Dr.Brieshkumar Chandrarav

Tuesday, January 28, 2025

If a human being stays focused the universe..!
January 28, 2025 7 Comments


"मैं चाहता हूँ कि आप किसी चीज़ पर ध्यान केंद्रित करें, चाहे वह कोई भी चीज़ हो, क्योंकि अगर कोई इंसान ध्यान केंद्रित रखता है, तो ब्रह्मांड उसे स्वीकार कर लेता है।"

● सद्गुरु

ध्यान एक क्रिया हैं। जीवन की अद्भुत क्रिया हैं। ध्यान के दो पहलू हैं। ध्यान का लगना और ध्यान का भटकना। दोनों की संभवना बराबर हैं। वैसे तो भटका हुआ ध्यान भी कहीं तो लगता ही हैं। इसलिए हम ये भी नहीं कह सकते। आज इस ध्यान को एक ही पहलू से समझे। ध्यान लगना एक सहज और स्वाभाविक घटना हैं। हां एक बात से सहमत होना पड़ेगा कि ध्यान किस बात पर टिकता हैं।


सृष्टि के उपर भी ब्रह्मांड हैं। पृथ्वी जैसे अनेक ग्रह विद्यमान हैं। साथ खगोलिय विज्ञान तो आकाशगंगा की बात करता हैं। जिसमें लाखों करोडों ग्रह हैं। हमारे ज्ञान की मर्यादा हैं कि हम ब्रह्मांड को समझ सके। बस ब्रह्मांड की शक्तिओं का विचार करें। ब्रह्मांड असीमित शक्तिओं का भंडार हैं। इन सारी शक्तिओं का अदृश्य नियमन हो रहा है, उस नियंता को हम ईश्वर के रुप में जानते हैं।

सद्गुरु जैसे महान आत्मा हमें सरलता से ध्यान प्रक्रिया सिखाते हैं। उनका मार्गदर्शन हमें भी अपने कार्यो में सफल बनाने के लिए सक्षम हैं। यदि हमारा ध्यान वैयक्तिक प्राप्ति की ओर लगता हैं, तो सहज ही उसे हासिल कर सकते हैं। इससे उपर समष्टिगत हित के उपर ध्यान करेंगे तो वो बड़ी ताक़त से पूरा होगा। क्योंकि ब्रह्माण्डीय शक्ति हमें देने के लिए तैयार हैं। हमारें ध्यान का परिशीलन ब्रह्मांड की शक्ति का आकर्षण बनता हैं। मैं इसे कृपा कहता हूँ...ये ब्रह्मांड के आशीर्वाद हैं। इसको एक सीधी बात से समझने का प्रयास करें। कोई सामान्य परिवार एवं ज्ञाति का व्यक्ति, जिनके पास जीवन को विकसित करने के पर्याप्त भौतिक-आर्थिक साधनों की अपर्याप्तता हैं। वो अपनी निजी ध्यान प्रक्रिया से कुछ पाने का जज्बा मन में पालता हैं। कोई विशेष प्राप्ति करता हैं। समाज में सम्मान की भावना पैदा हो जाती हैं। ऐेसे कईं उदाहरण हमारे सामने मौजूद होंगे।

ऐसा होने के कईं कारण हैं। इसमें सबसे पहला कारण तिरस्कार है, अवहेलना हैं, अपर्याप्तता हैं। ये व्यक्ति में कुछ कर दिखाने की चिड़न पैदा करती हैं। तब ध्यान की क्रिया सहज कार्यान्वित होती हैं। उठते बैठते बस कुछ ख़यालात उनके साथ विकसित हो जाते हैं। फिर विचार एक स्वप्न का रुप धारण करते हैं। दिन-रात वो स्वप्न व्यक्ति को जागृत करता रहता है। और रास्ते भी खुदबखुद आकारित होते हैं। ये सब ब्रह्मांड की असीम कृपा के कारण होता रहता हैं।

