण में हैं !"


लुसियस एनियस सेनेका (४ ईसापूर्व- ६५ इसवी) रोमन स्टोइक दार्शनिक, नाटककार और लेखक थे। ये लॅटिन भाषा के रजत युग के लेखक माने जाते है। सबसे अच्छे दौर के व्यंग्यकार माने जाते हैं। सेनेका द यंगर, फिलॉसफर थे साथ बहतरीन राजनेता भी थे।

"सभी लोगों में से केवल वे ही फुर्सत में होते हैं जो दर्शन के लिए समय निकालते हैं, केवल वे ही सही मायने में जीते हैं। केवल अपने दिनों पर अच्छी नज़र रखने से संतुष्ट नहीं, वे हर युग को अपने साथ जोड़ लेते हैं। अतीत की सारी फसल उनके भंडार में जुड़ जाती है।" - द ग्रेट सेनेका


कई बार ऐेसे कुछ शब्द सुनने में आते हैं। फिर लंबी खोज में निकलना पडता हैं। स्थितप्रज्ञ अवस्था लग जाती है, पूरे दिन तक पागलपन सवार होते रहता हैं। और लुसियस एनियस सेनेका पढ़ने में आ जाते हैं। मन खुशहाल हो जाता हैं। फिर मन होता हैं, चलों इसे शब्दरुप देकर आप सब में बाँट दे। और ब्लोग का लेखन शुरु हो जाता हैं। निमित्त मात्र का आनंद प्रयास हैं। ठीक लगे तो, थोड़ीदेर मन की नज़र इन विचारों पर स्थिर करें। आनंद मिले तो "द ग्रेट सेनेका" को सलाम कर देना।

हममें से जो लोग वास्तविक दुनिया में अपना जीवन जीते हैं, उनके लिए दर्शन की एक शाखा बनाई गई है, "स्टोइकिज़्म"।  यह दर्शन हमें अधिक लचीला, अधिक खुश, अधिक गुणी और अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए बनाया गया है - और परिणामस्वरूप बेहतर इंसान, बेहतर माता-पिता और बेहतर पेशेवर बनाता है।

लुसियस एनियस सेनेका की अद्भूत फिलासफी इन दस वाक्य में देखे:

1) जहां तक हो सके खुद के साथ रहें, या ऐसे लोगों के साथ रहें जिससे आप कुछ सीख सकते हैं, अपने अंदर सुधार ला सकते हैं।
2) किसी समस्या का सबसे जरूरी पहलू उसका हल नहीं है। हल निकालते हुए जो ताकत मिलती है, वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
3) ऐसा नहीं है कि चीजें मुश्किल हैं, इसलिए हम हिम्मत नहीं करते। हम हिम्मत नहीं करते इसलिए की चीजें मुश्किल लगती हैं।
4) या तो रास्ता तलाशिए या खुद बनाइए।
5) सब आपके नियंत्रण में है। आप चीजों को आसान बना सकते हैं या मुश्किल या हास्यास्पद। चुनाव तो आपका ही होता है।
6) हम असलियत में कम, काल्पनिक रूप से ज्यादा दु:खी रहते हैं।
7) उस व्यक्ति से ज्यादा बदकिस्मत कोई नहीं जिसने कभी तकलीफ नहीं झेली। क्योंकि उसके पास खुद को आज़माने का साहस ही नहीं था।
8) आपने किसी को कुछ दिया है तो शांत रहें, लेकिन किसी ने आपको कुछ दिया है तो जरूर जिक्र करें।
9) डरते हुए पूछने वाले को अक्सर ना सुननी पड़ती है।
10) अपना सर्वश्रेष्ठ दें...वर्तमान का मजा लें और जो है उसमें ही खुश रहें। (स्रोत विकिपीडिया)

बस आज इतना ही, पढ़ें और नियंत्रित हो। जो हमारे नियंत्रण में उसका विचार करें। जो नियंत्रण से परे हैं उसका विचार करके निराश न हो।

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Wednesday, January 15, 2025

Way of love life..!
January 15, 2025 7 Comments

 SADGURU is called....