मनुष्य के रुप में इसपर सबका अधिकार हैं। ईश्वरीय वरदान सब के लिए समान हैं। कोई ध्यान को समझने का प्रयास करता हैं। कोई ध्यान को जीने का प्रयास करता हैं। मगर ध्यान भीतर में उठती आग की तरह हैं। एकबार ये आग प्रज्जवलित हो गई फिर उसे रोकना नामुमकिन हैं। वो अपना रास्ता खुदबखुद तय कर लेगी। जैसे River finds a way...मैं कहना चाहता हूँ...life finds a way..! हम सबने देखा हैं, कोई इन्सान संघर्षकाल में जाता हैं। वो ध्यानस्थ होकर अपने कार्य में झुट जाता हैं। एक नया मुकाम तय होता हैं। एक नई मंजिल की दौड़ कायम होती हैं। एक स्वप्न हकीक़त बनने का रास्ता तय करता हैं। कुछ नया आकारित होता हैं। सफलता शोर मचाती हैं। स्वीकार, प्रशंसा, मान-मर्तबा, इनाम-अकराम जैसे शब्द साज़ सामने लगते हैं। ध्यान की क्रिया का फल एक उत्सव बन जाता हैं।

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Monday, January 20, 2025

Everything is under your control...SENECA.
January 20, 2025 4 Comments

 "सबकुछ आपके नियंत्रण में हैं !"


लुसियस एनियस सेनेका (४ ईसापूर्व- ६५ इसवी) रोमन स्टोइक दार्शनिक, नाटककार और लेखक थे। ये लॅटिन भाषा के रजत युग के लेखक माने जाते है। सबसे अच्छे दौर के व्यंग्यकार माने जाते हैं। सेनेका द यंगर, फिलॉसफर थे साथ बहतरीन राजनेता भी थे।

"सभी लोगों में से केवल वे ही फुर्सत में होते हैं जो दर्शन के लिए समय निकालते हैं, केवल वे ही सही मायने में जीते हैं। केवल अपने दिनों पर अच्छी नज़र रखने से संतुष्ट नहीं, वे हर युग को अपने साथ जोड़ लेते हैं। अतीत की सारी फसल उनके भंडार में जुड़ जाती है।" - द ग्रेट सेनेका


कई बार ऐेसे कुछ शब्द सुनने में आते हैं। फिर लंबी खोज में निकलना पडता हैं। स्थितप्रज्ञ अवस्था लग जाती है, पूरे दिन तक पागलपन सवार होते रहता हैं। और लुसियस एनियस सेनेका पढ़ने में आ जाते हैं। मन खुशहाल हो जाता हैं। फिर मन होता हैं, चलों इसे शब्दरुप देकर आप सब में बाँट दे। और ब्लोग का लेखन शुरु हो जाता हैं। निमित्त मात्र का आनंद प्रयास हैं। ठीक लगे तो, थोड़ीदेर मन की नज़र इन विचारों पर स्थिर करें। आनंद मिले तो "द ग्रेट सेनेका" को सलाम कर देना।

हममें से जो लोग वास्तविक दुनिया में अपना जीवन जीते हैं, उनके लिए दर्शन की एक शाखा बनाई गई है, "स्टोइकिज़्म"।  यह दर्शन हमें अधिक लचीला, अधिक खुश, अधिक गुणी और अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए बनाया गया है - और परिणामस्वरूप बेहतर इंसान, बेहतर माता-पिता और बेहतर पेशेवर बनाता है।

लुसियस एनियस सेनेका की अद्भूत फिलासफी इन दस वाक्य में देखे:

1) जहां तक हो सके खुद के साथ रहें, या ऐसे लोगों के साथ रहें जिससे आप कुछ सीख सकते हैं, अपने अंदर सुधार ला सकते हैं।
2) किसी समस्या का सबसे जरूरी पहलू उसका हल नहीं है। हल निकालते हुए जो ताकत मिलती है, वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
3) ऐसा नहीं है कि चीजें मुश्किल हैं, इसलिए हम हिम्मत नहीं करते। हम हिम्मत नहीं करते इसलिए की चीजें मुश्किल लगती हैं।
4) या तो रास्ता तलाशिए या खुद बनाइए।
5) सब आपके नियंत्रण में है। आप चीजों को आसान बना सकते हैं या मुश्किल या हास्यास्पद। चुनाव तो आपका ही होता है।
6) हम असलियत में कम, काल्पनिक रूप से ज्यादा दु:खी रहते हैं।
7) उस व्यक्ति से ज्यादा बदकिस्मत कोई नहीं जिसने कभी तकलीफ नहीं झेली। क्योंकि उसके पास खुद को आज़माने का साहस ही नहीं था।
8) आपने किसी को कुछ दिया है तो शांत रहें, लेकिन किसी ने आपको कुछ दिया है तो जरूर जिक्र करें।
9) डरते हुए पूछने वाले को अक्सर ना सुननी पड़ती है।
10) अपना सर्वश्रेष्ठ दें...वर्तमान का मजा लें और जो है उसमें ही खुश रहें। (स्रोत विकिपीडिया)