"If you are in love So it will guide you on the path of life. love has its own intelligence."
"अगर आपके दिल में प्रेम हैं। तो यह जीवन की पगदंडी पर आपका मार्गदर्शन करेगा। प्रेम की अपनी बुद्धि होती हैं।"

प्रेम की फिलासफी बहुत गहरी हैं। कईं महान विभूतियों ने प्रेम के बारें में अपना अभिप्राय दिया हैं। सबकी बात में दम हैं। कृष्ण की 'प्रेमवाणी' तो सबसे बेहतर हैं। सद्गुरु की बात में अचरज और सुंदरता देखें...प्रेम की अपनी बुद्धि होती हैं। मतलब, प्रेम बुद्धि में भी अग्रिम हैं। सृष्टि का सबसे सुंदर व्यवहार प्रेम हैं, जीवन की उत्तम गति भी प्रेम हैं। जीवन का उत्कृष्ठ आनंद ही प्रेम हैं।


एक सुंदर कथा कहता हूं। संत कबीरजी और उनकी पत्नी लाली का गृहस्थाश्रम अत्यंत प्रेम भरा रहा था। एक दिन एक व्यक्ति कबीरजी को मिलने आता हैं। मिलने का प्रयोजन भी था। वो कबीरजी को पूछता हैं, "मैं गृहस्थ जीवन की शुरुआत करना चाहता हूं। इसलिए मुझे कैसा जीवनसाथी चाहिए आप उसका मार्गदर्शन करें।"
कबीरजी यह बात सुनकर उसको अपने घर ले जाते हैं। पत्नी को आवाज लगाई, "खाने में क्या है ?"
उनकी पत्नी लाली ने कहा: "केवल चावल हैं।"
कबीरजी ने कहा: "परोस दिजीए।"
दोनों व्यक्ति खाना खाने के लिए बैठे। थाली में चावल आए। चावल आने पर कबीरजी बोले: "चावल बहुत गरम है, उसे ठंडा करो।"
लाली चावल ठंडा करने लगी। वो व्यक्ति आश्चर्य में पड़ गया, चावल एकदम ठंडे थे फिर भी कबीरजी ने ऐसा क्यो किया ?

फिर कबीरजी अपनी बुनाई के स्थान पर गए। सब जानते हैं, कबीरजी कपड़ा बुनने का काम करते थे। वो व्यक्ति भी साथ में था। दिन का समय था, चौतरफ उजियारा था। फिर भी कबीरजी ने अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई : "सुनती हो क्या ? मुझे सूई में धागा पिरोना है, जरा चिराग जलाओ।"
पत्नी लाली कुछ भी कहे बिना चिराग जलाकर लाई। वो आदमी एकदम सुन्न हो गया। और कहने लगा : "कबीरजी मैं अपने जीवन के बारें में सलाह लेने आया हूं। मुझे कुछ तो बताईए ?"
कबीरजी ने उत्तर दिया: "यहां जो कुछ देखा, इसका अचरज न हो और सब काम सहजता से हो जाए...ऐसी कोई मिले तो उससे घर बसालो।"

कबीरजी की बानी मार्मिक थी। लेकिन उनकी पत्नी लाली के व्यवहार में नितांत प्रेम था। कोई भी सवाल किए बिना केवल वहां अनुसरण था। शायद उन दोनों की 'अन्डरस्टेन्डींग' थी। उन्होंने कहा है, तो कोई मतलब होगा। ऐसा कोई अटूट विश्वास था उनकी पत्नी को...या समर्पण की मर्यादा थी !?

सद्गुरु के शब्द यहाँ सच होते दिखाई देते हैं। कबीरजी ने प्रेम को जीया हैं। उनके जीवन की पगदंडी में उनका मार्गदर्शन प्रेम ने किया था। वो बुद्धि से परे प्रेम की अनुभूति करने के लिए समर्थ थे। इसलिए वो एक बानी में कहते हैं;
"पोथी पढ़कर जग मुआ, पंडित क्या न कोई।
ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े जो पंडित होई।"

प्रेम में बुद्धि की जरुरत ही नहीं होती। लेकिन प्रेम की अपनी बुद्धि होती हैं। प्रेम की बुद्धि मतलब स्वीकार, समर्पण ओर श्रद्धा। जिसके साथ जीना है, उसका संपूर्ण स्वीकार करना। उसके आगे सब न्योछावर और उसके उपर अटूट विश्वास ये प्रेम हैं। love has its own intelligence. शायद यह समझना आपके लिए मुश्किल न होगा। अगर आपके जीवन की पगदंडी प्रेम से भरपूर है तो...
you are on the right way of life...!

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રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠનો અવસર...!

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...! 'રજતમિલન' એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં,  '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' ...

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