बस आज इतना ही, पढ़ें और नियंत्रित हो। जो हमारे नियंत्रण में उसका विचार करें। जो नियंत्रण से परे हैं उसका विचार करके निराश न हो।

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Wednesday, January 15, 2025

Way of love life..!
January 15, 2025 7 Comments

 SADGURU is called....

"If you are in love So it will guide you on the path of life. love has its own intelligence."
"अगर आपके दिल में प्रेम हैं। तो यह जीवन की पगदंडी पर आपका मार्गदर्शन करेगा। प्रेम की अपनी बुद्धि होती हैं।"

प्रेम की फिलासफी बहुत गहरी हैं। कईं महान विभूतियों ने प्रेम के बारें में अपना अभिप्राय दिया हैं। सबकी बात में दम हैं। कृष्ण की 'प्रेमवाणी' तो सबसे बेहतर हैं। सद्गुरु की बात में अचरज और सुंदरता देखें...प्रेम की अपनी बुद्धि होती हैं। मतलब, प्रेम बुद्धि में भी अग्रिम हैं। सृष्टि का सबसे सुंदर व्यवहार प्रेम हैं, जीवन की उत्तम गति भी प्रेम हैं। जीवन का उत्कृष्ठ आनंद ही प्रेम हैं।


एक सुंदर कथा कहता हूं। संत कबीरजी और उनकी पत्नी लाली का गृहस्थाश्रम अत्यंत प्रेम भरा रहा था। एक दिन एक व्यक्ति कबीरजी को मिलने आता हैं। मिलने का प्रयोजन भी था। वो कबीरजी को पूछता हैं, "मैं गृहस्थ जीवन की शुरुआत करना चाहता हूं। इसलिए मुझे कैसा जीवनसाथी चाहिए आप उसका मार्गदर्शन करें।"
कबीरजी यह बात सुनकर उसको अपने घर ले जाते हैं। पत्नी को आवाज लगाई, "खाने में क्या है ?"
उनकी पत्नी लाली ने कहा: "केवल चावल हैं।"
कबीरजी ने कहा: "परोस दिजीए।"
दोनों व्यक्ति खाना खाने के लिए बैठे। थाली में चावल आए। चावल आने पर कबीरजी बोले: "चावल बहुत गरम है, उसे ठंडा करो।"
लाली चावल ठंडा करने लगी। वो व्यक्ति आश्चर्य में पड़ गया, चावल एकदम ठंडे थे फिर भी कबीरजी ने ऐसा क्यो किया ?

फिर कबीरजी अपनी बुनाई के स्थान पर गए। सब जानते हैं, कबीरजी कपड़ा बुनने का काम करते थे। वो व्यक्ति भी साथ में था। दिन का समय था, चौतरफ उजियारा था। फिर भी कबीरजी ने अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई : "सुनती हो क्या ? मुझे सूई में धागा पिरोना है, जरा चिराग जलाओ।"
पत्नी लाली कुछ भी कहे बिना चिराग जलाकर लाई। वो आदमी एकदम सुन्न हो गया। और कहने लगा : "कबीरजी मैं अपने जीवन के बारें में सलाह लेने आया हूं। मुझे कुछ तो बताईए ?"
कबीरजी ने उत्तर दिया: "यहां जो कुछ देखा, इसका अचरज न हो और सब काम सहजता से हो जाए...ऐसी कोई मिले तो उससे घर बसालो।"

कबीरजी की बानी मार्मिक थी। लेकिन उनकी पत्नी लाली के व्यवहार में नितांत प्रेम था। कोई भी सवाल किए बिना केवल वहां अनुसरण था। शायद उन दोनों की 'अन्डरस्टेन्डींग' थी। उन्होंने कहा है, तो कोई मतलब होगा। ऐसा कोई अटूट विश्वास था उनकी पत्नी को...या समर्पण की मर्यादा थी !?

सद्गुरु के शब्द यहाँ सच होते दिखाई देते हैं। कबीरजी ने प्रेम को जीया हैं। उनके जीवन की पगदंडी में उनका मार्गदर्शन प्रेम ने किया था। वो बुद्धि से परे प्रेम की अनुभूति करने के लिए समर्थ थे। इसलिए वो एक बानी में कहते हैं;
"पोथी पढ़कर जग मुआ, पंडित क्या न कोई।
ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े जो पंडित होई।"

प्रेम में बुद्धि की जरुरत ही नहीं होती। लेकिन प्रेम की अपनी बुद्धि होती हैं। प्रेम की बुद्धि मतलब स्वीकार, समर्पण ओर श्रद्धा। जिसके साथ जीना है, उसका संपूर्ण स्वीकार करना। उसके आगे सब न्योछावर और उसके उपर अटूट विश्वास ये प्रेम हैं। love has its own intelligence. शायद यह समझना आपके लिए मुश्किल न होगा। अगर आपके जीवन की पगदंडी प्रेम से भरपूर है तो...
you are on the right way of life...!

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Friday, December 27, 2024

अहा ! जिन्दगी !
December 27, 2024 4 Comments

Life is a collection of moments.

जीवन क्षणों का संग्रह है ! सुंदर लम्हों भरा आशियाना! 

जीवन बड़ी ख़ूबसूरत घटना हैं। मानो तो आनंद, न समझो तो पीड़ा। जन्म से लेकर मृत्यु की घटना तक जो कुछ घटित होता है, उसे हम जीवन कहते हैं। जन्म के थोड़े समय तक भाषा के साथ मशक्कत करनी पडती हैं। 'माँ' शब्द को समझकर, अनुभूत करके हम दूसरें कईं शब्दों के संपर्क में आते हैं। साथ कईं लोगो का संपर्क भी होता रहता हैं। हम उनसे संबंध बनाते हैं। किसी के साथ गहराई बढ़ जाती हैं। उसे हम प्रेम कहें तो गलत बिल्कुल नहीं हैं। परिवार,स्नेहीजन,सहकर्मी,समाज जैसे कईं दायरे हमें बांधते हैं। हम एक सामाजिक प्राणी के तौर पर स्थापित हो जाते हैं। ये है हमारे जीवन की सर्वसामान्य तवारीख..! सबकी अपनी अपनी फिर भी एक जैसी..! सैद्धांतिक रुप से ये समान है लेकिन संपर्क में आने वाले पात्र और परिवेश अलग हो सकते हैं। उससे हम अलग पड़ते हैं।

Drworldpeace

जिंदगी में मिलनेवाले लोग, अच्छी बूरी क्षणों को लेकर हम से झुड जाते हैं। हमारे इस स्मृति संग्रह से हमारी संवेदनाएं झुडी होती हैं। जीवन की सुखमय दु:खमय घटना जो हमारी स्मृतिओं में संग्रहीत हैं, वो अमूल्य है। उससे तो जिंदगी जीने लायक लगती हैं। ज़िंदगी का आह्लाद इसपर टिका हैं। जिंदगी का आनंद इसपर टिका हैं। जिंदगी की सफलताएँ भी इसपर ही निर्भर होती हैं। 'स्वीट मेमोरी' जीवन के आधार रुप हैं। इस ब्लोग में मैं 'स्वीट' नहीं ऐसी बातों का ज़िक्र नहीं करुंगा। अच्छी बातें जो मेरे और आपमें संग्रहित है, उसे छेडने का काम करुंगा। शायद ये सबके लिए अच्छा होगा।

अहा ! जिंदगी ! मैं बहुत खुश था, जब तेरे साथ घंटो खेला करते थे। साथ बातों का तो क्या कहना ? थकते नहीं थे। परेशान तब होते थे, जब हम दूर होते थे। वो रात भी बड़ी लंबी हो जाती थी...जिसमें तुम न हो। उम्र बढ़ती रही 'हम तुम से आप' होने लगे। शरीर भी लंबा होने लगा। फिर मिलने की क्षणों में गिरावट आने लगी। तुम ईस शहर में उस शहर में पढने लगा। फिर बसने की तो बात ही अलग थी। यादों में तुम थे, वैसे ही थे जैसे थे। खाने-पीने की लज्जत, घूमने-फिरने की स्वतंत्रता हमें किसने दी थी ? आज भी खोज नहीं पाए। लेकिन आज जो बंधन में जी रहे हैं, वो भी किसने डाले हैं पता नहीं चलता। आज सबके करने लिए मन हैं, लेकिन समय रोक लगाता रहा हैं। ऐसी कुछ बातें आप भी याद करें...ब्लोग पढ़ते-पढ़ते..!

यादें भी यादें है..! तेरा समय-समय पर रुठना, मेरा मनाने का पागलपन..!दोनों को एक दूसरे को मानने तैयार रहते मगर मानते नहीं। तमन्नाएं पालना और उसे सहलाना भी जिंदगी हैं..! आज कल होती, समय यूंही कहता रहता। शरीर पर समय की रेखाएँ स्पष्ट होने लगी हैं, मगर हम वैसे के वैसे..! आज भी मिलन की आस को संभाले हुए हैं। आकाश से कभी-कभार मनभर बातें होती रहती हैं। चाँदनी तो शीतलता से इतना भर देती की यादें खुदबखुद बहार आती रहती। यादों का खेल दुनिया का सबसे सुंदर खेल हैं। इसमें एक अकेला कईंओं के साथ खेलता रहता हैं। जीत और हार दोनों एक तरफ ही रहती हैं। यादें कभी हार मानती है भला..!?

अहा ! जिन्दगी ! तुम कितनी सुंदर हो ! और नहीं भी हो, तो भी सबको सुंदर लगती हो। जैसे अपनी-अपनी जिंदगी ! अपनी ख्वाहिशें अपने सपनें ! अपनी अपनी यादों के संदूक..! इस में कोई He और She भी होता हैं। कोई जाना पहेचाना, कोई अनजाना भी होता हैं। यादें बड़ी सुंदर चीज है मगर एक प्रोब्लम है उसमें...जो जरुरी है वो Delete नहीं होती। और जो यादें ही न बने, वो जरुरी भी कैसे ?

लंबे समय के बाद फिर ब्लोग लिख रहा हूं। ये भी समय के खेल के मुताबिक..!

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Tuesday, November 26, 2024

THE LOVE ❤️
November 26, 2024 4 Comments

"Love cannot be explained,

yet it explains all." Elif Shafak.

"प्यार को समझाया नहीं जा सकता,
फिर भी यह सब समझाता है।"

एलिफ़ शफ़क का बिलगिन; जन्म 25 अक्टूबर 1971) एक तुर्की-ब्रिटिश उपन्यासकार, निबंधकार, सार्वजनिक वक्ता, राजनीतिक वैज्ञानिक और कार्यकर्ता हैं। उनका अंग्रेजी- तुर्की भाषा पर प्रभुत्व हैं। उनकी स्पेनिश शिक्षा मिडल ईस्ट टेकनिकल यूनिवर्सिटि में हुई थी। अवधि 1990. तुर्की और अंग्रेजी में वो लिखती हैं। उन्होंने 21 किताबें प्रकाशित की हैं। वह अपने उपन्यासों के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं। जिनमें 'द बास्टर्ड ऑफ इस्तांबुल' 'द फोर्टी रूल्स ऑफ लव''थ्री डॉटर्स ऑफ ईव'और'10 मिनट्स 38 सेकेंड्स इन दिस स्ट्रेंज वर्ल्ड'शामिल हैं।  www.elifshafak.com


चलों, वर्ल्ड बेस्ट महिला की बेस्ट बात को आगे ले जाएँ। जब कोई पागलपन की अनुभूति में जाकर लिखता है, और किसी भी तरह की मलिनता से दूर जाकर लिखता है वो लिखा हुआ मन को छूता हैं। उनका एक-एक शब्द और वाक्य भी दिल को छू लेता हैं। ये कोई तपस्या से कम नहीं। एलिफ़ शफ़क को प्यार भरा नमन..!

प्यार की बात करना सबके बस की बात नहीं हैं। और प्यार को लिखना तो और मुश्किल काम हैं। वैसे तो प्यार एक अहसास हैं, अनुभूति हैं। प्यार को समझाया नहीं जाता। वो खूद समझ जाता हैं। प्यार में दो की कल्पना ही नहीं कर सकते। एकत्व और अद्वैत की स्थिति का मात्र शब्दज्ञान होना पर्याप्त नहीं हैं। शब्द की चमक-दमक देखें तो प्यार, प्रेम, इश्क,स्नेह,राग, अनुराग, आदर, मोह, लगाव, मोहब्बत, प्रणय..! कितने सारें शब्द हैं। हरेक शब्द अपनी गरीमा संजोए हैं। लेकिन उन शब्दों को जीना पडता हैं। तब प्रेम समझ में आता हैं।

एलिफ़ शफ़क की एक और बात लिखता हूँ। " हम सब ऊपरवाले की प्रतिछाया हैं; फिर भी हम एक दूसरे से अलग है और अनोखे हैं।" ईश्वरने सबको अलग बनाया और उन्हीं में एकत्व निर्माण होता है तो वो खुश हो जाता हैं। इसीलिए शायद प्रेम को ईश्वर का रुप कहा गया हैं। बात थोड़ी उल्टी-सीधी लगती हैं। क्यों की अब तक हम दिमाग चला रहे हैं। बुद्धि से प्यार को समझ ने की भूल करते हैं। इसलिए समझना- समझाना चले रहते हैं। वहाँ व्यवहार चलता हैं, एक परंपरा चलती हैं।

ईश्वर ने हमारे भीतर के प्यार को सहलाने के लिए प्रकृति का निर्माण किया हैं। प्रकृति में प्यार ही प्यार भरा पड़ा हैं। जहां देखों वहाँ एक दूसरें के प्रति समर्पण ही समर्पण हैं। सब अलग दिखाई पड़ता हैं लेकिन है पारस्परिक, अवलंबित...! यहाँ समझावट के तूत कतई नहीं हैं। क्योंकि वहाँ प्यार हैं। हम एक गुलाब का फूल लगाने से अच्छे लगते हैं, एक फूल देने-लेने से खुश हो जाते हैं..! हमसे कोई फूल खुश होगा क्या !?

प्रकृति की हरेक बाबत में प्यार का संयोजन हैं। उसे बुद्धि लगानी पडती नहीं, इसलिए 'रीयल फोर्म' में प्यार दिखाई पडता हैं। रंगो में, खुशबु में और आकर्षक रुप में..! प्रकृति हमें प्रेम सिखाती हैं।

चलों..सहजता से ईश्वर से ऐसा प्यार माँगे जो जीने का बेहतरीन तरीका बन जाय। हम भी एलिफ़ शफ़क जैसी प्रेम दृष्टि प्राप्त करें। बोलों,अब क्या समझ की बात कहे..!? खुद ही समझ जाना हैं..बस !!

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Wednesday, November 13, 2024

The secret of life.
November 13, 2024 6 Comments

 The secret of your future is hidden in your daily routines.

आपके भविष्य का रहस्य आपकी दैनिक दिनचर्या में छीपा हैं।

सांप्रत समय में सोशल मीडिया को सब ज्ञान की युनिवर्सिटी कहते हैं। कभी इस ज्ञान को फेक कहकर नकारा जाता हैं। लेकिन मैं कहता हूँ; जिनको जो पसंद है वही चूनता हैं। सबके मन की एक वैयक्तिक सोच होती हैं। सब इनके मुताबिक इधर उधर हो रहे हैं। सालों पहले एक एडवर्टाइज मैंने देखी थी। "शौच वहाँ शौचालय" मैं इसे ऐसे पढता था। 'सोच वहां शौचालय' शायद, ये टॉयलेट की जरुरियात के बारें में विज्ञापन था। विद्या बालन उस एडवर्टाइज की एक्ट्रेस थी।


"सोच वहाँ शौचालय" शब्द का फर्क पकडना पड़ेगा। 'शौच और सोच' मैं सोच ही सुनता और विचार करता सोच भी पवित्र होनी चाहिए। वो भी बदबूदार होगी तो जीवन शौचालय जैसा लगेगा।

आज मैंने यहां दिये गए चित्र में लिखे हुए उत्तम शब्द को समझा और जो समज मैं आया वो आपके समक्ष रखता हूं। पसंद मेरी होने के बावजूद आपको भी पसंद आएगी..! सुबह होती हैं; अपनी नींद खुलती हैं। सारीं यादें, सारें काम से हम फिर  झुट जाते हैं। दिनचर्या में हवा-पानी खुराक भी संमिलित हैं। व्यवसाय के अनुरुप कार्य संगति चलती रहती हैं। आनंद, उत्साह और हर्षोल्लास की पूरे दिऩ की सहेलगाह होती रहती हैं। कोई आज के लिए कार्य करता हैं, कोई कल के लिए। कोई आनेवाले जन्म या आनेवाली पीढियों के लिए काम करता हैं। कोई एक दिन के खाने के लिए भी काम करता हैं। कोई पसीना बहाने के बावजूद भूखा रहता हैं। कोई ठंडाई में बैठे आराम से काम करता हैं। किसी को खाने के लिए भी फुर्सत नहीं हैं। ये सनातन सत्य की बातें हैं।

हम भविष्य को नहीं जानते फिर भी आश लगाए बैठे हैं। कुछ न कुछ अच्छा आकारित होगा। आज नहीं तो कल बहतर होगा। सब लोग इसी आशा में कार्य करते रहते हैं। फिर रात आती हैं; थकान सुकुन में बदल जाती हैं। जीवन का पूरा भार कहीं ओर चला जाता हैं। आनंद की गहराई में रात बह जाती हैं। सपनों की दुनिया की सैर में हम पड जाते हैं। फिर सुबह होती हैं, अनेकानेक जिंदगियां चल पडती हैं, अपने-अपने मुकाम पर..!

मूल बात अपने आनेवाले कल के बारें में ये है; की हमारी दिनचर्या क्या हैं ?हमारी दैनंदिन कार्यशीलता किस प्रकार की हैं। उससे हमारा भविष्य निर्माण होगा। सुबह-शाम के इस खेल में सब संमिलित हैं। पेड़, पौधे, पंछी प्राणी और हम मनुष्य भी..! लेकिन मैं बात मनुष्य की करता हूं। हमारी सोच पर हमारें कार्य निर्भर करते हैं। और इस कार्य की सहेलगाह धीरे धीरे एक अनूठे व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। आज हम जो कुछ है; वो हमारी दैनिक कार्यशीलता के आधार पर हैं। जीवन का आकार बनने की ये अदृश्य घटना हैं। फिर भी हैं बड़ी नक्काशीदार..! ये हैं हमारा कल हमारा भविष्य..!

आज हम जिस प्रकार के समय में जी रहें हैं, उसीके जरिए ही सीखना पड़ेगा। आज मोबाइल इन्टरनेट के समय में उसमें से हमारी जीवनचर्या ढूंढनी होगी। उसमें से मेरे लिए क्या अच्छा हैं ? वो ढूँढने की जिम्मेदारी भी हमारी खुद की हैं। एक अच्छे वाक्य ने मुझे मेरे ब्लॉग का विषय दे दिया। मैं इससे अपनी विचार क्रिया को प्रकाश में ला रहा हूँ। इसका आनंद प्रकट करते हुए...हम सब के नये साले की गति में विचारपुष्प रखता हूँ।

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Wednesday, October 30, 2024

Quality of life..!
October 30, 20241 Comments

The quality of your thinking determines the quality of your life.

आपकी सोच की गुणवत्ता आपके जीवन की 

गुणवत्ता निर्धारित करती है।


जीवन आखिर जीवनन ही कहलाता हैं। सुबह-शाम, रात-दिन का घूमते रहना..सालों का गुजरना भी जीवन का ही भाग हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक की ये परंपरा चलती ही रहती हैं। ये जीवन का उम्र बढ़ते रहने का पडाव हैं। इसमें बस जीवन अवस्थाएं प्राप्त करता हैं। सबकी गति इसमें संमिलित हैं। सबको ये जीवन प्राप्य हैं।

Quality of life

आज मैं कुछ अप्राप्य की बात छेडता हूं। जो अप्राप्त है, उसे प्राप्त करना हैं। ये जीवन की गुणवता को दर्शाता हैं। इससे हम एक जीवन को दूसरें जीवन से अलग बता सकते हैं। ईसे हम कुछ शक्तियों से भरा या कुछ विशिष्ट कार्यो के निमित्त रुप जीवन कहते हैं। ये क्वॉलिटी वाला जीवन हैं। विचार की बहुरंगीता या शुद्धता से ही ऐसा जीवन संभावित हैं। विचार की संपूर्ण असर जीवन के व्यवहार पर पडती हैं। विचारों की कलुषितता पूरे जीवन को प्रभावित करती हैं। ये जीवन को एक विचित्र और अनचाहे मोड़ पर ले जाएगी।

जीवन संकल्पों से भरा होना चाहिए। कुछ उपलब्धि को पाने की कोशिश में बहते रहना चाहिए। प्राप्ति के प्रयास भी वैयक्तिक होने चाहिए। ईश्वर ने सबको जीवन दिया हैं। जीवन शक्यताओं से भरा हैं, संभावनाओं से भरा हैं। पहेली शर्त हमें इस विचार में श्रद्धेय बनना हैं। अभी दो शब्द मुझे सुनने में आये हैं, फिक्स्ड माइंसेट एण्ड ग्रोथ माइंडसेट। अच्छी बातों के लिए हमें फिक्स्ड बनना ही पड़ेगा। तब हमारी बुद्धिशक्ति या विचारशक्ति का ग्रोथ होगा। सामान्य सोच के पीछे चलना या उसको अपने दिमाग में फिक्स्ड कर लेना वैयक्तिक रूप से घातक हैं।

महर्षिदयानंदकृत यजुर्वेद भाष्य के कुछ श्लोक यहाँ रखता हूँ। सरलता से समझाया गया हैं। जीवन के गुणात्मक पहलू को विकसित करने हेतु विचार और कर्म के प्रति जागरुक होना आवश्यक हैं। एक सामान्य विचार को जब शास्त्र का प्रमाण मिलता हैं, तब वो शुद्धता के नजदीक पहुंच जाता हैं। विचार को प्रस्तुत करने का मेरा प्रयास तो छोटा-सा निमित्त हैं। फिर भी व्यक्ति की लघुता को भी गुरुता की श्रेष्ठतम ऊँचाई विचार ही देता हैं। देखिए, यजुर्वेद के प्रमाण को ;

"तन्तुना रायः पोषेण ॥" (यजुर्वेद १५-७)
भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि विस्तारयुक्त पुरुषार्थ से ऐश्वर्य को प्राप्त हो के सब प्राणियों का हित सिद्ध करें।

"त्रिवृद् असि त्रिवृते ॥" (यजुर्वेद १५-९)
भावार्थः-पृथिवी आदि पदार्थों के गुण, कर्म और स्वभावों के जाने बिना कोई भी विद्वान् नहीं हो सकता। इसलिये कार्य कारण दोनों को यथावत् जान के अन्य मनुष्यों के लिये उपदेश करना चाहिये।

आश्चर्य हैं ! विचार भी पुरुषार्थ हैं..कितनी बडी बात है ! जब हमारी बुद्धि में सत्य की प्रतिष्ठा हो जायेगी, सत्य स्पष्टरुप से स्थापित हो जायेगा या जो विचार हमारी समज में बैठ जायेगा, तब किसी अस्पष्ट व्यक्ति या समूह का बंधन छूट जायेगा।

मैं किसी को छोड देने के विचार का पक्षधर नहीं हूं। लेकिन विचारों की स्पष्टता के कारण ये सहज हो जाता हैं। दृष्टि में गज़ब की स्वीकार्यता विकसित होती हैं। शायद ये, स्वीकार्य गति व्यक्ति को गुणात्मकता की ओर ले जाए !? जिसे हम प्रसिद्धि कहते हैं, उस मुकाम पर ले जाए !?

ये लिखने के निमित्त से मुझे पता चल गया है कि विचार का कितना सौंदर्य हैं !? चले..! सोच या विचार से गुणात्मकता की ओर...!
नये साल की यही शुभेच्छा के साथ..!

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રજતમિલન...મારા મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠનો અવસર...!

મોડાસા નગર નિવાસની વર્ષગાંઠ...! 'રજતમિલન' એક ગામડાનો માણસ પચ્ચીસ વરસ પહેલાં,  '૧ મે ના 'ગુજરાત રાજ્યના સ્થાપના દિવસે' ...

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